हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Dev (महाकवि देव)
महाकवि देव रीतिकालीन ब्रजभाषा के रससिद्ध आचार्य हैं, जिन्होंने प्रेम, सौन्दर्य और मानवीय मनोभावों का सूक्ष्म दार्शनिक चित्रण किया।
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‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— महाकवि देव
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— महाकवि देव
शेर #2 • शाही पन्ना
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— महाकवि देव
शेr #3 • रूहानी शाम
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,
अमर शेर और ग़ज़लें
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
माटी का यह देह बना है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

प्रेम बिना सब सूना जग में अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Prem binaa sab soonaa jag mein antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
संतन की संगति में आकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन के निर्मल दर्पण में जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki is paavan ghaatee mein jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हृदय में जिसके दया बसी है अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
अहंकार की दीवारें जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
संतन की संगति में आकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम नगर का वासी बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Nainan aage too hi too naache priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Prem nagar ka vaasee banakar naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जीवन का यह पावन सूत्र जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य-अहिंसा की राहों पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
साधु-संगत की छाया में जो अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
धरती की छाती पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

तन्हाई के अँधियारे में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,टूटे हुए दिल का दर्द तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Tanhaaee ke andhiyaare mein aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Toote hue dil ka dard tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्संग की निर्मल गंगा में मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
माटी का यह देह बना है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

नैनों से जो नीर बहे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Nainon se jo neer bahe ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Andheree raat ke sannaate mein saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,शांति और संतोष का धन जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
माटी का यह देह बना है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

आँखों के आँसू जब सूखे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Aankhon ke aansoo jab sookhe dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Gham ki is aandhee ne jab keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
वाणी वही जो घाव भरे और स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,जीवन का यह पावन सूत्र जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

कर्म की पावन वेदी पर बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जो अपने वचन का पक्का है जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Karm ki paavan vedee par binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jo apane vachan ka pakkaa hai jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
नाम और दौलत तो माटी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्संग की निर्मल गंगा में के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,हृदय में जिसके दया बसी है अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,धैर्य की नौका पर सवार होकर जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Satkarmon ki amit poonjee agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

धैर्य और संतोष का धन जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,सत्य और धर्म की राहों पर और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Dhairy aur santosh ka dhan jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Saty aur dharm ki raahon par aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
वाणी में जो अमृत घोले स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

सत्य का दीप जब जलता और ज्ञान-भोर मुस्काए अमृत रस की बूँदें अंतर घट में बरसने लगती हैं,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Saty ka deep jab jalataa aur jnyaana-bhor muskaae amrit ras ki boonden antar ghat mein barasane lagatee hain,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जब से नैना रूप में उलझे युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अंतर में जब प्रेम समाया उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

मैं और मेरा का भ्रम में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Main aur mera ka bhram mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
अंतर घट में जब ज्योति जगी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
अंतर घट में जब ज्योति जगी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

कंचन और काँच में जिसने जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Kanchan aur kaanch mein jisane jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Jab man ki sab tarangen shaant hueen antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम सुधा का रस जो चखा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अंतर में जब प्रेम समाया उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह की रात जब ढलने लगी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अमर प्रेम की अमर कहानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Hari ki kripaa ka paavan saaya apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

साधु-संगत की छाया में जो अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम की चाहत में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे रूप की पावन झांकी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे प्रेम की यही निशानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Prem ki gangaa antar mein bahe antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Parahit mein jisane jeevan saunpaa apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रियतम की याद में जो नैना तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Jeevan ka yeh paavan sootr jo jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन की वीणा बज उठी जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Saanson ke har taar pe jisakaa ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Prem ki paavan vedee par jisane jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Prem ki paavan jyoti jagaaee jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम नगर का वासी बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,मन मंदिर की पावन आरती और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Nainan aage too hi too naache antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Hriday ke paavan sinhaasan par prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दर्द का यह गहरा सागर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Zakhm wo nahi jo jism cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Dard ka yeh gaharaa saagar sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
प्रेम बिना सब सूना जग में अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
दर्द की रात में जब कोई और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की भट्टी में तपकर ही मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
छाले पड़े हैं पाँवों में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,आँसुओं की इस भाषा को तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Tootee naav bhanvar mein phansee bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Jeevan ke is kathin mod par tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
आँखों में जो नमी है वो दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
दिल का आईना जब टूटा दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब कोई चारासाज़ न मिला सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
तन्हाई के अँधियारे में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,टूटे हुए दिल का दर्द तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,टूटे दिल की इस वीणा से केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

घायल की गति घायल जाने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
छाले पड़े हैं पाँवों में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब कोई सहारा न बचा तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
टूटे दिल की ख़ामोशी में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,अंधेरी रात के सन्नाटे में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
भीतर-भीतर घुटता जाए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दिल के फफोलों को देखकर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
नैनों से जो नीर बहे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस आँधी ने जब कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जीवन की सच्ची पूँजी वही उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jeevan ki sachchee poonjee vahee use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दर्द का यह गहरा सागर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
कोई न अपना इस जग में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब सबने मुँह फेर लिया जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
अकेलेपन की धूप जब साए रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
नैनों से जो नीर बहे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दिल के फफोलों को देखकर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

मन मंदिर में जो दीप जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जीवन के इस महासमर में पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Man mandir mein jo deep jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jeevan ke is mahaasamar mein paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
ग़म का मारा पंछी जैसे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
आशा का दीप जब बुझने को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब नयनों के सब आँसू सूखे सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
उम्र भर का सफ़र और हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब कोई सहारा न बचा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
नैनों से जो नीर बहे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

अहंकार की दीवारें जब तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,जो गिरतों को उठाना जानता है चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Ahankaar ki deevaaren jab tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
महाकवि देव (Dev) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
महाकवि देव रीतिकालीन ब्रजभाषा के रससिद्ध आचार्य हैं, जिन्होंने प्रेम, सौन्दर्य और मानवीय मनोभावों का सूक्ष्म दार्शनिक चित्रण किया।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
महाकवि देव ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Riti Kaal (1673–1767) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, महाकवि देव की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को महाकवि देव ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
महाकवि देव की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, महाकवि देव हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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महाकवि देव कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
महाकवि देव (1673–1767) Hindi/Riti Kaal साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
महाकवि देव की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
महाकवि देव की रचनाओं के केंद्र में श्रृंगार रस व रूप-सौन्दर्य, विरह की गहन व्याकुलता, अनुराग व समर्पण, प्रकृति व ऋतु-वर्णन, जीवन का आत्मिक दर्शन जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
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