कर्म की खेती जो जन बोवे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मोह-निशा से जो जन जागा उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Swami Dayananda Saraswati (स्वामी दयानंद सरस्वती)
स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883) Vedic Reformer & Founder of Arya Samaj के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘कर्म की खेती जो जन बोवे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मोह-निशा से जो जन जागा उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— स्वामी दयानंद सरस्वती
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
कर्म की खेती जो जन बोवे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— स्वामी दयानंद सरस्वती
शेर #2 • शाही पन्ना
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।’— स्वामी दयानंद सरस्वती
शेr #3 • रूहानी शाम
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,
अमर शेर और ग़ज़लें
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Ishq ki raah anokhee bande us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem nagar ka vaasee banakar prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
माटी का यह देह बना है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
माटी का यह देह बना है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
साधु-संगत की छाया में जो सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने प्रेम का मर्म समझ सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Jisane prem ka marm samajh sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,भवसागर की लहरों से जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
अहंकार की दीवारें जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

अकेलेपन की धूप जब साए अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब धैर्य की सीमा टूट गई मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Akelepan ki dhoop jab saae antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab dhairy ki seemaa toot gayi manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
मन के निर्मल दर्पण में जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

छाले पड़े हैं पाँवों में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे दिल की इस वीणा से पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Chhaale pare hain paanvon mein kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Toote dil ki is veenaa se paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
नदिया की धारा बहती जावे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

वक़्त की आँधी ने तोड़े को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Waqt ki aandhee ne tore ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Jab apanon ne hi diye zakhm paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,वाणी में जिसके मिठास घुली उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

संतन की संगति में आकर ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,जीवन की सच्ची पूँजी वही विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Santan ki sangati mein aakar hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Jeevan ki sachchee poonjee vahee vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन मंदिर में जो दीप जले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,नेकी की राह पे जो जन रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
धरती की छाती पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

वाणी में जो अमृत घोले है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,जो अपने वचन का पक्का है और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Vaanee mein jo amrit ghole hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Jo apane vachan ka pakkaa hai aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,माटी का चोला पाकर जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

जीवन का यह कठिन सफ़र जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जिसने समय की चाल पहचानी सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Jeevan ka yeh kathin safar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Jisane samay ki chaal pahachaanee saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,मोह-निशा से जो जन जागा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,माटी का चोला पाकर जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

साधु वो ही जो अंतर जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Saadhu wo hi jo antar jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
फासले मिट गए जब दिल से अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

कंचन और काँच में जिसने ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,अंतःकरण जब दर्पण की तरह तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Kanchan aur kaanch mein jisane jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Antahkaran jab darpan ki tarah to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
तेरी याद का पावन साया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,हृदय के पावन सिंहासन पर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर से निर्मल हो बाहर के पाखंड से मुक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन रहे,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Ahankaar ki deevaaren jab antar se nirmal ho baahar ke paakhand se mukt hokar prabhu bhakti mein leen rahe,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,मन मंदिर की पावन आरती कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Ahankaar ki deevaaren jab nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Maatee ka cholaa paakar jisane maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अमर प्रेम की अमर कहानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन की वीणा बज उठी जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Satkarmon ki amit kamaaee hi use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
तेरी याद का पावन साया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के रंग में रंग कर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे दीदार की एक झलक ने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,वाणी में जिसके मिठास घुली उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Vaanee mein jisake mithaas ghulee us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रियतम की याद में जो नैना से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम की चाहत में जिसने नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Shaanti aur santosh ka dhan jo usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
नैन मिले जब नैनन से तब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Ishq ki raah anokhee bande jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Prem nagar ka vaasee banakar ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,मन मंदिर की पावन आरती उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
फासले मिट गए जब दिल से अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

नैन मिले जब नैनन से तब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Nain mile jab nainan se tab raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Sachche aashiq ki pahachaan yahee jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने प्रेम का मर्म समझ सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जब से नैना रूप में उलझे नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

तेरी आँखों की झील में जो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem ki paavan jyoti jagaaee jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरी आँखों की झील में जो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

घायल की गति घायल जाने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दिल के फफोलों को देखकर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Dil ke phapholon ko dekhakar tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
विरह की अगन में जलता मन हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
घायल की गति घायल जाने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,अंधेरी रात के सन्नाटे में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

दिल का आईना जब टूटा सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Dil ka aaina jab tootaa so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Dard ki is ekaant gufaa mein chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
कोई न अपना इस जग में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
आशा का दीप जब बुझने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म के मारों की बस्ती में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
अकेलेपन की धूप जब साए अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब धैर्य की सीमा टूट गई मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,इस दर्द भरे दिल की सदा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

सपनों के महल जब टूटे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Sapanon ke mahal jab toote par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Zindagi ki is soonee dagar par arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
टूटी नाव भँवर में फँसी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
ग़म का मारा पंछी जैसे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अकेलेपन की इस राह पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
जिसके दिल पर बीत रही दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,टूटे हुए सपनों की किरचें अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
छाले पड़े हैं पाँवों में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,आँसुओं की इस भाषा को केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,कर्म की खेती में जो पसीना कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Satkarmon ki amit poonjee jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Karm ki khetee mein jo paseenaa ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
घायल की गति घायल जाने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दिल के फफोलों को देखकर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
टूटी नाव भँवर में फँसी और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Zindagi aur kuchh nahi bas man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Karmanyataa ka paavan vrat lekar aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
कोई न अपना इस जग में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
आशा का दीप जब बुझने सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब नयनों के सब आँसू सूखे सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
छाले पड़े हैं पाँवों में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
छाले पड़े हैं पाँवों में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे दिल की इस वीणा से पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

माटी का यह चोला पाकर अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जो गिरतों को उठाना जानता है उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Maatee ka yeh cholaa paakar agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
नैनों से जो नीर बहे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म के मारों की बस्ती में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
स्वामी दयानंद सरस्वती (Swami Dayananda Saraswati) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883) Vedic Reformer & Founder of Arya Samaj के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
स्वामी दयानंद सरस्वती ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1824–1883 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, स्वामी दयानंद सरस्वती की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
स्वामी दयानंद सरस्वती की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, स्वामी दयानंद सरस्वती हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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स्वामी दयानंद सरस्वती के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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स्वामी दयानंद सरस्वती कौन थे?
स्वामी दयानंद सरस्वती (1824–1883) Tankara, Gujarat, India से ताल्लुक रखने वाले Vedic Reformer & Founder of Arya Samaj के अग्रदूत थे, जिन्हें MAHARSHI DAYANANDA, FOUNDER OF ARYA SAMAJ, PIONEER OF 'BACK TO THE VEDAS' MOVEMENT के रूप में जाना जाता है।
स्वामी दयानंद सरस्वती का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
स्वामी दयानंद सरस्वती का मुख्य विचार Back to the Vedas (Vedo ki aur lauto), eradication of idol worship, superstition and untouchability, women's education (Kanya Gurukuls) पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
स्वामी दयानंद सरस्वती की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
स्वामी दयानंद सरस्वती का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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स्वामी दयानंद सरस्वती का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
स्वामी दयानंद सरस्वती की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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