आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Chandra Shekhar Azad (चंद्रशेखर आज़ाद)
चंद्रशेखर आज़ाद (1906–1931) Revolutionary Commander & Symbol of Freedom के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— चंद्रशेखर आज़ाद
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— चंद्रशेखर आज़ाद
शेर #2 • शाही पन्ना
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘नाम और दौलत तो माटी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— चंद्रशेखर आज़ाद
शेr #3 • रूहानी शाम
नाम और दौलत तो माटी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,
अमर शेर और ग़ज़लें
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
नाम और दौलत तो माटी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
धरती की छाती पर जिसने मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem ki doree baandh laee jab dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Priyatam ke rang mein rang kar sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह की रात जब ढलने लगी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Prem galee ati saankaree jaamen antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Virah ki raat jab dhalane lagee yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
अहंकार की दीवारें जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,माटी का चोला पाकर जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Man mandir mein basaa jo moorati jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Man mandir ki paavan aaratee to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
अहंकार की दीवारें जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,नेकी की राह पे जो जन उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,धैर्य का दामन जिसने थामे जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,वाणी में जिसके मिठास घुली मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

अकेलेपन की धूप जब साए भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द का यह गहरा सागर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Akelepan ki dhoop jab saae bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Dard ka yeh gaharaa saagar paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
सत्य का दीप जब जलता है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सदाचार की पावन वेदी पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,माटी का चोला पाकर जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

ग़म की तपती दुपहरी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस लंबी यात्रा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Gham ki tapatee dupaharee mein lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Gham ki is lanbee yaatraa mein chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
धरती की छाती पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

घायल की गति घायल जाने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,इस दर्द भरे दिल की सदा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Is dard bhare dil ki sadaa pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
माटी का यह देह बना है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
अहंकार की दीवारें जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

कर्म की पावन वेदी पर चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जिसने परोपकार का दीप जलाया उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Karm ki paavan vedee par chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य-अहिंसा की राहों पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी वही जो घाव भरे और तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

वाणी में जो अमृत घोले धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जीवन का असली आनंद वही और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Vaanee mein jo amrit ghole dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jeevan ka asalee aanand vahee aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

संतन की संगति में आकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जिसने अहंकार को त्याग दिया अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Santan ki sangati mein aakar saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
धरती की छाती पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सदाचार की पावन वेदी पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
वाणी वही जो घाव भरे और सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,नेकी की राह पे जो जन जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन मंदिर में जो दीप जले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

मोह-निशा जब ढलती है इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Moha-nishaa jab dhalatee hai ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

अहंकार की दीवारें जब अंतर बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Ahankaar ki deevaaren jab antar barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

सत्य का दीप जब जलता में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Saty ka deep jab jalataa mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jisane is nashvar shareer ka moh tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रियतम की याद में जो नैना जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन की वीणा बज उठी जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अंतर में जब प्रेम समाया तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Hari sumiran mein jisakaa chitt man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Saadhu purush ki vaanee kabhee usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
फासले मिट गए जब दिल से का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरी याद का पावन साया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह की रात जब ढलने लगी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जब से नैना रूप में उलझे सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,धैर्य का दामन जिसने थामे जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Karm ki khetee jo jan bove ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Dhairy ka daaman jisane thaame jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम नगर का वासी बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

दीन-दुखी का आसरा बनकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Vaanee mein jisake mithaas ghulee paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह की रात जब ढलने लगी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम बिना सब सूना जग में संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

सत्य का दीप जब जलता है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Saty ka deep jab jalataa hai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Satya-ahinsaa ki raahon par ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे रूप की पावन झांकी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

तेरी याद का पावन साया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Teri yaad ka paavan saaya tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Priyatam ka anuraag hi jisakaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
साँसों की सरगम में घुल गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
फासले मिट गए जब दिल से संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

प्रेम बिना सब सूना जग में अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Prem binaa sab soonaa jag mein antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem ki is paavan dhaaraa mein prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
तेरे मिलन की आस में बीते प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अमर प्रेम की अमर कहानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

तेरी याद का पावन साया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Teri yaad ka paavan saaya jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Virah ki raat jab dhalane lagee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी याद का पावन साया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

घायल की गति घायल जाने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस गहरी रात में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Gham ki is gaharee raat mein to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
तेरे मिलन की आस में बीते जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
छाले पड़े हैं पाँवों में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म के मारों की बस्ती में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
भीतर-भीतर घुटता जाए दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

कोई न अपना इस जग में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Koee na apanaa is jag mein so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
छाले पड़े हैं पाँवों में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए सपनों की किरचें तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
कोई न अपना इस जग में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,आँसुओं की इस भाषा को पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
अकेलेपन की धूप जब साए भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द का यह गहरा सागर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
टूटी नाव भँवर में फँसी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब सबने मुँह फेर लिया अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

कोई न अपना इस जग में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे दिल की इस वीणा से ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Koee na apanaa is jag mein lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Toote dil ki is veenaa se zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
टूटी नाव भँवर में फँसी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस गहरी रात में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
आँखों में जो नमी है वो पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
दिल का आईना जब टूटा हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,अंधेरी रात के सन्नाटे में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
तन्हाई के अँधियारे में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस लंबी यात्रा में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,सच्चे मित्र की पहचान यही तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Zindagi aur kuchh nahi bas agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Sachche mitr ki pahachaan yahee tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
घायल की गति घायल जाने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस गहरी रात में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए सपनों की किरचें तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
दर्द की रात में जब कोई पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
छाले पड़े हैं पाँवों में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

वाणी में जो अमृत घोले जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,सत्य और धर्म की राहों पर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Vaanee mein jo amrit ghole jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Saty aur dharm ki raahon par jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
अकेलेपन की धूप जब साए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म की इस आँधी ने जब पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
ग़म का मारा पंछी जैसे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस गहरी रात में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
तन्हाई के अँधियारे में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,टूटे हुए सपनों की किरचें अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
ग़म की तपती दुपहरी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस लंबी यात्रा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

धरती की छाती पर जिसने जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जिसने परोपकार का दीप जलाया का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
आँखों के आँसू जब सूखे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब नयनों के सब आँसू सूखे तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
चंद्रशेखर आज़ाद (Chandra Shekhar Azad) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
चंद्रशेखर आज़ाद (1906–1931) Revolutionary Commander & Symbol of Freedom के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
चंद्रशेखर आज़ाद ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1906–1931 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, चंद्रशेखर आज़ाद की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को चंद्रशेखर आज़ाद ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
चंद्रशेखर आज़ाद की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, चंद्रशेखर आज़ाद हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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चंद्रशेखर आज़ाद कौन थे?
चंद्रशेखर आज़ाद (1906–1931) Bhabhra (Alirajpur), Madhya Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Revolutionary Commander & Symbol of Freedom के अग्रदूत थे, जिन्हें COMMANDER-IN-CHIEF OF HSRA, PANDIT JI, QUICKSILVER REVOLUTIONARY के रूप में जाना जाता है।
चंद्रशेखर आज़ाद का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
चंद्रशेखर आज़ाद का मुख्य विचार Indomitable free spirit, refusal to be captured alive, fierce tactical intellect, youth mentorship पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
चंद्रशेखर आज़ाद की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
चंद्रशेखर आज़ाद की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
चंद्रशेखर आज़ाद का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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