आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Chaitanya Mahaprabhu (चैतन्य महाप्रभु)
चैतन्य महाप्रभु (1486–1534) Apostle of Harinam & Gaudiya Vaishnavism के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— चैतन्य महाप्रभु
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— चैतन्य महाप्रभु
शेर #2 • शाही पन्ना
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— चैतन्य महाप्रभु
शेr #3 • रूहानी शाम
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,
अमर शेर और ग़ज़लें
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,मन मंदिर की पावन आरती कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Nainon ke darpan mein basaa jab tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Man mandir ki paavan aaratee ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मन के मैल को जिसने धोया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,माटी का चोला पाकर जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
अहंकार की दीवारें जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Nain mile jab nainan se tab priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Saanson ke har taar pe jisakaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,दीन-बंधु का सहारा बन के उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
धरती की छाती पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हरि की कृपा का पावन साया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नाम और दौलत तो माटी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

नैन मिले जब नैनन से तब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Nain mile jab nainan se tab amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Virah ka har ik aansoo banakar yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

ग़म की तपती दुपहरी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द का यह गहरा सागर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Gham ki tapatee dupaharee mein antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Dard ka yeh gaharaa saagar manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
धरती की छाती पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

उम्र भर का सफ़र और दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Umr bhar ka safar aur dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Aansuon ki is bhaashaa ko tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
संतन की संगति में आकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,भवसागर की लहरों से जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म की इस गहरी रात में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Zakhm wo nahi jo jism jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Gham ki is gaharee raat mein tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
माटी का यह देह बना है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नदिया की धारा बहती जावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

नेकी की राह पे जो जन जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,कर्म की खेती में जो पसीना चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Nekee ki raah pe jo jan jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Karm ki khetee mein jo paseenaa chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
माटी का यह देह बना है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

संतन की संगति में आकर बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,समय की अमूल्य बूँदों को पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Santan ki sangati mein aakar binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Samay ki amooly boondon ko paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,भवसागर की लहरों से जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
संतन की संगति में आकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

समय का पहिया चलता जाए कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,कर्म की खेती में जो पसीना जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Karm ki khetee mein jo paseenaa jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

मन की चंचलता को जिसने कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,ब्रह्मलीन होकर जो जन स्थित तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Man ki chanchalataa ko jisane kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Brahmaleen hokar jo jan sthit to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नैन मिले जब नैनन से तब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रियतम की याद में जो नैना का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

अमृत की बूँद अंतर में से निर्मल हो बाहर के पाखंड से मुक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन रहे,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Amrit ki boond antar mein se nirmal ho baahar ke paakhand se mukt hokar prabhu bhakti mein leen rahe,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी आँखों की झील में जो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,मन मंदिर की पावन आरती कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

जो भीतर झाँक के देखता मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परमानंद का यह अलौकिक रस समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Paramaanand ka yeh alaukik ras samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Dhairy ka daaman jisane thaame paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने प्रेम का मर्म समझ सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम गली अति साँकरी जामें बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अमर प्रेम की अमर कहानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,साँसों के हर तार पे जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Saty ke paavan path par jisane sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Dhairy ka daaman jisane thaame usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अंतर में जब प्रेम समाया तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरी आँखों की झील में जो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
फासले मिट गए जब दिल से उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Santan ki sangati mein aakar prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Hari ki kripaa ka paavan saaya jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Satsang ki nirmal gangaa mein maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने प्रेम का मर्म समझ और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

प्रेम गली अति साँकरी जामें बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अमर प्रेम की अमर कहानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Prem galee ati saankaree jaamen banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Amar prem ki amar kahaanee ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रियतम की याद में जो नैना संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
साँसों की सरगम में घुल गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Prem galee ati saankaree jaamen priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Prem nagar ka vaasee banakar liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
नैन मिले जब नैनन से तब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैन मिले जब नैनन से तब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem rang mein jo rang gaya tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Sachche prem ki yahee nishaanee use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
साँसों की सरगम में घुल गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह की रात जब ढलने लगी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

ग़म की तपती दुपहरी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब आशा की हर किरण बुझी सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Gham ki tapatee dupaharee mein jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Jab aashaa ki har kiran bujhee sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
प्रियतम की याद में जो नैना उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के चरणों में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस गहरी रात में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
घायल की गति घायल जाने हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

आशा का दीप जब बुझने सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Aashaa ka deep jab bujhane soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Andheree raat ke sannaate mein tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
सपनों के महल जब टूटे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
छाले पड़े हैं पाँवों में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
ग़म की तपती दुपहरी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द का यह गहरा सागर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
आँखों में जो नमी है वो जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

वक़्त की आँधी ने तोड़े बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दिल के फफोलों को देखकर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Waqt ki aandhee ne tore baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Dil ke phapholon ko dekhakar tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
भीतर-भीतर घुटता जाए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब धैर्य की सीमा टूट गई तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
दिल का आईना जब टूटा हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
आँखों के आँसू जब सूखे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब आशा की हर किरण बुझी मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब सबने मुँह फेर लिया अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

नेकी की राह पे जो जन जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,सत्य और धर्म की राहों पर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Nekee ki raah pe jo jan jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Saty aur dharm ki raahon par jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
ग़म की तपती दुपहरी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब आशा की हर किरण बुझी सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
कोई न अपना इस जग में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अकेलेपन की इस राह पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस गहरी रात में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

जिसने मन को जीत लिया धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,सत्संगति का पावन प्रभाव विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Jisane man ko jeet liyaa dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Satsangati ka paavan prabhaav vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब कोई चारासाज़ न मिला तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
दर्द की रात में जब कोई सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आँखों में जो नमी है वो जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस आँधी ने जब अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
उम्र भर का सफ़र और दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,हृदय में जिसके दया और करुणा का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Zindagi aur kuchh nahi bas jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म के मारों की बस्ती में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
चैतन्य महाप्रभु (Chaitanya Mahaprabhu) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
चैतन्य महाप्रभु (1486–1534) Apostle of Harinam & Gaudiya Vaishnavism के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
चैतन्य महाप्रभु ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1486–1534 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, चैतन्य महाप्रभु की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को चैतन्य महाप्रभु ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
चैतन्य महाप्रभु की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, चैतन्य महाप्रभु हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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चैतन्य महाप्रभु के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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चैतन्य महाप्रभु कौन थे?
चैतन्य महाप्रभु (1486–1534) Nabadwip, West Bengal, India से ताल्लुक रखने वाले Apostle of Harinam & Gaudiya Vaishnavism के अग्रदूत थे, जिन्हें GAURANGA, MAHAPRABHU, PIONEER OF SANKIRTANA MOVEMENT AND ACHINTYA BHEDA ABHEDA के रूप में जाना जाता है।
चैतन्य महाप्रभु का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
चैतन्य महाप्रभु का मुख्य विचार Harinama Sankirtana (congregational chanting), ecstatic love of Radha-Krishna (Prema Bhakti), transcending caste through divine love पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
चैतन्य महाप्रभु की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
चैतन्य महाप्रभु की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
चैतन्य महाप्रभु का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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