दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Bipin Chandra Pal (बिपिन चंद्र पाल)
बिपिन चंद्र पाल (1858–1932) Father of Revolutionary Thoughts in India के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
डाउनलोड करें बिपिन चंद्र पाल के एस्थेटिक स्टोरी कार्ड्स

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— बिपिन चंद्र पाल
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— बिपिन चंद्र पाल
शेर #2 • शाही पन्ना
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— बिपिन चंद्र पाल
शेr #3 • रूहानी शाम
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Ishq jab rooh mein utarataa hai se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Man mandir ki paavan aaratee sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,शांति और संतोष का धन जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
अहंकार की दीवारें जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्संग की निर्मल गंगा में परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

तेरे मिलन की आस में बीते उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Tere milan ki aas mein beete us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Hriday ke paavan sinhaasan par liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य का दीप जब जलता है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Nainan aage too hi too naache sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Saanson ke har taar pe jisakaa sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
वाणी में जो अमृत घोले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मोह-निशा से जो जन जागा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अहंकार का त्याग किया जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

टूटी नाव भँवर में फँसी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Tootee naav bhanvar mein phansee antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab apanon ne hi diye zakhm tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अमर नाम जग में उसी का उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Jisake dil par beet rahi par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Gham ki is lanbee yaatraa mein keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नाम और दौलत तो माटी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सदाचार की पावन वेदी पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

वक़्त की आँधी ने तोड़े जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म के मारों की बस्ती में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Waqt ki aandhee ne tore jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Gham ke maaron ki bastee mein keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
मन के निर्मल दर्पण में जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

वाणी में जो अमृत घोले जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,धैर्य की नौका पर सवार होकर विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Vaanee mein jo amrit ghole jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Dhairy ki naukaa par savaar hokar vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

जीवन की इस रणभूमि में अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जीवन का असली आनंद वही जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Jeevan ki is ranabhoomi mein agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jeevan ka asalee aanand vahee jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,नेकी की राह पे जो जन उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

सच्ची लगन से जो जन जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,सत्संगति का पावन प्रभाव उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Sachchee lagan se jo jan jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Satsangati ka paavan prabhaav usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Antarman ke sannaate mein jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

मैं और मेरा का भ्रम जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है जिसने अपना शीश नवाया उसने परम मुक्ति का अमर वरदान प्राप्त कर लिया।
Main aur mera ka bhram jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai jisane apanaa sheesh navaayaa usane param mukti ka amar varadaan praapt kar liyaa.
मन की वीणा बज उठी जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,साँसों के हर तार पे जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

अहंकार की दीवारें जब अंतर परमात्मा की आवाज़ सुनाई दे वही सच्चा उपदेश है जो मोक्ष का द्वार खोलता है,परमानंद का यह अलौकिक रस है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Ahankaar ki deevaaren jab antar paramaatmaa ki aavaaz sunaaee de vahee sachchaa upadesh hai jo moksh ka dvaar kholataa hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
फासले मिट गए जब दिल से जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम के इस पावन तीरथ में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Naam aur daulat to maatee saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Amar naam jag mein usee ka us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अहंकार का त्याग किया जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Man ke nirmal darpan mein jab antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Man ke mail ko jisane dhoyaa maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरे मिलन की आस में बीते उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

सत्य का दीप जब जलता है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Saty ka deep jab jalataa hai saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Prem ki paavan vedee par jisane barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Jab se nainaa roop mein ulajhe to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन की वीणा बज उठी जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Saanson ki saragam mein ghul gaya barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem ki is paavan dhaaraa mein ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
अंतर घट में जब ज्योति जगी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,विरह की रात जब ढलने लगी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Nainon ke darpan mein basaa jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ki is paavan ghaatee mein motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

छाले पड़े हैं पाँवों में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अंधेरी रात के सन्नाटे में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Chhaale pare hain paanvon mein so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Andheree raat ke sannaate mein arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
प्रेम बिना सब सूना जग में जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
छाले पड़े हैं पाँवों में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,आँसुओं की इस भाषा को तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

मन के कोने में सिमटी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब कोई सहारा न बचा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Man ke kone mein simatee jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Jab koee sahaaraa na bachaa tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस आँधी ने जब केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
आँखों में जो नमी है वो अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,इस दर्द भरे दिल की सदा जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
टूटी नाव भँवर में फँसी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
नैनों से जो नीर बहे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

ग़म का मारा पंछी जैसे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Is dard bhare dil ki sadaa tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
नैनों से जो नीर बहे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
कोई न अपना इस जग में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब आशा की हर किरण बुझी जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आँखों में जो नमी है वो दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
सपनों के महल जब टूटे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

अहंकार की दीवारें जब मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जो सबको अपना मान के चले चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Ahankaar ki deevaaren jab mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jo sabako apanaa maan ke chale chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
छाले पड़े हैं पाँवों में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अंधेरी रात के सन्नाटे में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
जिसके दिल पर बीत रही यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,टूटे हुए दिल का दर्द चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
आँखों के आँसू जब सूखे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब कोई सहारा न बचा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

समय का पहिया चलता जाए अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सदाचार के पावन नियमों पर कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Sadaachaar ke paavan niyamon par ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
मन के कोने में सिमटी रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस गहरी रात में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
नैनों से जो नीर बहे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब धैर्य की सीमा टूट गई चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
ग़म का मारा पंछी जैसे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

धैर्य और संतोष का धन जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,सच्चे मित्र की पहचान यही जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Dhairy aur santosh ka dhan jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Sachche mitr ki pahachaan yahee jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
मन के कोने में सिमटी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे दिल की इस वीणा से केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
बिपिन चंद्र पाल (Bipin Chandra Pal) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
बिपिन चंद्र पाल (1858–1932) Father of Revolutionary Thoughts in India के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
बिपिन चंद्र पाल ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1858–1932 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, बिपिन चंद्र पाल की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को बिपिन चंद्र पाल ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
बिपिन चंद्र पाल की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, बिपिन चंद्र पाल हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
30 सेकंड में बनाइए अपना कार्ड
पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
- बिना साइन-अप
- बिना वॉटरमार्क
- हमेशा मुफ़्त
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic Poetryहर मौक़े और हर अपने के लिए संदेश
जिसके लिए लिखना है, उसे या कोई त्योहार चुनिए और तैयार संग्रह खोल लीजिए।
- पापा का जन्मदिनजिन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया
- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
- परिवार को सुप्रभातघर के ग्रुप के लिए सुबह की शुरुआत
- प्यार भरी शुभ रात्रिसोने से पहले भेजने लायक़ बातें
- दिवाली की बधाईअपनों के लिए रोशनी भरे संदेश
- होली की बधाईरंगों वाले संदेश दोस्तों के नाम
- ईद मुबारकअपनों तक पहुँचाइए ईद की ख़ुशी
- साथी को विदाईसहकर्मी के लिए अपनापन भरे अल्फ़ाज़
- सफलता पर बधाईकिसी की बड़ी जीत पर हौसला बढ़ाइए
- किसी की याद मेंजब दूरी कुछ ज़्यादा ही लंबी लगे
- दोस्त का जन्मदिनयार के लिए हँसी-ख़ुशी वाली दुआएँ
- क्रिसमस की शुभकामनाएँपूरे परिवार के लिए त्योहार की बधाई
लोग यही खोजते हैं
- अकेलेपन की शायरी
- दिल टूटने की शायरी
- पहले प्यार की शायरी
- हमसफ़र पर शायरी
- आगे बढ़ने की शायरी
- किंग एटीट्यूड शायरी
- क्वीन एटीट्यूड शायरी
- बेस्ट फ्रेंड शायरी
- देर रात की याद शायरी
- गहरे जज़्बात की शायरी
- हार न मानने की शायरी
- पत्नी को जन्मदिन की बधाई
- भाई को जन्मदिन की बधाई
- शादी की छोटी शुभकामनाएँ
- पहली सालगिरह की बधाई
- प्रेरणादायक सुप्रभात
कवि, त्योहार और स्टेटस
शेरों के पीछे की आवाज़ें पढ़िए, त्योहार की तैयारी कीजिए और स्टेटस के लिए छोटी पंक्ति उठाइए
बिपिन चंद्र पाल के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
बिपिन चंद्र पाल के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
कोई अन्य सवाल है? संपर्क करें
बिपिन चंद्र पाल कौन थे?
बिपिन चंद्र पाल (1858–1932) Habiganj, Sylhet (now Bangladesh) से ताल्लुक रखने वाले Father of Revolutionary Thoughts in India के अग्रदूत थे, जिन्हें PAL OF LAL-BAL-PAL, FATHER OF REVOLUTIONARY THOUGHTS IN INDIA, ORATOR-PHILOSOPHER के रूप में जाना जाता है।
बिपिन चंद्र पाल का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
बिपिन चंद्र पाल का मुख्य विचार Passive resistance, Swadeshi boycotts, Vedantic spiritual nationalism, federalism and mass awakening पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
बिपिन चंद्र पाल की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
बिपिन चंद्र पाल की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
बिपिन चंद्र पाल का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर बिपिन चंद्र पाल के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
क्या बिपिन चंद्र पाल के शेरों के एस्थेटिक कार्ड डाउनलोड किए जा सकते हैं?
हाँ, आप 300 DPI वॉलपेपर क्वालिटी में टेक्स्ट के साथ तैयार कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं या डिज़ाइन स्टूडियो में कस्टमाइज़ कर सकते हैं।
बिपिन चंद्र पाल का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
बिपिन चंद्र पाल की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
तो फिर देर किस बात की?
कोई पंक्ति चुनिए, उसे अपना अंदाज़ दीजिए और भेज दीजिए। आपका पहला कार्ड बस कुछ टैप दूर है।







