मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Benjamin Franklin (बेंजामिन फ्रैंकलिन)
बेंजामिन फ्रैंकलिन (1706–1790) Polymath, Founding Father & Inventor के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।’— बेंजामिन फ्रैंकलिन
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— बेंजामिन फ्रैंकलिन
शेर #2 • शाही पन्ना
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,

‘साधु-संगत की छाया में जो का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अमर नाम जग में उसी का जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— बेंजामिन फ्रैंकलिन
शेr #3 • रूहानी शाम
साधु-संगत की छाया में जो का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,
अमर शेर और ग़ज़लें
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
साधु-संगत की छाया में जो का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अमर नाम जग में उसी का जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
अहंकार की दीवारें जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Antar ghat mein jab jyoti jagee priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Virah ka har ik aansoo banakar ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,माटी का चोला पाकर जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Roma-rom mein ram gaya preetam priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Aankhon ke raste dil mein utaraa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
नाम और दौलत तो माटी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Tere roop ki paavan jhaankee dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ki paavan jyoti jagaaee to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
धरती की छाती पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

सांस-सांस में याद तुम्हारी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दिल के फफोलों को देखकर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Dil ke phapholon ko dekhakar tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

दिल का आईना जब टूटा सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,आँसुओं की इस भाषा को केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Dil ka aaina jab tootaa so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Aansuon ki is bhaashaa ko keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
साधु-संगत की छाया में जो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

मन के कोने में सिमटी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Man ke kone mein simatee par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Jeevan ke is kathin mod par tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

गिरने में कोई हार नहीं मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,त्याग और सेवा की भावना से उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Girane mein koee haar nahi man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

समय का पहिया चलता जाए करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,कर्म की खेती में जो पसीना बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Karm ki khetee mein jo paseenaa bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
नदिया की धारा बहती जावे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सदाचार की पावन वेदी पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,शांति और संतोष का धन जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

गिरने में कोई हार नहीं जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,धैर्य की नौका पर सवार होकर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Girane mein koee haar nahi jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
संतन की संगति में आकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
नाम और दौलत तो माटी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नाम और दौलत तो माटी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

साधु वो ही जो अंतर उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Saadhu wo hi jo antar usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नैन मिले जब नैनन से तब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रियतम की याद में जो नैना जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

साधु वो ही जो अंतर भेद मिटा के देखा उसने संसार के मिथ्या मोह से स्वयं को मुक्त कर लिया,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Saadhu wo hi jo antar bhed mitaa ke dekhaa usane sansaar ke mithyaa moh se svayan ko mukt kar liyaa,Amrit svaroop us paramaatmaa mein to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
तेरी आँखों की झील में जो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

भवसागर की लहरों से जो है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Bhavasaagar ki laharon se jo hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jab man ki sab tarangen shaant hueen samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के चरणों में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैन मिले जब नैनन से तब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
तेरी आँखों की झील में जो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रियतम की याद में जो नैना सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
मन की वीणा बज उठी जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Saadhu purush ki vaanee kabhee nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अंतर में जब प्रेम समाया लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम के इस पावन तीरथ में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह की रात जब ढलने लगी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैन मिले जब नैनन से तब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Dhairy ka daaman jisane thaame use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे मिलन की आस में बीते अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Amar naam jag mein usee ka nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन धारा में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

नैनन आगे तू ही तू नाचे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Nainan aage too hi too naache do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Prem ke is paavan teerath mein motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
साँसों की सरगम में घुल गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम की चाहत में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अमर प्रेम की अमर कहानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Roma-rom mein ram gaya preetam haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem ki is paavan dhaaraa mein jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem galee ati saankaree jaamen jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Priyatam ki chaahat mein jisane utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनों के दर्पण में बसा जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,सच्चे आशिक़ की पहचान यही और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

सपनों के महल जब टूटे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Sapanon ke mahal jab toote patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Dard ka yeh gaharaa saagar tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
छाले पड़े हैं पाँवों में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
कोई न अपना इस जग में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

भीतर-भीतर घुटता जाए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Zindagi ki is soonee dagar par tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
टूटी नाव भँवर में फँसी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म के मारों की बस्ती में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब कोई सहारा न बचा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
सांस-सांस में याद तुम्हारी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दिल के फफोलों को देखकर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
तन्हाई के अँधियारे में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई सहारा न बचा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

आँखों के आँसू जब सूखे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Aankhon ke aansoo jab sookhe par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Toote dil ki is veenaa se tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
वक़्त की आँधी ने तोड़े यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,इस दर्द भरे दिल की सदा कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
छाले पड़े हैं पाँवों में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,आँसुओं की इस भाषा को अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

चंद साँसों की मोहलत में अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जीवन का असली आनंद वही जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Chand saanson ki mohalat mein agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jeevan ka asalee aanand vahee jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
सपनों के महल जब टूटे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
उम्र भर का सफ़र और लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस गहरी रात में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
तन्हाई के अँधियारे में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द का यह गहरा सागर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
तन्हाई के अँधियारे में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

अहंकार की दीवारें जब जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,सत्य और धर्म की राहों पर और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Ahankaar ki deevaaren jab jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Saty aur dharm ki raahon par aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब धैर्य की सीमा टूट गई अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
आँखों में जो नमी है वो सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
दर्द की रात में जब कोई सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस गहरी रात में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
दिल का आईना जब टूटा सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,आँसुओं की इस भाषा को केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

मन मंदिर में जो दीप उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,कर्म की खेती में जो पसीना का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Man mandir mein jo deep usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Karm ki khetee mein jo paseenaa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
बेंजामिन फ्रैंकलिन (Benjamin Franklin) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
बेंजामिन फ्रैंकलिन (1706–1790) Polymath, Founding Father & Inventor के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
बेंजामिन फ्रैंकलिन ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1706–1790 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, बेंजामिन फ्रैंकलिन की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को बेंजामिन फ्रैंकलिन ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
बेंजामिन फ्रैंकलिन की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, बेंजामिन फ्रैंकलिन हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
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“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic Poetryहर मौक़े और हर अपने के लिए संदेश
जिसके लिए लिखना है, उसे या कोई त्योहार चुनिए और तैयार संग्रह खोल लीजिए।
- पापा का जन्मदिनजिन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया
- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
- परिवार को सुप्रभातघर के ग्रुप के लिए सुबह की शुरुआत
- प्यार भरी शुभ रात्रिसोने से पहले भेजने लायक़ बातें
- दिवाली की बधाईअपनों के लिए रोशनी भरे संदेश
- होली की बधाईरंगों वाले संदेश दोस्तों के नाम
- ईद मुबारकअपनों तक पहुँचाइए ईद की ख़ुशी
- साथी को विदाईसहकर्मी के लिए अपनापन भरे अल्फ़ाज़
- सफलता पर बधाईकिसी की बड़ी जीत पर हौसला बढ़ाइए
- किसी की याद मेंजब दूरी कुछ ज़्यादा ही लंबी लगे
- दोस्त का जन्मदिनयार के लिए हँसी-ख़ुशी वाली दुआएँ
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कवि, त्योहार और स्टेटस
शेरों के पीछे की आवाज़ें पढ़िए, त्योहार की तैयारी कीजिए और स्टेटस के लिए छोटी पंक्ति उठाइए
बेंजामिन फ्रैंकलिन के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
बेंजामिन फ्रैंकलिन के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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बेंजामिन फ्रैंकलिन कौन थे?
बेंजामिन फ्रैंकलिन (1706–1790) Boston, Massachusetts, USA से ताल्लुक रखने वाले Polymath, Founding Father & Inventor के अग्रदूत थे, जिन्हें FOUNDING FATHER OF THE UNITED STATES, POLYMATH, INVENTOR OF LIGHTNING ROD & BIFOCALS, AUTHOR OF POOR RICHARD'S ALMANACK के रूप में जाना जाता है।
बेंजामिन फ्रैंकलिन का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
बेंजामिन फ्रैंकलिन का मुख्य विचार Self-cultivation through 13 virtues, pragmatic industry and frugality, scientific curiosity, civic civic institution building पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
बेंजामिन फ्रैंकलिन की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
बेंजामिन फ्रैंकलिन की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
बेंजामिन फ्रैंकलिन का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर बेंजामिन फ्रैंकलिन के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
क्या बेंजामिन फ्रैंकलिन के शेरों के एस्थेटिक कार्ड डाउनलोड किए जा सकते हैं?
हाँ, आप 300 DPI वॉलपेपर क्वालिटी में टेक्स्ट के साथ तैयार कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं या डिज़ाइन स्टूडियो में कस्टमाइज़ कर सकते हैं।
बेंजामिन फ्रैंकलिन का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
बेंजामिन फ्रैंकलिन की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
तो फिर देर किस बात की?
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