प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh (अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध')
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' आधुनिक खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम महाकवि हैं, जिनके महाकाव्य 'प्रियप्रवास' ने हिन्दी कविता को नई गरिमा दी।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' • DWIVEDI YUG (1865–1947)

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' • DWIVEDI YUG (1865–1947)
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‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
शेर #2 • शाही पन्ना
दीन-दुखी का आसरा बनकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
शेr #3 • रूहानी शाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,
अमर शेर और ग़ज़लें
दीन-दुखी का आसरा बनकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Priyatam ka anuraag hi jisakaa sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
नदिया की धारा बहती जावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मन के मैल को जिसने धोया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
अहंकार की दीवारें जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

साँसों की सरगम में घुल गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Saanson ki saragam mein ghul gaya doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Prem ka deepak antar mein jo jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
सत्य का दीप जब जलता है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Prem rang mein jo rang gaya palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Prem nagar ka vaasee banakar sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
कर्म की खेती जो जन बोवे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

ग़म का मारा पंछी जैसे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए दिल का दर्द चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Gham ka maaraa panchhee jaise cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Toote hue dil ka dard chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी में जो अमृत घोले स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

आशा का दीप जब बुझने रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Aashaa ka deep jab bujhane ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Zindagi ki is soonee dagar par to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,धैर्य का दामन जिसने थामे निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

कोई न अपना इस जग में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Koee na apanaa is jag mein par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Dard ki bhattee mein tapakar hi keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
साधु-संगत की छाया में जो सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,सत्य और धर्म की राहों पर सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Saty aur dharm ki raahon par saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य का दीप जब जलता है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हरि की कृपा का पावन साया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

जीवन का यह कठिन सफ़र मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,सदाचार के पावन नियमों पर अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Jeevan ka yeh kathin safar mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Sadaachaar ke paavan niyamon par apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

गिरने में कोई हार नहीं जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्संगति का पावन प्रभाव उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Girane mein koee haar nahi jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Satsangati ka paavan prabhaav use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,भवसागर की लहरों से जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
माटी का यह देह बना है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हरि की कृपा का पावन साया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

माया के इस झूठे जग मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जब आत्मा ने जाना अपना सत्य स्वरूप का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Maayaa ke is jhoothe jag man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jab aatmaa ne jaanaa apanaa saty svaroop ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम का दीपक अंतर में जो संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Antarman ke sannaate mein jab usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

शाश्वत शांति का अनुभव वही बिना किसी आवाज़ के राजा हो या रंक सब उसी मिट्टी में विलीन होते हैं,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं तब आत्मा अनादि और अनंत काल के पार शाश्वत धाम में पहुँच गई।
Shaashvat shaanti ka anubhav vahee binaa kisee aavaaz ke raajaa ho yaa rank sab usee mitti mein vileen hote hain,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen tab aatmaa anaadi aur anant kaal ke paar shaashvat dhaam mein pahunch gayi.
तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे रूप की पावन झांकी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन धारा में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे मिलन की आस में बीते प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम सुधा का रस जो चखा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Satkarmon ki amit kamaaee hi usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Santan ki sangati mein aakar man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जब से नैना रूप में उलझे और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Satkarmon ki amit jyoti jab man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Saadhu purush ki vaanee kabhee use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे मिलन की आस में बीते उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम सुधा का रस जो चखा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
साँसों की सरगम में घुल गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम की चाहत में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Parahit mein jisane jeevan saunpaa avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम नगर का वासी बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम बिना सब सूना जग में जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem ki paavan vedee par jisane barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Priyatam ke rang mein rang kar sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की इस पावन घाटी में जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम बिना सब सूना जग में संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे दीदार की एक झलक ने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

तेरे मिलन की आस में बीते हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Tere milan ki aas mein beete haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem ki is paavan dhaaraa mein utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
प्रेम बिना सब सूना जग में तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem ka deepak antar mein jo use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम सुधा का रस जो चखा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे मिलन की आस में बीते दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

आशा का दीप जब बुझने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Aashaa ka deep jab bujhane cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Gham ki is lanbee yaatraa mein keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
नैन मिले जब नैनन से तब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
वक़्त की आँधी ने तोड़े दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म के मारों की बस्ती में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
जिसके दिल पर बीत रही सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Waqt ke thaperon ne hamen so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
आँखों में जो नमी है वो हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
सपनों के महल जब टूटे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म की इस आँधी ने जब चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
ग़म का मारा पंछी जैसे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए दिल का दर्द चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

तन्हाई के अँधियारे में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Tanhaaee ke andhiyaare mein kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
नैनों से जो नीर बहे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
ग़म का मारा पंछी जैसे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दिल का आईना जब टूटा और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

चंद साँसों की मोहलत में अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Chand saanson ki mohalat mein agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jo doosaron ke sukh ki khaatir jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
आशा का दीप जब बुझने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
छाले पड़े हैं पाँवों में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब सबने मुँह फेर लिया तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
घायल की गति घायल जाने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,माटी के इस पुतले में जब उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Maatee ke is putale mein jab usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
तन्हाई के अँधियारे में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,टूटे हुए सपनों की किरचें जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
जिसके दिल पर बीत रही सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे दिल की इस वीणा से तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,टूटे हुए दिल का दर्द तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आशा का दीप जब बुझने रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,जो सबको अपना मान के चले बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Satkarmon ki amit poonjee hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Jo sabako apanaa maan ke chale bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
आशा का दीप जब बुझने रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' आधुनिक खड़ी बोली हिन्दी के प्रथम महाकवि हैं, जिनके महाकाव्य 'प्रियप्रवास' ने हिन्दी कविता को नई गरिमा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Dwivedi Yug (1865–1947) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' (1865–1947) Hindi/Dwivedi Yug साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की रचनाओं के केंद्र में राष्ट्रीय जागरण व भाषा-गौरव, प्रकृति सौन्दर्य व विरह, राधा-कृष्ण का उदात्त प्रेम, मानवीय कर्तव्य व मर्यादा, जीवन का यथार्थ दर्शन जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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