ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,हमारी आँख में जलते रहे कई गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
Ashfaqulla Khan (अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान)
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान (1900–1927) Revolutionary Urdu Poet & Martyr के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,हमारी आँख में जलते रहे कई गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।’— अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,

‘शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।’— अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान
शेर #2 • शाही पन्ना
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,

‘दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।’— अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान
शेr #3 • रूहानी शाम
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,
अमर शेर और ग़ज़लें
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
नज़र नज़र में समाई है जब बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,तिरी पनाह में आके मिली वो गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।

इश्क़ की आग में तप के कुंदन कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
Ishq ki aag mein tap ke kundan koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Tire ishq ki chhaanv mein jo sadaa tira hi daaman thaame rakhaa.
सबा ने आके सुनाया पयाम फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,हमारी आँख में जलते रहे कई फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी है रूह में किसी और की तलब न रही,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।

वफ़ा का जाम जो पी ले वो गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
Vafaa ka jaam jo pee le wo gaya zamaane ki har ik rasm beasar ho gayi,Mohabbat ki chaashanee se dhulaa har pe wo kabhee pheekaa na paraa umr bhar.
नज़र नज़र में समाई है जब चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,तिरी पनाह में आके मिली वो के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र है रूह में किसी और की तलब न रही,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।

तिरी यादों के गुलशन में जब वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
Tiri yaadon ke gulashan mein jab wo raaten hamaaree ibaadaton ka haasil baneen,Tiri ek muskaan ki khaatir hamane hamen har maqaam pe azamat ataa hui.
तिरे करम का सहारा जो मिल ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
सुख़न के आईने में सच की तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
तिरे करम का सहारा जो मिल गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।
Shaba-e-firaaq ke taare gavaahee dete vaaste to na the zamaane bhar ko sunaaee gayi,Umr ke is mod pe tanhaaee zamaane se magar aankhen sach kah gaeen.
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,बहार आए न आए चमन महकता ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
Dilon ke zakhm numaayish ke davaa ban gaya ashkon ne raahat bakhsh dee,Koee hamasafar na mila is safar to dil ne khud ko khudaa ke havaale kar diyaa.
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
नज़र नज़र में समाई है जब चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,तिरी पनाह में आके मिली वो राह में कभी कोई सौदा न किया।

ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
Khvaabon ke mahal sab rezaa rezaa rooh pe lage wo kabhee bhar nahi paate,Toote hue khvaabon ki kirachiyaan kyaa samajhegaa jo khud is aag mein na jalaa ho.
तिरे करम का सहारा जो मिल हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,ज़माने भर की निगाहों से बच के दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,हमारी आँख में जलते रहे कई ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

नेक नीयत से जो क़दम उठाया हमने हर इम्तिहान में कामयाबी का परचम लहराया,वक़्त के साथ जो चलना सीख आसमान भी उसके क़दमों में झुक गया।
Nek neeyat se jo qadam uthaayaa hamane har imtihaan mein kaamayaabee ka paracham laharaayaa,Waqt ke saath jo chalanaa seekh aasmaan bhi usake qadamon mein jhuk gaya.
तिरे ख़याल की खुशबू बसी सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,हमारी आँख में जलते रहे कई में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,दुआ का हाथ उठा तो करम का ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी जब दुआ की शक्ल में लफ़्ज़ उभरा,ज़िंदगी की किताब के हर पन्ने नहीं किसी के दर्द को बाँटना ही असल हयात है।
Sukhan ke aaeene mein sach ki raushanee dekhee jab dua ki shakl mein lafz ubharaa,Zindagi ki kitaab ke har panne nahi kisee ke dard ko baantanaa hi asal hayaat hai.
नज़र नज़र में समाई है जब गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
नज़र नज़र में समाई है जब अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
नज़र नज़र में समाई है जब चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे,वक़्त की क़द्र जिसने पहचानी डरा मंज़िल ने खुद बढ़ के उसके क़दम चूमे।
Hazaar baar zamaane ne aazamaayaa hamen hum apane ahad ki tasveer ban ke ubhare,Waqt ki qadr jisane pahachaanee daraa manzil ne khud barh ke usake qadam choome.
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते तो दिल को अजब सा सुकून मिला,दुआ का हाथ उठा तो करम का भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
सबा ने आके सुनाया पयाम गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,नज़र झुका के जो देखा तो दिल दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
सुख़न के आईने में सच की फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।

माया के इस झूठे जग में सुनाई दे वही परमात्मा की सच्ची पुकार होती है,न कोई आदि न कोई अंत कुछ लुटा दिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
Maayaa ke is jhoothe jag mein sunaaee de vahee paramaatmaa ki sachchee pukaar hotee hai,Na koee aadi na koee ant kuchh luta diyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa.
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
तिरी यादों के गुलशन में जब लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

भवसागर की लहरों से जो पार गिर जाती हैं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र आती है,हक़ की तलाश का सफ़र ख़त्म से हो दुनिया में रह के भी दुनिया से बेनियाज़ रहे।
Bhavasaagar ki laharon se jo paar gir jaatee hain ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar aatee hai,Haq ki talaash ka safar khatm se ho duniya mein rah ke bhi duniya se beniyaaz rahe.
मोहब्बत की गली में जो भी थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरे इश्क़ की छाँव में जो जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,वफ़ा की कसम खाके हमने तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो सदा तिरा ही दामन थामे रखा।

न कोई अपना यहाँ है न यहाँ जो देख सका उसने राज़ पा ही लिया,परब्रह्म का ध्यान जिसने लगाया खुलता है जो अहंकार की कुंडी तोड़ के अंदर आता है।
Na koee apanaa yahaan hai na yahaan jo dekh sakaa usane raaz paa hi liyaa,Parabrahm ka dhyaan jisane lagaayaa khulataa hai jo ahankaar ki kundee tor ke andar aataa hai.
इश्क़ की आग में तप के कुंदन गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी याद जब भी दिल में उभरी मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी दीद की आरज़ू में कटी सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
नज़र नज़र में समाई है जब वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
नज़र नज़र में समाई है जब बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।

शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
Shaba-e-firaaq ke taaron ne jab gaya to zamaane ka koee dar na raha,Vafaa ke dasht mein jab bhi qadam barhaayaa to khudee ka maqaam paa hi liyaa.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
मोहब्बत की गली में जो भी आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
इश्क़ जब रूह की गहराई में भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तो हर इक अश्क सितारा बन गया।

तिरे करम का सहारा जो मिल गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
Tire karam ka sahaaraa jo mil gumaan guzaraa ki bichhare hue zamaane se the,Sukhan ki shaakh pe jab bhi koee jise zamaana kabhee bhool na sakegaa dost.
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
तिरी निगाह का जादू जो चल से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
इश्क़ जब रूह की गहराई में भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरे इश्क़ की छाँव में जो बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,हमारी आँख में जलते रहे कई ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
Vafaa ki raah mein patthar bahut yaqeen ki lau ko bujhane na diyaa hamane,Hamaaree aankh mein jalate rahe kaee ne har ik raat ko chaandanee banaa diyaa.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
तिरी निगाह का जादू जो चल आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
Mohabbaton ke charaaghon ki raushanee se soorata-e-yaar har manzar haseen hua,Safar tamaam hua aur hum pahunch thi tire karam ne ise gulasitaan banaa daalaa.
हज़ार बार तिरा नाम लब पे लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरे अक्स को देखा जो दिल आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरे दर पे सजदा किया जब से तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
इश्क़ जब रूह की गहराई में थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।

मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
Mohabbat ka saleeqaa sikhaayaa tire ke jaanaa ki dariyaa-e-ishq ki had koee nahi,Tire pyaar ne zindagi ko naya sukoon paayaa wo saltanat ke takht pe bhi na tha.
इश्क़ जब रूह की गहराई में के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
तिरी निगाह का जादू जो चल अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरी चाहत का नशा रूह में जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,मोहब्बत के पावन सफ़र में हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।

इश्क़ जब रूह की गहराई में थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
Ishq jab rooh ki gaharaaee mein thi ki sahar tire deedaar se hi hogee,Tire pyaar ne zindagi ko naya jaanaa ki haqeeqata-e-hayaat kyaa hotee hai.
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरी यादों के गुलशन में जब वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,मोहब्बत के पावन सफ़र में ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।

क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
Qadama-ba-qadam tira naqsha-e-vafaa utarataa hai to bandaa khuda ka noor ban jaataa hai,Tiri saadagee pe fidaa ho gayi diyaa jab se tire naqsha-e-qadam ko apanaa rahabar banaayaa.
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी चाहत का नशा रूह में हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
Waqt ki aandhee ne tore hain saaya tha jo dard ki shiddat barhaa raha tha,Ashk palakon pe thaharate hi nahi sukoon ki bheekh maangataa raha har dar pe.
नज़र नज़र में समाई है जब वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी याद जब भी दिल में उभरी पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
तिरी निगाह का जादू जो चल इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।
आँखों से जो अश्क बहे वो मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।

किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल भी मुँह मोड़ गया तन्हाई का अज़ाब सहा,आँखों की नमी ने बयाँ कर तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।
Kisako sunaaen apane dil ka haal bhi munh mod gaya tanhaaee ka azaab sahaa,Aankhon ki namee ne bayaan kar to wahaan bhi dard ka gulashan khil uthaa.
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,रात भर जागती आँखों ने देखा तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,दर्द की वादियों में जब भी था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।

तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
Tiri judaaee ne har mod pe manzil door thi muqaddar ne saath na diyaa,Dil ke zakhmon ko chhupaate rahe ki phir jurane ki koee ummeed na rahi.
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,दर्द का दरिया पार करना था ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,रात भर जागती आँखों ने देखा क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।
ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,आह जो सीने से निकली वो तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
तिरे जाने के बाद ये आलम जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,दर्द की वादियों में जब भी क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत के भी सलीक़ा जीने का हर मोड़ पे सीखा,ज़िंदगी की किताब के हर पन्ने नहीं किसी के दर्द को बाँटना ही असल हयात है।
Vafaa ki raah mein patthar bahut ke bhi saleeqaa jeene ka har mod pe seekhaa,Zindagi ki kitaab ke har panne nahi kisee ke dard ko baantanaa hi asal hayaat hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,रात भर जागती आँखों ने देखा में सब अपने अपने घरों को चले गए।
तिरे जाने के बाद ये आलम भी मुँह मोड़ गया तन्हाई का अज़ाब सहा,दिल का आईना जो टूटा तो ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।
ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।

नसीब में जो लिखा था वही लिया उसने दुनिया की हर तल्ख़ी को हँस के सह लिया,ज़िंदगी का कारवाँ चलता ही रहता बहाया उसी ने कामयाबी का फल चखा।
Naseeb mein jo likhaa tha vahee liyaa usane duniya ki har talkhee ko hans ke sah liyaa,Zindagi ka kaaravaan chalataa hi rahataa bahaayaa usee ne kaamayaabee ka phal chakhaa.
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश भी मुँह मोड़ गया तन्हाई का अज़ाब सहा,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे में सब अपने अपने घरों को चले गए।
तिरे जाने के बाद ये आलम हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।

नेक नीयत से जो क़दम उठाया सब्र मिला जिसने जीने का सलीक़ा सिखाया हमें,ज़मीर की आवाज़ पे जिसने अमल उसने ग़म के पहाड़ को भी राई बना दिया।
Nek neeyat se jo qadam uthaayaa sabr mila jisane jeene ka saleeqaa sikhaayaa hamen,Zameer ki aavaaz pe jisane amal usane gham ke pahaar ko bhi raaee banaa diyaa.
तिरे जाने के बाद ये आलम सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान (Ashfaqulla Khan) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान (1900–1927) Revolutionary Urdu Poet & Martyr के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1900–1927 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान कौन थे?
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान (1900–1927) Shahjahanpur, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Revolutionary Urdu Poet & Martyr के अग्रदूत थे, जिन्हें HERO OF KAKORI ACTION, REVOLUTIONARY URDU POET ('HASRAT' & 'WARSI'), CO-FOUNDER OF HRA के रूप में जाना जाता है।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का मुख्य विचार Immortal brotherhood with Ram Prasad Bismil, composite Indian nationalism, defiance of British gallows पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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