कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,नेकी की राह पे जो जन अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Anandamayi Ma (आनंदमयी माँ)
आनंदमयी माँ (1896–1982) Bliss-Permeated Mother & Mystic के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,नेकी की राह पे जो जन अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— आनंदमयी माँ
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— आनंदमयी माँ
शेर #2 • शाही पन्ना
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,

‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— आनंदमयी माँ
शेr #3 • रूहानी शाम
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,
अमर शेर और ग़ज़लें
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अहंकार का त्याग किया जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,आँखों के रस्ते दिल में उतरा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Teri yaad ka paavan saaya priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Aankhon ke raste dil mein utaraa prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मोह-निशा से जो जन जागा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
माटी का यह देह बना है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
धरती की छाती पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,भवसागर की लहरों से जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

प्रेम रंग में जो रंग गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Prem rang mein jo rang gaya banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki is paavan ghaatee mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हृदय में जिसके दया बसी है मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Sachche aashiq ki pahachaan yahee ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नाम और दौलत तो माटी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

भीतर-भीतर घुटता जाए बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,अकेलेपन की इस राह पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Akelepan ki is raah par saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
नाम और दौलत तो माटी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए सपनों की किरचें चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Waqt ke thaperon ne hamen lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Toote hue sapanon ki kirachen chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
नाम और दौलत तो माटी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
संतन की संगति में आकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हरि की कृपा का पावन साया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

वक़्त की आँधी ने तोड़े सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस आँधी ने जब पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Waqt ki aandhee ne tore so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Gham ki is aandhee ne jab paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
अहंकार की दीवारें जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

मन मंदिर में जो दीप बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Man mandir mein jo deep binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Karmanyataa ka paavan vrat lekar vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,विपदाओं से जो कभी न डरा का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Vipadaaon se jo kabhee na daraa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
माटी का यह देह बना है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,भवसागर की लहरों से जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नदिया की धारा बहती जावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रेम की डोर में बंध गया जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

संतन की संगति में आकर धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,विपदाओं से जो कभी न डरा वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Santan ki sangati mein aakar dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Vipadaaon se jo kabhee na daraa woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
साधु-संगत की छाया में जो सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मोह-निशा से जो जन जागा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,धैर्य का दामन जिसने थामे व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
अहंकार की दीवारें जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,वैराग्य की इस पावन धारा में जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Antarman ke sannaate mein jab jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Vairaagy ki is paavan dhaaraa mein jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
अहंकार की दीवारें जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

घट-घट में वह एक अनंता व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जब से नैना रूप में उलझे एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम सुधा का रस जो चखा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
फासले मिट गए जब दिल से संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,आँखों के रस्ते दिल में उतरा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम की चाहत में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे मिलन की आस में बीते अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम का दीपक अंतर में जो और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी याद का पावन साया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Karm ki khetee jo jan bove ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Satsang ki nirmal gangaa mein use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम के इस पावन तीरथ में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे दीदार की एक झलक ने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Vaanee mein jo amrit ghole man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Parahit mein jisane jeevan saunpaa maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रियतम की याद में जो नैना संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के चरणों में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Amar naam jag mein usee ka us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

अहंकार की दीवारें जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Ahankaar ki deevaaren jab saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Shaanti aur santosh ka dhan jo nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जब से नैना रूप में उलझे और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

इश्क़ जब रूह में उतरता है डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम के इस पावन तीरथ में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Ishq jab rooh mein utarataa hai doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Prem ke is paavan teerath mein ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे रूप की पावन झांकी बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Nainan aage too hi too naache ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ki paavan jyoti jagaaee jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अंतर में जब प्रेम समाया सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे रूप की पावन झांकी हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

तेरे मिलन की आस में बीते दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Tere milan ki aas mein beete dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem nagar ka vaasee banakar motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
इश्क़ जब रूह में उतरता है तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैन मिले जब नैनन से तब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

विरह की अगन में जलता मन हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Virah ki agan mein jalataa man hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Dard ki is ekaant gufaa mein tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,मन मंदिर की पावन आरती मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
घायल की गति घायल जाने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,टूटे हुए सपनों की किरचें सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
आँखों में जो नमी है वो जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब आशा की हर किरण बुझी अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

अकेलेपन की धूप जब साए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Akelepan ki dhoop jab saae sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Jeevan ke is kathin mod par zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
छाले पड़े हैं पाँवों में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब सबने मुँह फेर लिया सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
दिल का आईना जब टूटा चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
भीतर-भीतर घुटता जाए बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,अकेलेपन की इस राह पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

आशा का दीप जब बुझने लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब सबने मुँह फेर लिया तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Aashaa ka deep jab bujhane lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Jab sabane munh pher liyaa tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
आशा का दीप जब बुझने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
उम्र भर का सफ़र और जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस गहरी रात में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
ग़म की तपती दुपहरी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
आँखों के आँसू जब सूखे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Karmanyataa ka paavan vrat lekar hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
विरह की अगन में जलता मन हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
उम्र भर का सफ़र और हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
टूटे दिल की ख़ामोशी में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए दिल का दर्द तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
आँखों में जो नमी है वो हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

गिरने में कोई हार नहीं मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,माटी के इस पुतले में जब का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Girane mein koee haar nahi mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Maatee ke is putale mein jab ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
दर्द की रात में जब कोई लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
विरह की अगन में जलता मन किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दिल के फफोलों को देखकर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब कोई सहारा न बचा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए सपनों की किरचें चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,माटी के इस पुतले में जब जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Zindagi aur kuchh nahi bas tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Maatee ke is putale mein jab jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
कोई न अपना इस जग में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,अंधेरी रात के सन्नाटे में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आनंदमयी माँ (Anandamayi Ma) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
आनंदमयी माँ (1896–1982) Bliss-Permeated Mother & Mystic के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
आनंदमयी माँ ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1896–1982 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, आनंदमयी माँ की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को आनंदमयी माँ ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
आनंदमयी माँ की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, आनंदमयी माँ हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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आनंदमयी माँ के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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आनंदमयी माँ कौन थे?
आनंदमयी माँ (1896–1982) Kheora, Brahmanbaria (now Bangladesh) से ताल्लुक रखने वाले Bliss-Permeated Mother & Mystic के अग्रदूत थे, जिन्हें JOY-PERMEATED MOTHER (ANANDAMAYI MA), MYSTIC OF VARANASI, REVERED BY YOGANANDA AND GANDHI के रूप में जाना जाता है।
आनंदमयी माँ का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
आनंदमयी माँ का मुख्य विचार Hari Katha hi katha hai, aur sab vritha vyatha hai (Only divine talk is worthwhile, all else is futility), pure joy of the Self पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
आनंदमयी माँ की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
आनंदमयी माँ की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
आनंदमयी माँ का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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आनंदमयी माँ की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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