छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके,बात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके।
Amir Khusro (अमीर ख़ुसरो)
हज़रत अमीर ख़ुसरो सूफ़ियाना शायरी, क़व्वाली और हिन्दवी भाषा के जनक थे, जिन्हें "तूतिए-हिन्द" (भारत का तोता) की उपाधि से नवाज़ा गया।
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‘छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके,बात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके।’— अमीर ख़ुसरो
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके,

‘गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस,चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस।’— अमीर ख़ुसरो
शेर #2 • शाही पन्ना
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस,

‘ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियां,कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जां न लेहो काहे लगाये छतियां।’— अमीर ख़ुसरो
शेr #3 • रूहानी शाम
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियां,
अमर शेर और ग़ज़लें
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस,चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस।
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियां,कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जां न लेहो काहे लगाये छतियां।
ख़ुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार,जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।

मन कुंतो मौला फ़ही अलीयुन मौला,दारा दिल-ए-दारा दिल-ए-दर दानी।
चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस,ख़ुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार।
ख़ुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
दारा दिल-ए-दारा दिल-ए-दर दानी,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।

तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,बात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके।
मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,ख़ुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार।
जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
बात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।

ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियां,बात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके।
जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार,ख़ुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार।
तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,बात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके।

बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,ख़ुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार।
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
कि ताब-ए-हिज्रां नदारम ऐ जां न लेहो काहे लगाये छतियां,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
मन कुंतो मौला फ़ही अलीयुन मौला,बात अगम कह दीनी रे मोसे नैना मिलाइके।

जो हर इंसान के एहसास का आईना है,ख़ुसरो दरिया प्रेम का उल्टी वाकी धार।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

अमीर ख़ुसरो कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

अमीर ख़ुसरो कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अमीर ख़ुसरो कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
अमीर ख़ुसरो कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
अमीर ख़ुसरो कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

अमीर ख़ुसरो कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
अमीर ख़ुसरो कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
अमीर ख़ुसरो (Amir Khusro) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
हज़रत अमीर ख़ुसरो सूफ़ियाना शायरी, क़व्वाली और हिन्दवी भाषा के जनक थे, जिन्हें "तूतिए-हिन्द" (भारत का तोता) की उपाधि से नवाज़ा गया।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
अमीर ख़ुसरो ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Delhi Sultanate & Sufi Synthesis के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, अमीर ख़ुसरो की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को अमीर ख़ुसरो ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
अमीर ख़ुसरो की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, अमीर ख़ुसरो हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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कवि, त्योहार और स्टेटस
शेरों के पीछे की आवाज़ें पढ़िए, त्योहार की तैयारी कीजिए और स्टेटस के लिए छोटी पंक्ति उठाइए
अमीर ख़ुसरो के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
अमीर ख़ुसरो के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
कोई अन्य सवाल है? संपर्क करें
अमीर ख़ुसरो को तूतिए-हिन्द की उपाधि क्यों मिली?
भारत की संस्कृति और मिठास का अद्वितीय वर्णन करने के कारण उन्हें "तूतिए-हिन्द" कहा गया।
अमीर ख़ुसरो के आध्यात्मिक गुरु कौन थे?
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया अमीर ख़ुसरो के पीर और आध्यात्मिक गुरु थे।
अमीर ख़ुसरो की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
अमीर ख़ुसरो की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
अमीर ख़ुसरो का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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अमीर ख़ुसरो का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
अमीर ख़ुसरो की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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