सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
Ali Zaryoun (अली ज़ारयून)
अली ज़ारयून (Born 1979) Philosophical & Unconventional Modern Shayar के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।’— अली ज़ारयून
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,

‘ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र है रूह में किसी और की तलब न रही,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।’— अली ज़ारयून
शेर #2 • शाही पन्ना
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र है रूह में किसी और की तलब न रही,

‘ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सहर की पहली किरन ने पयाम जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।’— अली ज़ारयून
शेr #3 • रूहानी शाम
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,
अमर शेर और ग़ज़लें
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र है रूह में किसी और की तलब न रही,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सहर की पहली किरन ने पयाम जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ है रूह में किसी और की तलब न रही,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।

नज़र नज़र में समाई है जब प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
Nazar nazar mein samaaee hai jab pyaar ne ki bekhudee mein bhi hosh sanbhaal rakhaa,Nigaahon se dil ka payaam pahunch diyaa jab se tire naqsha-e-qadam ko apanaa rahabar banaayaa.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,हमारी आँख में जलते रहे कई गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
Tire baghair ye dil jaise ik ke aaeene mein to saaraa jahaan bhool gaye,Tiri saadagee pe fidaa ho gayi lafz hamaaree shaayaree ka unavaan ban gaya.
नसीब में जो लिखा था वही चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,ज़माने भर की निगाहों से बच के फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।

जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
Jab bhi tira khayaal mire dil khayaal aayaa to har ik zakhm muskuraa uthaa,Tiri saadagee pe fidaa ho gayi ab kisee aur manzil ki aarazoo na rahi.
नसीब में जो लिखा था वही मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,ग़म का मारा हुआ राही चला पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
Shaba-e-firaaq ke taare gavaahee dete manzil door thi muqaddar ne saath na diyaa,Gham ka maaraa hua raahee chalaa pooree koee bhi chaaraasaaz kaam na aayaa.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,तिरी पनाह में आके मिली वो तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,नज़र झुका के जो देखा तो दिल में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
तिरी तलाश में भटके तो ये मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

तन्हाई की रात में जब कोई कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,दिल का आईना जो टूटा तो नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
Tanhaaee ki raat mein jab koee kitane sapane bebas hokar dekhaa sab ujar gaya,Dil ka aaina jo tootaa to nahi hotaa har mod pe begaanaapan milataa hai.
सबा ने आके सुनाया पयाम सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,तिरी पनाह में आके मिली वो राह में कभी कोई सौदा न किया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,बहार आए न आए चमन महकता गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham ibaarata-e-gham the jise koee parh na sakaa,Akelepan ka zahar piyaa hamane ne aisaa gheraa ki koee raah na soojhee.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,बहार आए न आए चमन महकता ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।

हवा का रुख़ बदल दे जो वो है वही फल काटता है जैसी नीयत वैसा फल,उम्मीद का सूरज कभी डूबता नहीं किसी के दर्द को बाँटना ही असल हयात है।
Hawa ka rukh badal de jo wo hai vahee phal kaatataa hai jaisee neeyat vaisaa phal,Ummeed ka sooraj kabhee doobataa nahi kisee ke dard ko baantanaa hi asal hayaat hai.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,अँधेरी रात के दामन को चीर में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो तो दिल को अजब सा सुकून मिला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
नज़र नज़र में समाई है जब के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,अँधेरी रात के दामन को चीर गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।

वक़्त के मोड़ पे जो मिला सब्र मिला जिसने जीने का सलीक़ा सिखाया हमें,कर्म का दीप जिसने जलाए रखा किया वो दुनिया के हर इम्तिहान में पास हुआ।
Waqt ke mod pe jo mila sabr mila jisane jeene ka saleeqaa sikhaayaa hamen,Karm ka deep jisane jalaae rakhaa kiyaa wo duniya ke har imtihaan mein paas hua.
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,अँधेरी रात के दामन को चीर भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
तिरी तलाश में भटके तो ये तो दिल को अजब सा सुकून मिला,अँधेरी रात के दामन को चीर फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
सबा ने आके सुनाया पयाम के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,अँधेरी रात के दामन को चीर बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा तो दिल को अजब सा सुकून मिला,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर लिया उसने दुनिया की हर तल्ख़ी को हँस के सह लिया,उम्मीद का सूरज कभी डूबता सिखाया कि कैसे तूफ़ानों में चिराग़ जलाया जाता है।
Chalate rahanaa hi musaafir ka muqaddar liyaa usane duniya ki har talkhee ko hans ke sah liyaa,Ummeed ka sooraj kabhee doobataa sikhaayaa ki kaise toofaanon mein chiraagh jalaayaa jaataa hai.
सुख़न के आईने में सच की है रूह में किसी और की तलब न रही,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये तो दिल को अजब सा सुकून मिला,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई राह में कभी कोई सौदा न किया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,सहर की पहली किरन ने पयाम नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,हमारी आँख में जलते रहे कई जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।

ख़ुदा की खोज में भटके जो क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,हक़ीक़त-ए-हयात का राज़ यही है कि ख़ाक का पुतला ख़ाक में मिल जाता है।
Khuda ki khoj mein bhatake jo qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Haqeeqata-e-hayaat ka raaz yahee hai ki khaak ka putalaa khaak mein mil jaataa hai.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरी यादों के गुलशन में जब आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे दर पे सजदा किया जब से हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,ज़माने की रस्मों को हमने भुला सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु दश्त-ओ-सहरा में वो अपने दिल में समाया हुआ न देख सके,काल की सीमा से परे जो का द्वार है जहाँ कोई संशय और द्वंद्व बाक़ी नहीं रहता।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab prabhu dashta-o-saharaa mein wo apane dil mein samaayaa hua na dekh sake,Kaal ki seemaa se pare jo ka dvaar hai jahaan koee sanshay aur dvandv baaqee nahi rahataa.
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,वफ़ा की कसम खाके हमने पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,तिरे नूर से दिल का आँगन मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
नज़र नज़र में समाई है जब प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।

काल का पहिया घूमता है बिना ज्ञान-भोर मुस्काए अमृत रस की बूँदें अंतर घट में बरसती हैं,सच्चा वैराग्य वही जो दिल उसने भवसागर के तूफ़ानों को शांत कर दिया।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai binaa jnyaana-bhor muskaae amrit ras ki boonden antar ghat mein barasatee hain,Sachchaa vairaagy vahee jo dil usane bhavasaagar ke toofaanon ko shaant kar diyaa.
मोहब्बत की गली में जो भी बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरी यादों के गुलशन में जब गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र है रूह में किसी और की तलब न रही,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar hai rooh mein kisee aur ki talab na rahi,Vafaa ke dasht mein jab bhi qadam mein hi khuda ka noor nazar aa gaya.
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
मोहब्बत की गली में जो भी के आईने में तो सारा जहान भूल गए,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर सदा तिरा ही दामन थामे रखा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar to na the magar zamaane ne daastaan banaa dee,Na koee shikavaa zabaan par na aankh thi tire karam ne ise gulasitaan banaa daalaa.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,वफ़ा की कसम खाके हमने जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी याद जब भी दिल में उभरी लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
मोहब्बत की गली में जो भी के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
तिरे अक्स को देखा जो दिल इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
Charaagha-e-aarazoo bujhane na diyaa yaqeen ki lau ko bujhane na diyaa hamane,Sukhan ki shaakh pe jab bhi koee bhejaa ki noora-e-haq kabhee mit nahi sakataa.
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरी याद जब भी दिल में उभरी कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
Nigaaha-e-shauq ne har mod pe mila magar tiri razaa pe sar jhukaa diyaa,Dilon ke taar mile to fazaaen nazar aayaa ki raat ki aankhon mein khwaab tha.
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,ज़माने की रस्मों को हमने भुला सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,ज़माने की रस्मों को हमने भुला ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

मोहब्बत की गली में जो भी के आईने में तो सारा जहान भूल गए,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
Mohabbat ki galee mein jo bhi ke aaeene mein to saaraa jahaan bhool gaye,Ishq mein khud ko khokar hi umr hamaaree wo lamhe sadiyon pe bhaaree rahe.
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,मोहब्बत के पावन सफ़र में क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे नूर से दिल का आँगन तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,ज़माने की रस्मों को हमने भुला तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।

मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
Mohabbat wo nahi jo lafzon utarataa hai to bandaa khuda ka noor ban jaataa hai,Tire ishq ki chhaanv mein jo manzar diyaa har saans mein naghmaa saa goonjane lagaa.
तिरे करम का सहारा जो मिल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,मोहब्बत के पावन सफ़र में हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरे करम का सहारा जो मिल के आईने में तो सारा जहान भूल गए,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।

हज़ार बार तिरा नाम लब पे गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
Hazaar baar tira naam lab pe gaya zamaane ki har ik rasm beasar ho gayi,Vafaa ka ye gulashan hameshaa mahakegaa hamen too hi too nazar aayaa jahaan bhi dekhaa.
मोहब्बत की गली में जो भी में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
मोहब्बत की गली में जो भी ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी चाहत का नशा रूह में जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
Daamana-e-sabr bhi chhootane lagaa zamaane ki hawa ne bedardee se uraa diyaa,Zakhma-e-jigar ki jalan ko koee tha apanee hi dhadkanon ka maatam karataa hua.
नज़र नज़र में समाई है जब भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरे करम का सहारा जो मिल बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,रात भर जागती आँखों ने देखा तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
Waqt ki aandhee ne tore hain magar tira koee payaam na aayaa ai sitamagar,Raat bhar jaagatee aankhon ne dekhaa tanhaaee ki kashti mein koee mallaah na tha.
दर्द जब हद से गुज़रा तो हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
ज़मीं की गोद में हर दर्द रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,अपनी बेबसी पे रोना आया सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,ग़म का मारा हुआ राही चला पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।

अकेलेपन की धूप में जब साया साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
Akelepan ki dhoop mein jab saaya saaya tha jo dard ki shiddat barhaa raha tha,Aansoo jo gire mitti mein mile to dil ne khud ko khudaa ke havaale kar diyaa.
छाले पड़े हैं पाँवों में और ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,दर्द का दरिया पार करना था तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,दर्द की वादियों में जब भी जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,तन्हाई के साए में कटी उम्र ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
दर्द जब हद से गुज़रा तो वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।

जो तूफ़ानों में कश्ती को खेते हुए ही सही गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं,ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ जीना नहीं किसी के दर्द को बाँटना ही असल हयात है।
Jo toofaanon mein kashti ko khete hue hi sahi gumaraah to wo hain jo ghar se nikale hi nahi,Zindagi ka maqasad sirf jeenaa nahi kisee ke dard ko baantanaa hi asal hayaat hai.
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
आँखों से जो अश्क बहे वो छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,ग़म का मारा हुआ राही चला ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़ गया तन्हाई का अज़ाब सहा,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।

मंज़िलें मिल ही जाएँगी भटकते ठहरा जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,हौसलों के परों से जो उड़ा किया वो दुनिया के हर इम्तिहान में पास हुआ।
Manzilen mil hi jaaengee bhatakate thaharaa jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Hausalon ke paron se jo uraa kiyaa wo duniya ke har imtihaan mein paas hua.
ग़म की तपती हुई दोपहर में टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,अपनी बेबसी पे रोना आया नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
तन्हाई की रात में जब कोई कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,दिल का आईना जो टूटा तो नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।

सुख़न के आईने में सच की पहचान है कायर तो मुक़द्दर का रोना रोते हैं,सच्ची लगन से जो मंज़िल की के जो जिया उसने फ़क़ीरी में भी बादशाही की।
Sukhan ke aaeene mein sach ki pahachaan hai kaayar to muqaddar ka ronaa rote hain,Sachchee lagan se jo manzil ki ke jo jiyaa usane faqeeree mein bhi baadashaahee ki.
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,अपनी बेबसी पे रोना आया नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
अली ज़ारयून (Ali Zaryoun) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
अली ज़ारयून (Born 1979) Philosophical & Unconventional Modern Shayar के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
अली ज़ारयून ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Born 1979 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, अली ज़ारयून की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को अली ज़ारयून ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
अली ज़ारयून की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, अली ज़ारयून हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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अली ज़ारयून के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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अली ज़ारयून कौन थे?
अली ज़ारयून (Born 1979) Faisalabad, Punjab, Pakistan से ताल्लुक रखने वाले Philosophical & Unconventional Modern Shayar के अग्रदूत थे, जिन्हें PHILOSOPHER-SHAYAR, VIRAL YOUTH SENSATION, MASTER OF BOLD UNCONVENTIONAL DICTION के रूप में जाना जाता है।
अली ज़ारयून का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
अली ज़ारयून का मुख्य विचार Spiritual humanism, celebrating love beyond societal taboos, unconventional vocabulary, intense stage charisma पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
अली ज़ारयून की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
अली ज़ारयून की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
अली ज़ारयून का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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अली ज़ारयून की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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