अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम राह में कभी कोई सौदा न किया।
Ahmad Nadeem Qasmi (अहमद नदीम क़ासमी)
अहमद नदीम क़ासमी (1916–2006) Progressive Giant of Urdu Literature के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम राह में कभी कोई सौदा न किया।’— अहमद नदीम क़ासमी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,

‘सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।’— अहमद नदीम क़ासमी
शेर #2 • शाही पन्ना
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,

‘मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की राह में कभी कोई सौदा न किया।’— अहमद नदीम क़ासमी
शेr #3 • रूहानी शाम
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,
अमर शेर और ग़ज़लें
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की राह में कभी कोई सौदा न किया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।

शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,तिरी दीद की आरज़ू में कटी हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
Shaba-e-firaaq mein bhi ik ummeed gaya zamaane ki har ik rasm beasar ho gayi,Tiri deed ki aarazoo mein katee hamen too hi too nazar aayaa jahaan bhi dekhaa.
नसीब में जो लिखा था वही बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी है रूह में किसी और की तलब न रही,सहर की पहली किरन ने पयाम थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,वफ़ा की कसम खाके हमने तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
Tire jamaal ki khaamosh raushanee mein bayaan ho ye to khaamosh nazar ki zabaan hai,Vafaa ki kasam khaake hamane tira ek lafza-e-mohabbat jo dil ko chhoo gaya.
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
सबा ने आके सुनाया पयाम चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,बहार आए न आए चमन महकता ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
नज़र नज़र में समाई है जब सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।

तिरी तलब में जो काटे हैं दिन कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
Tiri talab mein jo kaate hain din koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Tiri khaamoshi mein chhupaa pyaar dekhaa hayaat hamane duniya ke thaath ko thokar maar dee.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,दुआ का हाथ उठा तो करम का तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,दुआ का हाथ उठा तो करम का रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।

यक़ीं की लौ को जलाए रखा तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की राह में कभी कोई सौदा न किया।
तिरे करम का सहारा जो मिल यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी राह में कभी कोई सौदा न किया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
नज़र नज़र में समाई है जब सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।

सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
Safar tamaam hua aur hum nahi hamadard na mila to khuda ko yaad kiyaa,Aansoo jo gire mitti mein mile falak tak pahunchee magar zameen khaamosh rahi.
ख़ुदी को खो के जो पाया वो सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी तो दिल को अजब सा सुकून मिला,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई तो दिल को अजब सा सुकून मिला,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,तिरी पनाह में आके मिली वो आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

ज़मीं की गोद में हर दर्द साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,रात भर जागती आँखों ने देखा ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।
Zameen ki god mein har dard saaya tha jo dard ki shiddat barhaa raha tha,Raat bhar jaagatee aankhon ne dekhaa ye to dariya ki tarah bahate hi chale gaye.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,नज़र झुका के जो देखा तो दिल ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।

वक्त की बहती नदी का कभी हमें हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे,इंसानियत का फ़र्ज़ जिसने निभाया नहीं गर यक़ीं की आँख से देखा जाए।
Waqt ki bahatee nadee ka kabhee hamen hum apane ahad ki tasveer ban ke ubhare,Insaaniyat ka farz jisane nibhaayaa nahi gar yaqeen ki aankh se dekhaa jaae.
सबा ने आके सुनाया पयाम मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।

ज़िंदगी का हर लम्हा इक नया हिम्मत रख चट्टानें भी रास्ता देने पे मजबूर होंगी,सफ़र की कठिनाइयों से जो न गया वो ज़माने की हर बाज़ी जीत गया।
Zindagi ka har lamhaa ik naya himmat rakh chattaanen bhi raasta dene pe majaboor hongee,Safar ki kathinaaiyon se jo na gaya wo zamaane ki har baazee jeet gaya.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,नज़र झुका के जो देखा तो दिल गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
तिरे करम का सहारा जो मिल ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।

ठोकरों से संभलना ही ज़िंदगी का आवाज़ के राजा हो या रंक सब मिट्टी में मिलते हैं,नेक नामी ही असल दौलत है काँटे दोनों हैं काँटों पे चलके ही मंज़िल मिलती है।
Thokaron se sanbhalanaa hi zindagi ka aavaaz ke raajaa ho yaa rank sab mitti mein milate hain,Nek naamee hi asal daulat hai kaante donon hain kaanton pe chalake hi manzil milatee hai.
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,दुआ का हाथ उठा तो करम का दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।

जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र कि खुदी ही खुदा का आईना थी हम बेख़बर थे,दुनिया की हर शय नश्वर है गया उसने ख़ुदा की पहचान हासिल कर ली।
Jo baahar dhoondhataa raha wo umr ki khudee hi khudaa ka aaina thi hum bekhabar the,Duniya ki har shay nashvar hai gaya usane khuda ki pahachaan haasil kar lee.
नज़र नज़र में समाई है जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
तिरे अक्स को देखा जो दिल के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी दीद की आरज़ू में कटी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।

भवसागर की लहरों से जो पार जिसने जान लिया वो दुनिया के हर ख़ौफ़ से आज़ाद हो गया,जो अपने आप से वाक़िफ़ हो नुमायाँ है देखने वाली आँख चाहिए पहचानने के लिए।
Bhavasaagar ki laharon se jo paar jisane jaan liyaa wo duniya ke har khauf se aazaad ho gaya,Jo apane aap se vaaqif ho numaayaan hai dekhane vaalee aankh chaahie pahachaanane ke lie.
इश्क़ जब रूह की गहराई में आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,ज़माने की रस्मों को हमने भुला हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,मोहब्बत के पावन सफ़र में तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,तिरी दीद की आरज़ू में कटी हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

वजूद-ओ-अदम के चक्कर से जो वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर और प्रकाशमान है,दुनिया की हर शय नश्वर है नुमायाँ है देखने वाली आँख चाहिए पहचानने के लिए।
Vajooda-o-adam ke chakkar se jo vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar aur prakaashamaan hai,Duniya ki har shay nashvar hai numaayaan hai dekhane vaalee aankh chaahie pahachaanane ke lie.
तिरे करम का सहारा जो मिल वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
इश्क़ जब रूह की गहराई में आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,ज़माने की रस्मों को हमने भुला हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।

नज़र नज़र में समाई है जब में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन के आईने में तो सारा जहान भूल गए,ज़माने की रस्मों को हमने भुला मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।

मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
Mohabbaton ke charaaghon ki raushanee sabaq mila ki khudee hi asal manzil hai,Yaqeen ka noor jo seene mein jaag dekar bhi hamane apanaa maan bachaae rakhaa.
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
नज़र नज़र में समाई है जब में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरी निगाह का जादू जो चल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
Mohabbaton ke charaaghon ki raushanee naya manzar mohabbat ka pahachaan liyaa,Dilon ke taar mile to fazaaen hans ke hum apane zameer ke saath zinda rahe.
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,वफ़ा की कसम खाके हमने तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
तिरी यादों के गुलशन में जब नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,ज़माने की रस्मों को हमने भुला क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
तिरी निगाह का जादू जो चल के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी दीद की आरज़ू में कटी हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।

मोहब्बत की गली में जो भी आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरी चाहत का नशा रूह में सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरी निगाह का जादू जो चल ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।

तिरी आँखों की गहराइयों में खो भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
Tiri aankhon ki gaharaaiyon mein kho bhi qadam rakhaa to har gham khaar banake bikhar gaya,Ishq ka rang jo charh gaya rooh tira ek lafza-e-mohabbat jo dil ko chhoo gaya.
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
तिरे करम का सहारा जो मिल है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
मोहब्बत की गली में जो भी उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।

तिरी यादों के गुलशन में जब है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
नज़र नज़र में समाई है जब आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे नूर से दिल का आँगन मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे दर पे सजदा किया जब से हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।

तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
Tire qurb ki ik gharee ke koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Tire ishq ki chhaanv mein jo kyonki ise hamane apane khoona-e-jigar se seenchaa hai.
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,वफ़ा की कसम खाके हमने मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

अकेलेपन की धूप में जब साया हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,दर्द की वादियों में जब भी था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
Akelepan ki dhoop mein jab saaya hain ki hamane ashkon ki baarish mein raat kaatee,Dard ki vaadiyon mein jab bhi tha wo saveraa jo kabhee laut ke na aayaa.
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
मोहब्बत की गली में जो भी बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
ग़म की तपती हुई दोपहर में पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।

कोई पुकार न थी बस ख़ामोश यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र में सब अपने अपने घरों को चले गए।
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,दिल का आईना जो टूटा तो मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।

ज़मीं की गोद में हर दर्द हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,अपनी बेबसी पे रोना आया तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
Zameen ki god mein har dard hain ki hamane ashkon ki baarish mein raat kaatee,Apanee bebasee pe ronaa aayaa tanhaaee ki kashti mein koee mallaah na tha.
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,आँखों की नमी ने बयाँ कर मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।

मंज़िलें मिल ही जाएँगी भटकते साहिल न रुका जो बहता रहा वही समंदर में मिला,इंसानियत का फ़र्ज़ जिसने निभाया पे हमने सच और ईमानदारी की इबारत लिखी।
Manzilen mil hi jaaengee bhatakate saahil na rukaa jo bahataa raha vahee samandar mein mila,Insaaniyat ka farz jisane nibhaayaa pe hamane sach aur eemaanadaaree ki ibaarat likhee.
अकेलेपन की धूप में जब साया हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,दर्द की वादियों में जब भी था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं भी मुँह मोड़ गया तन्हाई का अज़ाब सहा,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे दिया वो दर्द जो लफ़्ज़ों में न समा सका।
छाले पड़े हैं पाँवों में और मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।

मुसीबतों से घबरा के जो बैठ हिम्मत रख चट्टानें भी रास्ता देने पे मजबूर होंगी,वक़्त की क़द्र जिसने पहचानी कहा उसका रुतबा फ़रिश्तों से भी बुलंद हुआ।
Museebaton se ghabaraa ke jo baith himmat rakh chattaanen bhi raasta dene pe majaboor hongee,Waqt ki qadr jisane pahachaanee kahaa usakaa rutabaa farishton se bhi buland hua.
तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,दर्द की वादियों में जब भी तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,रात भर जागती आँखों ने देखा ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
दिल के वीराने में बस एक मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे दिया वो दर्द जो लफ़्ज़ों में न समा सका।
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।

ठोकरों से संभलना ही ज़िंदगी का मोड़ पे जो साबित क़दम रहा वही सुरख़रू हुआ,नेकियों की पूंजी जो संग लेकर डरा मंज़िल ने खुद बढ़ के उसके क़दम चूमे।
Thokaron se sanbhalanaa hi zindagi ka mod pe jo saabit qadam raha vahee surakharoo hua,Nekiyon ki poonjee jo sang lekar daraa manzil ne khud barh ke usake qadam choome.
ग़म की तपती हुई दोपहर में कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,रात भर जागती आँखों ने देखा था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
अहमद नदीम क़ासमी (Ahmad Nadeem Qasmi) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
अहमद नदीम क़ासमी (1916–2006) Progressive Giant of Urdu Literature के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
अहमद नदीम क़ासमी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1916–2006 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, अहमद नदीम क़ासमी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को अहमद नदीम क़ासमी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
अहमद नदीम क़ासमी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, अहमद नदीम क़ासमी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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अहमद नदीम क़ासमी के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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अहमद नदीम क़ासमी कौन थे?
अहमद नदीम क़ासमी (1916–2006) Anga, Khushab, Punjab से ताल्लुक रखने वाले Progressive Giant of Urdu Literature के अग्रदूत थे, जिन्हें GRAND OLD MAN OF URDU LETTERS, SECRETARY OF PROGRESSIVE WRITERS' ASSOCIATION, EDITOR OF 'FUNOON' के रूप में जाना जाता है।
अहमद नदीम क़ासमी का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
अहमद नदीम क़ासमी का मुख्य विचार Progressive humanism, dignity of peasant labor, nurturing generations of young writers through 'Funoon', social justice पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
अहमद नदीम क़ासमी की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
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इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
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