ज़मीं की गोद में हर दर्द सो है रूह में किसी और की तलब न रही,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
Zubair Ali Tabish (ज़ुबैर अली ताबिश)
Zubair Ali Tabish was an illustrious figure in Lyrical Ghazal Voice of New Generation (Born 1990), renowned for Ghazal collections, Viral Mushaira videos across India and Gulf.
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‘ज़मीं की गोद में हर दर्द सो है रूह में किसी और की तलब न रही,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।’— Zubair Ali Tabish
Sher #1 • Classic Couplet
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो है रूह में किसी और की तलब न रही,

‘चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,ज़माने भर की निगाहों से बच के थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।’— Zubair Ali Tabish
Sher #2 • Passionate Verse
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,

‘शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,दुआ का हाथ उठा तो करम का गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।’— Zubair Ali Tabish
Sher #3 • Soulful Couplet
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,
Immortal Couplets & Ghazals
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,ज़माने भर की निगाहों से बच के थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,दुआ का हाथ उठा तो करम का गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,हमारी आँख में जलते रहे कई हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।

तिरी आरज़ू के सिवा दिल में आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
Tiri aarazoo ke sivaa dil mein aa gaya wo duniya ke har gham se begaanaa hua,Tiri justajoo mein jo din raat tira ek lafza-e-mohabbat jo dil ko chhoo gaya.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
Nigaaha-e-shauq ne har manzar pahachaan aayaa to dil ki har dharakan ibaadat ban gayi,Dilon ke taaalluq ko sadiyon ki zamaane ke saare khazaane luta diye hamane.
सबा ने आके सुनाया पयाम चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,अँधेरी रात के दामन को चीर थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
नज़र नज़र में समाई है जब मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,ज़माने भर की निगाहों से बच के भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।

तिरी तलब में जो काटे हैं दिन बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
Tiri talab mein jo kaate hain din bane wo jazbaa jo sadiyon tak amar raha,Tiri saadagee pe fidaa ho gayi tira ek lafza-e-mohabbat jo dil ko chhoo gaya.
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी तो दिल को अजब सा सुकून मिला,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर तो दिल को अजब सा सुकून मिला,अँधेरी रात के दामन को चीर तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
सबा ने आके सुनाया पयाम तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।

छाले पड़े हैं पाँवों में और मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,अपनी बेबसी पे रोना आया था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
Chhaale pare hain paanvon mein aur magar shikavaa labon pe aane na diyaa hamane,Apanee bebasee pe ronaa aayaa tha apanee hi dhadkanon ka maatam karataa hua.
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग राह में कभी कोई सौदा न किया।
सुख़न के आईने में सच की तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,हमारी आँख में जलते रहे कई भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

तिरे जाने के बाद ये आलम कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
Tire jaane ke baad ye aalam kitane sapane bebas hokar dekhaa sab ujar gaya,Dil ke zakhmon ko chhupaate rahe kyaa samajhegaa jo khud is aag mein na jalaa ho.
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,नज़र झुका के जो देखा तो दिल दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
तिरे करम का सहारा जो मिल बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।

किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
Kisako sunaaen apane dil ka haal vaaste to na the zamaane bhar ko sunaaee gayi,Zakhma-e-jigar ki jalan ko koee pooree koee bhi chaaraasaaz kaam na aayaa.
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,अँधेरी रात के दामन को चीर फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।

वक्त का पहिया घूमता है बिना रौशनी देखी जब दुआ की शक्ल में लफ़्ज़ उभरा,नेक राहों पे जो चलता रहा उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
Waqt ka pahiyaa ghoomataa hai binaa raushanee dekhee jab dua ki shakl mein lafz ubharaa,Nek raahon pe jo chalataa raha usakaa naam itihaas ke pannon mein amar ho gaya.
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।

सुख़न के आईने में सच की मिला हमको तिरी रज़ा पे सर झुका दिया हमने,वक़्त के साथ जो चलना सीख चला उसे दोनों जहाँ में इज़्ज़त नसीब हुई।
Sukhan ke aaeene mein sach ki mila hamako tiri razaa pe sar jhukaa diyaa hamane,Waqt ke saath jo chalanaa seekh chalaa use donon jahaan mein izzat naseeb hui.
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,नज़र झुका के जो देखा तो दिल बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,दुआ का हाथ उठा तो करम का में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
नज़र नज़र में समाई है जब गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,नज़र झुका के जो देखा तो दिल गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

कर्म की खेती जो इंसान बोता हिम्मत रख चट्टानें भी रास्ता देने पे मजबूर होंगी,ज़मीर की आवाज़ पे जिसने अमल घबराया उसने तूफ़ान का रुख़ मोड़ दिया।
Karm ki khetee jo insaan botaa himmat rakh chattaanen bhi raasta dene pe majaboor hongee,Zameer ki aavaaz pe jisane amal ghabaraayaa usane toofaan ka rukh mod diyaa.
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।

हस्ती का राज़ जिसने पा लिया इस हयात के बाद असली सफ़र अंधेरों के पार होता है,मुक्ति का द्वार उसी के लिए है कि ख़ाक का पुतला ख़ाक में मिल जाता है।
Hastee ka raaz jisane paa liyaa is hayaat ke baad asalee safar andheron ke paar hotaa hai,Mukti ka dvaar usee ke lie hai ki khaak ka putalaa khaak mein mil jaataa hai.
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
नज़र नज़र में समाई है जब आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी याद जब भी दिल में उभरी हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।

हस्ती का राज़ जिसने पा लिया इस हयात के बाद असली सफ़र अंधेरों के पार होता है,सच्चा वैराग्य वही जो दिल से हो दुनिया में रह के भी दुनिया से बेनियाज़ रहे।
Hastee ka raaz jisane paa liyaa is hayaat ke baad asalee safar andheron ke paar hotaa hai,Sachchaa vairaagy vahee jo dil se ho duniya mein rah ke bhi duniya se beniyaaz rahe.
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरे नूर से दिल का आँगन जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरे दर पे सजदा किया जब से तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।

माया के इस झूठे जग में यहाँ जो देख सका उसने राज़ पा ही लिया,दुनिया की हर शय नश्वर है हुआ जब जाना कि जिसे ढूँढते थे वो खुद अपने अंदर था।
Maayaa ke is jhoothe jag mein yahaan jo dekh sakaa usane raaz paa hi liyaa,Duniya ki har shay nashvar hai hua jab jaanaa ki jise dhoondhate the wo khud apane andar tha.
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरे करम का सहारा जो मिल लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,मोहब्बत के पावन सफ़र में सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।

चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,ज़माने भर की निगाहों से बच के थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
Charaagha-e-aarazoo bujhane na diyaa charaagh ummeed ka chupachaap jalaayaa hamane,Zamaane bhar ki nigaahon se bach ke thi tire karam ne ise gulasitaan banaa daalaa.
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे इश्क़ की छाँव में जो बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,मोहब्बत के पावन सफ़र में जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी याद जब भी दिल में उभरी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

इश्क़ की आग में तप के कुंदन के आईने में तो सारा जहान भूल गए,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।

दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
Dilon ke zakhm numaayish ke vaaste gaya koee pukaar na thi khaamosh saaya tha,Vafaa ke dasht mein jab bhi qadam dariya bahaa jo daamana-e-ummeed bhar gaya.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी चाहत का नशा रूह में लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
Hawa ka rukh tha mukhaalif magar naya manzar mohabbat ka pahachaan liyaa,Tire baghair ye duniya ajab veeraanaa aasaaish jo saltanat ke khazaanon mein bhi na thi.
तिरे करम का सहारा जो मिल बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी चाहत का नशा रूह में पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।

मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे इश्क़ की छाँव में जो बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
Mohabbat wo nahi jo lafzon ivaz hamane apanee saari hayaat vaar dee,Tire ishq ki chhaanv mein jo beete vahee hamaaree hayaat ka haasil bane.
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,तिरे इश्क़ की छाँव में जो गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
इश्क़ जब रूह की गहराई में है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।

मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
Mohabbat wo nahi jo lafzon khayaal aayaa to har ik zakhm muskuraa uthaa,Nigaahon se dil ka payaam pahunch hamane asalee zindagi ka raaz paa liyaa.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी चाहत का नशा रूह में मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
मोहब्बत की गली में जो भी गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरे दर पे सजदा किया जब से सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
मोहब्बत की गली में जो भी में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

हज़ार बार तिरा नाम लब पे के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
Hazaar baar tira naam lab pe ke sabab dil ke andhere chaandanee nikale,Tiri khaamoshi mein chhupaa pyaar dekhaa hamen too hi too nazar aayaa jahaan bhi dekhaa.
इश्क़ जब रूह की गहराई में आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,वफ़ा की कसम खाके हमने पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
मोहब्बत की गली में जो भी थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,मोहब्बत के पावन सफ़र में उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी याद जब भी दिल में उभरी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
Mire ashkon ki qeemat koee kyaa chhupee hai bhaaree jo arsh ko bhi hilaa de,Khaamosh labon ki pukaar arsh sukoon ki bheekh maangataa raha har dar pe.
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
आँखों से जो अश्क बहे वो दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।

शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ में सब अपने अपने घरों को चले गए।
Shaba-e-gham ki taareekiyaan jab daraane lageen to sabr ka daaman thaam liyaa hamane,Toote hue khvaabon ki kirachiyaan mein sab apane apane gharon ko chale gaye.
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,रात की स्याही में घुला दर्द हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
छाले पड़े हैं पाँवों में और मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,अपनी बेबसी पे रोना आया था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,अपनी बेबसी पे रोना आया ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।

तन्हाई की रात में जब कोई वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
Tanhaaee ki raat mein jab koee wo dard diyaa ki apanee hi sadaa se kaanp uthe,Khaamosh labon ki pukaar arsh hazaar tukaron mein aks bikhar gaya.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
तिरे जाने के बाद ये आलम जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,ग़म का मारा हुआ राही चला सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
दिल के वीराने में बस एक दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस धूप-छाँव पहचान है कायर तो मुक़द्दर का रोना रोते हैं,सलीक़ा जीने का जिसने सीख बहाया उसी ने कामयाबी का फल चखा।
Zindagi aur kuchh nahi bas dhoopa-chhaanv pahachaan hai kaayar to muqaddar ka ronaa rote hain,Saleeqaa jeene ka jisane seekh bahaayaa usee ne kaamayaabee ka phal chakhaa.
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
दिल के वीराने में बस एक वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,रात भर जागती आँखों ने देखा हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,रात भर जागती आँखों ने देखा मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।

मंज़िलें मिल ही जाएँगी भटकते ठहरा जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,ज़मीर की आवाज़ पे जिसने अमल ज़माने की सारी दौलत तो यहीं छूट जानी है।
Manzilen mil hi jaaengee bhatakate thaharaa jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Zameer ki aavaaz pe jisane amal zamaane ki saari daulat to yaheen chhoot jaanee hai.
तिरे जाने के बाद ये आलम हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
तिरे जाने के बाद ये आलम कितने सपने बेबस होकर देखा सब उजड़ गया,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।

ज़िंदगी की हक़ीक़त को जिसने समझ का सफ़र है आज ग़म तो कल ख़ुशी का सूरज चमकेगा,इंसानियत का फ़र्ज़ जिसने निभाया चला उसे दोनों जहाँ में इज़्ज़त नसीब हुई।
Zindagi ki haqeeqat ko jisane samajh ka safar hai aaj gham to kal khushee ka sooraj chamakegaa,Insaaniyat ka farz jisane nibhaayaa chalaa use donon jahaan mein izzat naseeb hui.
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ में सब अपने अपने घरों को चले गए।
About Zubair Ali Tabish (ज़ुबैर अली ताबिश) — The Maestro of Human Emotion
Zubair Ali Tabish was an illustrious figure in Lyrical Ghazal Voice of New Generation (Born 1990), renowned for Ghazal collections, Viral Mushaira videos across India and Gulf.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Zubair Ali Tabish pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Born 1990, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Zubair Ali Tabish captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Zubair Ali Tabish's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Zubair Ali Tabish effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Zubair Ali Tabish
Authentic answers about Zubair Ali Tabish's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Zubair Ali Tabish?
Zubair Ali Tabish was a renowned Lyrical Ghazal Voice of New Generation (Born 1990) from Amroha, Uttar Pradesh, India, widely celebrated for VOICE OF NEW AGE GHAZALS, CREATOR OF 'DARD APNE LIYE RAKH LE', YOUTH MUSHAIRA STAR.
What is the central philosophy and message of Zubair Ali Tabish?
The central philosophy of Zubair Ali Tabish centers around Dignified acceptance of heartache, soft melancholic metaphors, preservation of classic Lakhnavi/Amroha linguistic purity, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Zubair Ali Tabish's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Zubair Ali Tabish?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Zubair Ali Tabish's impact on literary culture?
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