बुलाती है मगर जाने का नईं,वो दुनिया है उधर जाने का नईं।
Rahat Indori (राहत इंदौरी)
راحت اندوری
Dr. Rahat Indori was a charismatic Urdu poet, Bollywood lyricist, and scholar whose electrifying stage performances and fearless socio-political couplets made him a beloved household name across the globe.
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‘बुलाती है मगर जाने का नईं,वो दुनिया है उधर जाने का नईं।’— Rahat Indori
Sher #1 • Classic Couplet
बुलाती है मगर जाने का नईं,

‘सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है।’— Rahat Indori
Sher #2 • Passionate Verse
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,

‘अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है,ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है।’— Rahat Indori
Sher #3 • Soulful Couplet
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है,
Immortal Couplets & Ghazals
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है।
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है,ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है।
आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो,ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो।

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है,चाँद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है।
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में,यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।
हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं,मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिन्दुस्तान कहते हैं।
तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पर वार करो,मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो।

शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम,आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे।
फैसला जो कुछ भी हो मंज़ूर होना चाहिए,जंग हो या इश्क़ हो भरपूर होना चाहिए।
जुबां तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे,मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे।
दिए जलाने की आदत ख़राब है मेरी,हवा के शहर में घर है हिसाब है मेरा।

सूरज, सितारे, चाँद मेरे साथ में रहे,जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे।
अब ना मैं हूँ ना वो दुनिया है ना वो बातें हैं,सिर्फ़ ख़ामोश से यादों के खंडहर बाक़ी हैं।
अजीब लोग हैं मेरी तलाश में गुम हैं,कि मैं जहाँ नहीं हूँ मुझे वहाँ ढूँढें।
नए किरदार आते जा रहे हैं,मगर नाटक पुराना चल रहा है।

वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा,मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के आ गया।
बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर,जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ।
मेरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे,मेरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले।
किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है,आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो।

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो,यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।
चाँद पागल है अंधेरे में निकल पड़ता है,शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम।
हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं,मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे।
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो,उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो।

फैसला जो कुछ भी हो मंज़ूर होना चाहिए,कि मैं जहाँ नहीं हूँ मुझे वहाँ ढूँढें।
मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे,बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर।
सूरज, सितारे, चाँद मेरे साथ में रहे,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।

अजीब लोग हैं मेरी तलाश में गुम हैं,वो दुनिया है उधर जाने का नईं।
मगर नाटक पुराना चल रहा है,आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो।
बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर,यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।
मेरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले,शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम।

तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे।
मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो।
जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है,कि मैं जहाँ नहीं हूँ मुझे वहाँ ढूँढें।
वो दुनिया है उधर जाने का नईं,बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर।

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में,वो दुनिया है उधर जाने का नईं।
मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिन्दुस्तान कहते हैं,आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो।

शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम,यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।
जंग हो या इश्क़ हो भरपूर होना चाहिए,शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम।
दिए जलाने की आदत ख़राब है मेरी,मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे।
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे,उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो।

अब ना मैं हूँ ना वो दुनिया है ना वो बातें हैं,कि मैं जहाँ नहीं हूँ मुझे वहाँ ढूँढें।
कि मैं जहाँ नहीं हूँ मुझे वहाँ ढूँढें,बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर।
वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।

सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है,वो दुनिया है उधर जाने का नईं।
तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।
बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम।

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में,मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे।
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है,उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो।
रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है,कि मैं जहाँ नहीं हूँ मुझे वहाँ ढूँढें।
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है,बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर।

तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पर वार करो,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
जुबां तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे,वो दुनिया है उधर जाने का नईं।
हवा के शहर में घर है हिसाब है मेरा,आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो।

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो,यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है।
सिर्फ़ ख़ामोश से यादों के खंडहर बाक़ी हैं,शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम।
नए किरदार आते जा रहे हैं,मैं कितनी बार लुटा हूँ, मुझे हिसाब तो दे।
मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के आ गया,उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो।

मेरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे,कि मैं जहाँ नहीं हूँ मुझे वहाँ ढूँढें।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर।
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
दिल ना-उम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात।

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले,हम देखेंगे।
कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं,लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
उस के बाद आए जो अज़ाब आए,कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं।
आप की याद आती रही रात भर,ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम।

ये सब हैं ज़िंदगी के फ़साने ज़रा संभल के चलो,कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब।
दामन-ए-शब को लहू से जो सजाया हमने,हम वफ़ादार थे और सदाक़त के परस्तार रहे।
हम वफ़ादार थे और सदाक़त के परस्तार रहे,ये आरज़ू थी कि कोई हमें भी टूट के चाहे।
रातों को जागने की सज़ा काटते हैं हम,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

मगर नसीब में तन्हाई ही लिखी निकली,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है,मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात।
तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,हम देखेंगे।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।

बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं।
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम।
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है,कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब।
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले,हम वफ़ादार थे और सदाक़त के परस्तार रहे।

लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है,ये आरज़ू थी कि कोई हमें भी टूट के चाहे।
मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
दिल इश्क़ में सौ-सौ बार लुटा पर ग़म का कोई हिसाब नहीं,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़,मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात।

चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर,हम देखेंगे।
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब,लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
सुब्ह के चेहरे पे नूर का ग़ाज़ा आया,कब याद में तेरा साथ नहीं कब हाथ में तेरा हाथ नहीं।
तेरे होंटों के तबस्सुम की चमक देख के हम,ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम।

दिन में किसी के ध्यान में खोए हुए से हैं,कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब।
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो,हम वफ़ादार थे और सदाक़त के परस्तार रहे।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,ये आरज़ू थी कि कोई हमें भी टूट के चाहे।
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है,मिल गया सो मिट्टी है खो गया वो सोना है।

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता।
सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो,सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो।
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए।
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है,इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है।

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए,घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए।
About Rahat Indori (राहत इंदौरी) — The Maestro of Human Emotion
Dr. Rahat Indori was a charismatic Urdu poet, Bollywood lyricist, and scholar whose electrifying stage performances and fearless socio-political couplets made him a beloved household name across the globe.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Rahat Indori pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Contemporary Urdu Poetry & Bollywood Lyrics, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Rahat Indori captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Rahat Indori's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Rahat Indori effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Rahat Indori
Authentic answers about Rahat Indori's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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What was Rahat Indori's academic background?
Dr. Rahat Indori earned his Ph.D. in Urdu literature from Bhoj University, writing his thesis on the cultural evolution of the Urdu Mushaira.
What is Rahat Indori's most widely quoted sher?
His sher 'Sabhi ka khoon hai shaamil yahaan ki mitti mein, kisi ke baap ka Hindustaan thodi hai' became an immortal anthem of national unity and patriotic pride.
Which popular Bollywood songs did Rahat Indori write?
He wrote timeless hits including 'Neend Churaayi Meri' (Ishq), 'M Bole Toh' (Munna Bhai M.B.B.S.), 'Chori Chori Jab Nazrein Mili' (Kareeb), and 'Bumbro' (Mission Kashmir).
What was Rahat Indori's unique style in mushairas?
He was renowned for high-energy recitation, theatrical hand gestures, intense eye contact, and hard-hitting lines that connected directly with the common listener.
What are his major published poetry anthologies?
His anthologies include 'Dhoop Bahut Hai', 'Do Kadam Aur Sahi', 'Mauj', 'Rutt', 'Mere Baad', and 'Naraz'.
Can I copy and share Rahat Indori's shayari on Emotion Hub?
Yes, every couplet comes with single-click WhatsApp sharing, clipboard copying, and HD 300 DPI wallpaper downloads.
When did Dr. Rahat Indori pass away?
He passed away on August 11, 2020, in Indore, leaving behind an unmatched legacy of public poetry.
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