सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥
Kabir Das (संत कबीर)
کبیر داس
Kabir Das was a 15th-century mystic poet, saint, and social reformer whose fearless, pithy couplets (dohas) shattered religious dogmatism, hypocritical ritualism, and caste barriers. His verses form a revered pillar of the Guru Granth Sahib and universal spiritual literature.
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‘सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥’— Kabir Das
Sher #1 • Classic Couplet
सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥

‘बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥’— Kabir Das
Sher #2 • Passionate Verse
बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥

‘सतगुरु की महिमा अनँत अनँत उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया अनँत दिखावण्हआर॥’— Kabir Das
Sher #3 • Soulful Couplet
सतगुरु की महिमा अनँत अनँत उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया अनँत दिखावण्हआर॥

‘संदर्भ —सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की।’— Kabir Das
Sher #4 • Philosophical Verse
संदर्भ —सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की।
Immortal Couplets & Ghazals
बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥
सतगुरु की महिमा अनँत अनँत उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया अनँत दिखावण्हआर॥
संदर्भ —सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की।

राम नाम कै पटंतरै देबै कौं कुछ नाँहि। क्या ले गुरु संतोषिए, हौस रही मन माँहि॥
संदर्भ —शिष्य के मन में असीम कृतज्ञता की भाव है। वह सतगुरु के प्रति प्रतिदान की इच्छा रखता है, पर गुरुदेव के प्रति क्या समर्पित किया जाय यह संकल्प विकल्प मन में साकार रहता है। उसकी अभिलाषा अपूर्ण ही रह गई।
सतगुर के सदकै करूँ दिल अपणीं का साछ। कलियुग हम स्यूँ लड़ि पड़या मुहकम मेरा बाछ॥
संदर्भ — सतगुरु सर्वथा प्रशंसनीय है, वंदनीय है। उसकी महती कृपा से शिष्य कलियुग से पराभूत होने से बच गया।

सतगुरु लई कमांण करि, बांहण लागा तीर॥ एक जु बाह्या प्रीति सूँ, भीतरि रह्या शरीर॥
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक। लागत ही मैं मिल गया, पड्या कलेजै छेक॥
सतगुरु मारया बाण भरि धरि करिसूधी मूठि। श्रंगि उघाडै लागिया,गई दवा सूँ फूटि़॥
हँसै न बोलै उन्मनी चंचल मेहल्या मारि। कहै कबीर भीतरि भिद्य,सतगुरु कै हथियारि॥

भवार्थ --शब्द वाण रुपी सतगुरु के हथियार ने शिष्य के अन्तस य मर्म को गई कर दिया। अब वह् हपं-विपाद की मानव से परै होकर संसार से उन्म या उटामीन हो गया और उसका चचंल मन प्रवान्त हो गया।
गूंगा हुवा बावला, बहरा हुआ कान। पाऊँ मैं पंगुल भया, सतगुर मार्या बाण॥
पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया विसाहुणां बहुरि न आँवौ हट्ट॥

ग्यान प्रकारया गुर मिल्या, सो जिनि वीसरि जाइ। जब गोविन्द कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥
जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूं कूप पडंत॥
नां गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेला डाव। दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥
चौसठ दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविन्द नाहिं॥

निस अँधियारी कारणौं, चौरासी लख चन्द। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहि मन्द॥
भली भई जु गुर मिल्या, नहीं वर होती हांणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ पड़ता पूरी जाणि॥
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवैं पडन्त। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उतरन्त॥
सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिपही मांहै चूक। भावै त्यूं प्रमोधि ले, ज्यूं बँसि बजाई फूंक॥

संसै खाया सक्ल जुग, संसा किनहूँ न खद्ध। जै वेधे गुरु अप्पिरां, तिनि संसा चुणि-चुणि खद्ध॥
चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुर दीन्हांँ धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर॥
संदर्भ —सतगुरु ने शिष्य के अनन्त लोचन ही नहीं उदघाटित किया, वरन् उसे धैर्य का वरदान भी दिया। साथ ही सतगुरु ने निःशक होकर ईश्वराराधना करने का भी उपदेश दिया।
सतगुर मिल्यात का भया, जे मनि पाड़ी भोल। पामि विनंठा कप्पढा, क्या करै विचारी चोल॥

बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमंकि। भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरकि॥
गुर गोविंद तौ एक है, दूजा यहु आकार। आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार॥
सतगुर साँचा सूरिवाँ, तातैं लोहिं लुहार। कसणी दे कंचन किया, ताइ लिया ततसार॥
थापणि पाई विति भई, सतगुर दीन्हीं धीर। कबीर हीरा-बण्जिया, मानसरोवर तीर॥

निश्चल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस घीर। निपजी मैं साझी घणां, बाँटे नहीं कबीर॥
चौपडि मांड़ी चौहटै, अरध उरध बाजार । कहै कबीरा रामजन, खोलौ संत विचार ॥
संदर्भ--कबीर ने प्रस्तुत अग की साखी १२ एव्ं १६ मे वाणिज्य का उल्लेख किया है । अब प्रस्तुत साखी एवं आगामी साखी मे चौपड़ एवं पासा के खेल का उल्लेख किया । आध्यात्मिक जगत मे चौपड का भिन्न अर्थ होना है ।
पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर । सतगुर दाव घताइया, खेलै दास कबीर ॥

सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग । बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग ॥
पूरे सूँ परचा भया, सब दुःख मेल्या दूरि । निर्मल कीन्ही आत्मा, ताथै सदा हजूर ॥
कबिर कहता जात हुँ, सुणता है सय कोइ । राम कहें भला होइगा, नहिं तर भला न छोइ ॥
(२) सत दरिया ने भी इसकी प्रस्तुत विशेषता की ओर संकेत करते हुए कहा है "राम नाम निजु सार है " कबीर दास दरिया के शब्दो का समर्थन करते हुए केहते है "नाम सरोवर सार है सोह सुरत लगाय"।

तत तिलक तिहुँँ लोक मैं, राम नाँव निज सार | जन फबीर मस्तक दिया, सोभा अधिक अपार ॥
भगति भजन हरि नांव है , दूजा दुक्ख आपार। मनसा बाचा क्रमनां , कबीर सुमिरण सार ॥
च्य्ंता तौ हरि नांव की, और न चिंता दास। जे कुछ चितवैं राम विन,सोइ काल की पास ॥
यंच संगी पिव करै,छठा जुसुमिरै मन। आई सूति कबीर की, पाया राम,रतन॥

मेरा मन सुमिरै राम कॅू, मेरा मन रामहिं प्पहि। अव मन रामहिं है रहा, सीस नवावौ काहि॥
संदर्भ—समाधि मे ब्रह्म का दर्शन प्राप्त कर लेने पर आत्मा ब्रह्म वाण हो जाती है। जब आत्मा परमात्मा मे समाहित हो गई , मन भेद सम्मान होगए और माया जीवन भेद के विनष्ट हो जाने मे उभय एक हो गए तो दान करे और कौन किसकी उपमाना?
तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न हूँ । वारी फेरी वलि गई, जित देखौ तित तूँ ।६॥
शच्दार्थ—सूता=सोता=सुप्त। दिना=दिना=दिन । सोवणा=सोवना= सोना । पसारि= पसार फैलाकर ।

केसौ कहि कहि कूकिये, ना सौइयै असरार। रात दिवस कैं कृकणों, (मन) कबहूँ लागै पुकार॥
जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस,फुर्न रसना नहिं राम । ते नर इस स्ंसार में, उपजि पये बेकाम ॥
पहली बुरा कमाइ करि,बाँधी विष की पोट । कोटि करम पेलै पलक मैं (जय) आया हरि ओट॥
कोटि कम पेलै पलक मै,जे रचक आवै नाउॉ। अनेक जुग जे पुत्रि करै,नहीं राम विन ठाउॉ॥

जिही ह्र्री जैसा जाँरिग्याँ,तिन कूँ तैसा लाभ। ओसो प्यास न भाजई जब लग धसै आभ॥
का० मा० पा०—७ शब्दार्थ—आपसा=आपन=अपना। कहि = कह। ओरा=औरो=अन्योसे। कहाइ=कहा, कहलाइये। जिहि=जिहु=जिस। मूखि=मुख। ऊचरै=उच्यरै =उचारण हो। फेरि=पुन:।
जैसे माया मन रमैं, यूं जे राम रमाइ। (तौ) तारा मडंल छाँड़ि करि, जहाँ केसो तहाँ जाइ॥।।
लुटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम है लूटि। पीछैं ही पछिताहुगे, यहु तन जैहै छूटि।।२५।।

लूटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम भंडार। काल कंठ तै गहैगा, रुंधै दसू दुवार॥
संदर्भ — प्रस्तुत साखी मे कबीर ने काल को प्रबलता, मानव जीवन की क्षण भंगुरता, मानव की विवशता और राम नाम की सुलभता की ओर संकेत करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज को चेतावनी प्रदान की हैं।
लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार । कहौ संतौ कू पाइये, दुर्लभ हरि दीदार ॥।।
संदर्भ— प्रियतमा का प्रदेश बहुत दूर है । वहा का मार्ग अत्यन्त लम्बा

और भांति-भांति की बाधाओ से सम्पन्न है । ऐसी स्थिति से प्रियतम के दुर्लभ दीदार कैसे प्रास होगे ?
गुण गायें गुण नाम कटै, रटै न राम वियोग । अह निसि हरि ध्यावै नहीं, क्या पावै दुर्लभ जोग ।।२८।।
संदर्भ-प्रसतुत साखी मे कबीर ने राम नाम के महत्व का पुन: उल्लेख किया है । राम नाम का प्रभाव वहा व्यापक और असाधारण है । नाम जप के प्रभाव से मध्या के वचनं विच्छिन्न हो जाते । फिर भी मानव इस पुण्य कर्तव्य से विमुख है ।
रात्यू रूंनी बिरहिनीं, ज्यूं बंचौ कूं कुंज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगठ्या विरहा पुंज॥

अंबर कुंजा कुरलियां, गरजि भरे सत्र ताल। जिनि थैं गोविन्द वीछुटे, तिनके कौंण हवाल॥
चकवी बिछुटी रैणी की, आइ मिलि परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति॥
वासर सुख नाँ रैन सुख, ना सुख सुपिनै माहि। कबीर बिछुढ्या राम सूँ, नौ सुख धूप न छाँह॥
विरहिन ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझे धाइ। एक सवद कहि पीव का, कवर मिलैंगे आइ॥

बहुत दिनन की जोबती, बाट तुम्हारी राम। जिब तरसैं तुझ मिलन कूँ, माने नांही विश्राम॥
बिरहिन ऊठै भी पडै, दरसन कारनि राम। मृवां पीछे देहुगे सो दरसन किहि काम॥
मृवा पीछै जिनि मिलै कहै कबीरा राम । पाथर घाटा लोह सव (तथ) पारस कौणे काम ॥
सन्दभॆ- प्रस्तुत साखी का वण्यं-विषय सप्तम साखी के विषय से साम्य रखता है । कवि ब्रह्म अनुग्रह का आकांक्षी हैं, परन्तु शरीर रहते ही ।

अन्देसडा़ न भाजिसी, सन्देसौ कहियाँ । कै हरि आया भाजिसी, के हरि ही पासि गयाँ ।।६१।।
आइ न सकौ तुझ पै, सकूॅ न तुझे बुलाइ । जियरा यौंही लेहुगे, विरह तपाइ तपाइ ।।१०।।
यह तन जालौं मुसि करुं ज्यूं धूवाँ जाइ सरग्गि । मति वै राम दया करैं, बरसि बुझावे अग्नि ॥
यहु तन जालौ मसि करौं,लिखौं राम का नाउँ। लेखणि करूँ करंक की,लिखि लिख राम पठाऊँ॥

संदर्भ—विरहीणि की इच्छाएँ नए-नए रुपों में प्रकट हो रही हैं। यहाँ एक और अभिनव कामना। जिस प्रकार भी-प्रिय का ध्यान आकर्षित हो वह कार्य करना है गंतव्य तक पहुंचना है। लक्ष्य की स्मुप्लब्धि ही व्यय बन गया है।
प्रसंग प्रेम एवं विरह की पीड़ा ने पिंजर या शरीर एवं ममं को अभिभूत कर रखा है।
चोट सताँणी विरह की,सब तन जर जर होइ । मारणहारा जाँणि है, कै जिहि लागी सोइ ॥
प्रसंग— विरह की चोट एव पीड़ा से विरही का समस्त शरीर जंजर हो रहा है।

कर कमाण सर साँधि करि, खैचि जुमारया मांहि । भीतर भिधा सुमार है, जीव कि जिवै नांहि ॥र१५।।
प्रसंग— सदगुरु ने जब से शब्द रुपी बाण मारा है तब से प्रेम की मधुर पीड़ा, विरह की चोट सवल हो छठी है ।
जब हूँ मारया खैचिकर, तब मैं पाई जांणि। लागी चोट मरम्म की, गई कलेजा छाणि।।१६।।
प्रसंग— शब्द वासा के लगते ही ज्ञान जाग्रत हो गया । अब उस प्रेम और विरह को व्यधा ने ममॆ को आहत कर डाला है ।

जिहि सरि मारि काल्हि, सो सर मेरे मन समझा। तिहि सरि मारि ,सरबिन सचपाँऊ नहीं ॥
प्रसंग— सतगुरु द्वारा मारा हुआ शब्द रूपी वाण और उससे समुप्तन्न पीडा मन को मधुर प्रतीत होती है।
विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ। राम वियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।।१६।।
प्रसंग — विरह के प्रभाव से साधक का तन क्षीरग, मन उन्मन प्रतीत होता है। राम वियोगी संसार से वियुक्त होकर जीवन यापन करता है।

विरहा भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव। साघू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव।।१६।।
संदर्भ— विरहानुभूति साधुजनों को प्रिय लगता है। विरह जनित आनन्द अद्वितीय है।
सब रॅग नंतर बाव तन,विरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सकै, कै सांई कै चित्त॥।।
विरहा वुरहा जनि कहौ,बिहरा है सुलितान। जिह् घटि विरह न संचरै,सो घटि सदा मसान ।।२१॥

अंषणियां झांई पड़ी,पंथ निहारि निहारि। जीभडियाँ छाला पड़या,राम पुकारि पुकारि॥
इस तन का दीवा करौ,वाती मेल्यूँ जीव। लोही सीचौं तेल ज्यूँ,कब मुख देखौ पीव ॥
नैनां नीझर लाइया,रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं,कबरु मिलहुगे राम ॥
शब्दार्य—नीझर =निझर= झरना । रहट = कुआं जल निकालने का यंत्र । निसजाम= निशयाम । कवरु = अरे कब ।

आपडिंयां प्रेम कसाइयां, लोग जांरगौ दुखडि़याँ । साँईं अपणै, कारणौ, रोइ रोइ रतडि़याँ ॥
सोइ आंसू सजरणां सोई लोक बिड़ँहि । जे लोइगा लोंहीं चुवै,तौ जारणौ हेत हियाँहि ॥
संदर्भ— आँसु आँसु मे भेद है । वही सच्चे आँसू है जो हृदय से प्रस्फुटित होते हैं ।
जो रोऊँ वौ बल घटै, हँसौ तोव राम रिसाइ। मनही मांहि विसूरणां, क्यूँ घूँरग काठहि खाइ ॥

हॉसि हॉसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ । जो हाँसेही हरि मिलै, दुतौ नही दुहागनि कोइ ॥
About Kabir Das (संत कबीर) — The Maestro of Human Emotion
Kabir Das was a 15th-century mystic poet, saint, and social reformer whose fearless, pithy couplets (dohas) shattered religious dogmatism, hypocritical ritualism, and caste barriers. His verses form a revered pillar of the Guru Granth Sahib and universal spiritual literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Kabir Das pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 15th Century Bhakti Movement & Sant Mat, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Kabir Das captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Kabir Das's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Kabir Das effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Kabir Das
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What is the historical time period of Sant Kabir?
Sant Kabir lived during the 15th century (approx. 1398–1518 CE), primarily in Varanasi (Kashi) during the Delhi Sultanate and Bhakti movement era.
What is the meaning of 'Dhaai Aakhar Prem Ka'?
Kabir taught that reading thousands of holy scriptures is meaningless without experiencing the 'two-and-a-half letters' of selfless love and universal compassion.
What are Kabir's 'Bijak' and 'Sakhi'?
The 'Bijak' is the foundational compilation of Kabir's teachings preserved by the Kabir Panth, while 'Sakhis' (from Sanskrit 'Sakshi', meaning witness) are two-line poems testifying to spiritual truth.
Is Kabir's poetry included in the Guru Granth Sahib?
Yes, Guru Arjan Dev Ji included over 500 hymns and couplets of Bhagat Kabir into the Sikh holy scripture, Sri Guru Granth Sahib.
Why did Kabir choose to pass away in Maghar?
To defy the superstitious orthodoxy claiming that dying in Kashi guarantees heaven while dying in Maghar leads to rebirth as a donkey, proving that righteousness lies in deeds, not geographic locations.
Can I copy and share Kabir's dohas on Emotion Hub?
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What was Kabir's occupation?
Kabir was a weaver (Julaha) by profession, often using the loom, thread, and fabric as metaphors for the human body and cosmic spirit.
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