जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को,घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए।
Faiz Ahmed Faiz (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)
فیض احمد فیض
Faiz Ahmed Faiz was the towering intellectual and lyrical beacon of the Progressive Writers' Movement, nominated for the Nobel Prize in Literature and honored with the Lenin Peace Prize. His poetry flawlessly fused romantic yearning with revolutionary solidarity.
Download Aesthetic Faiz Ahmed Faiz Story Cards

‘जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को,घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए।’— Faiz Ahmed Faiz
Sher #1 • Classic Couplet
जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को,

‘कौन किस के साथ है जब तक न आए शाम,यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है।’— Faiz Ahmed Faiz
Sher #2 • Passionate Verse
कौन किस के साथ है जब तक न आए शाम,

‘पत्थरों के दरमियाँ आईना रखने वाले,जब शहर ही वो नहीं रहा जो दिल के अंदर था।’— Faiz Ahmed Faiz
Sher #3 • Soulful Couplet
पत्थरों के दरमियाँ आईना रखने वाले,
Immortal Couplets & Ghazals
कौन किस के साथ है जब तक न आए शाम,यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है।
पत्थरों के दरमियाँ आईना रखने वाले,जब शहर ही वो नहीं रहा जो दिल के अंदर था।
छाँव की चाह में बैठो तो उम्र ढलेगी,जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को।

रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़,खै़रात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,इंसान की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में, अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव स्वयं खेते हैं, किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है, इंसान वही जो किसी रोते हुए को हँसा सके।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया, जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है, हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है।

फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार, उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही।
आँखों में जो नमी है वो कोई शिकवा नहीं, दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी, वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी।

अकेलेपन की धूप जब साए को भी छीन ले, तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।
ज़िंदगी और कुछ नहीं बस धूप-छाँव का सफ़र है, आज जो ग़म है कल वही उम्मीद का सूरज बनेगा।
गिरने में कोई हार नहीं अगर उठने का हौसला हो, हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है।

नदी की तरह बहते रहना ही जीवन का नियम है, जो रुक गया वो अपनी ही सीमाओं में खो गया।
चंद साँसों की मोहलत में अगर किसी के काम आ सको, तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया।
जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
मैं और मेरा का भ्रम जब टूटता है, तभी उस परमसत्य का द्वार खुलता है।

काल का पहिया घूमता है बिना किसी आवाज़ के, राजा हो या रंक सब उसी मिट्टी में विलीन होते हैं।
मृत्यु कोई अंत नहीं बस एक वस्त्र बदलने का नाम है, आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है, इंसान वही जो किसी रोते हुए को हँसा सके,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी, वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
ज़िंदगी और कुछ नहीं बस धूप-छाँव का सफ़र है, आज जो ग़म है कल वही उम्मीद का सूरज बनेगा,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
चंद साँसों की मोहलत में अगर किसी के काम आ सको, तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
काल का पहिया घूमता है बिना किसी आवाज़ के, राजा हो या रंक सब उसी मिट्टी में विलीन होते हैं,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया, जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार, उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
अकेलेपन की धूप जब साए को भी छीन ले, तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

गिरने में कोई हार नहीं अगर उठने का हौसला हो, हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
मृत्यु कोई अंत नहीं बस एक वस्त्र बदलने का नाम है, आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव स्वयं खेते हैं, किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है, हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
आँखों में जो नमी है वो कोई शिकवा नहीं, दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
नदी की तरह बहते रहना ही जीवन का नियम है, जो रुक गया वो अपनी ही सीमाओं में खो गया,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

मैं और मेरा का भ्रम जब टूटता है, तभी उस परमसत्य का द्वार खुलता है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में, अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।
Phaasale mit gaye jab dil se dil ka taar juraa, maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Zakhm wo nahi jo jism par dikhaaee den, asalee zakhm to wo hain jo rooh par chupachaap risate hain.
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है, हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai to ibaadat ban jaataa hai, husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Jo baahar dhoondhataa raha wo umr bhar bhatakataa raha, jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa.
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
About Faiz Ahmed Faiz (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़) — The Maestro of Human Emotion
Faiz Ahmed Faiz was the towering intellectual and lyrical beacon of the Progressive Writers' Movement, nominated for the Nobel Prize in Literature and honored with the Lenin Peace Prize. His poetry flawlessly fused romantic yearning with revolutionary solidarity.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Faiz Ahmed Faiz pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Progressive Writers Movement (Urdu), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Faiz Ahmed Faiz captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Faiz Ahmed Faiz's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Faiz Ahmed Faiz effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
Explore Other Ghazal Masters
Create Aesthetic Cards in Under 30 Seconds
Select your favourite shayari or quote, choose an ethereal cosmic gradient, adjust the font to Noto Serif Devanagari, and export immediately.
- No sign up
- No watermark
- Free forever
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic PoetryMessages for every occasion and every person
Pick who you are writing to, or the festival, and open a ready collection.
- Birthday for dadWarm lines for the man who raised you
- Anniversary for husbandSweet notes for the one by your side
- Good morning, familyA bright start for the family group
- Good night, girlfriendSoft words before she sleeps
- Diwali wishesFestive messages for family and friends
- Holi wishesColourful lines for your friends
- Eid wishesEid Mubarak for your loved ones
- Farewell, colleagueKind goodbyes for a teammate
- CongratulationsCheer on a friend's big win
- Miss you, girlfriendFor the days when distance feels long
- Funny birthdayLight-hearted wishes for a best friend
- Christmas wishesSeason's greetings for the family
Popular searches
- Breakup Shayari for Girlfriend
- Attitude Shayari for Boys
- Attitude Shayari for Girls
- Attitude Status for Boys
- Alone Shayari
- 2 Line Attitude Shayari
- 2 Line Breakup Shayari
- Love Shayari for Girlfriend
- Miss You Shayari for Girlfriend
- Emotional Shayari for Mom
- Heart Touching Shayari for Husband
- Birthday Wishes for Wife
- Birthday Wishes for Husband
- Love Status for WhatsApp
- Inspirational Quotes for Students
- Life Quotes for Self
Poets, Festivals & Status
Read the voices behind the verses, plan ahead for festivals and grab a quick status line
Essential Questions About Faiz Ahmed Faiz
Authentic answers about Faiz Ahmed Faiz's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
Still have a question? Contact us
What is the Lenin Peace Prize that Faiz received?
In 1962, Faiz was awarded the prestigious International Lenin Peace Prize, the Soviet equivalent of the Nobel Peace Prize, for championing human liberation.
What is the historical background of 'Hum Dekhenge'?
Faiz wrote 'Hum Dekhenge' (Va Yabqa Wajho Rabbika) in 1979 in response to General Zia-ul-Haq's military dictatorship, which became an immortal anthem of resistance.
What makes Faiz's ghazals unique?
Faiz seamlessly merged the beloved (mehboob) with the homeland (watan) and justice, giving classical romance an electrifying socio-political resonance.
Which prominent singers popularized Faiz's poetry?
Iqbal Bano's legendary 1986 performance of 'Hum Dekhenge', Mehdi Hassan's 'Gulon Mein Rang Bhare', and Begum Akhtar's renditions brought Faiz into millions of homes.
Was Faiz Ahmed Faiz ever imprisoned?
Yes, Faiz was imprisoned for over four years during the Rawalpindi Conspiracy Case (1951–1955), during which he penned the classic collection 'Zindan-Nama'.
How can I copy or share Faiz's couplets on Emotion Hub?
Every couplet has one-click copy, direct WhatsApp sharing, and HD 300 DPI canvas card download buttons.
When did Faiz pass away?
Faiz passed away on November 20, 1984, in Lahore, Pakistan, shortly after receiving news of his nomination for the Nobel Prize in Literature.
Where can I design my own poster with Faiz's poetry?
Click the palette icon on any verse to launch the verse directly into Emotion Hub's online Canvas Design Studio.
Ready to Express Yourself?
Pick a line, add your style and send it off. Your first card is a few taps away.







