हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते,वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते।
Gulzar (गुलज़ार)
گلزار
Sampooran Singh Kalra, known universally by his pen name Gulzar, is India's most celebrated living poet, lyricist, author, and film director. Awarded the Padma Bhushan, Dadasaheb Phalke Award, Oscar, and Grammy, he revolutionized lyrical intimacy with his inventive three-line poetic form, 'Triveni'.
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‘हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते,वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते।’— Gulzar
Sher #1 • Classic Couplet
हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते,

‘वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,आदत इस की भी आदमी सी है।’— Gulzar
Sher #2 • Passionate Verse
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,

‘आईना देख कर तसल्ली हुई,हम को इस घर में जानता है कोई।’— Gulzar
Sher #3 • Soulful Couplet
आईना देख कर तसल्ली हुई,
Immortal Couplets & Ghazals
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,आदत इस की भी आदमी सी है।
आईना देख कर तसल्ली हुई,हम को इस घर में जानता है कोई।
तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं,रात भी आई और चाँद भी था मगर नींद नहीं।

ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा,क़ाफ़िला साथ था और सफ़र तन्हा।
आँखों को वीज़ा नहीं लगता,सपनों की कोई सरहद नहीं होती।
थोड़ा सा रफ़ू करके देखिए ना,फिर से नई सी लगेगी ज़िंदगी ही तो है।
एक बार तो यूँ होगा थोड़ा सा सुकून होगा,न दिल में कसक होगी न आँखों में नमी होगी।

गुलशन में तो हर फूल का अपना ही रंग है,काँटों की जुस्तजू में भटकता रहा हूँ मैं।
शाम से आँख में नमी सी है,आज फिर आप की कमी सी है।
कोई अटका हुआ है पल शायद,वक़्त में पड़ गया है बल शायद।
बे-वजह तो नहीं होती यादों की बरसात,कोई भीगा है शायद दिल के किसी कोने में।

बहुत मुश्किल से करता हूँ तेरी यादों का कारोबार,मुनाफ़ा कम है लेकिन गुज़ारा हो ही जाता है।
खुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में,एक पुराना ख़त खोला अनजाने में।
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई,जैसे एहसान उतारता है कोई।
तेरे बग़ैर भी हम जी रहे हैं शान से,ये बात और है कि दिल बे-करार रहता है।

उम्र गुज़री है इस सहारे पर,कोई आवाज़ देगा किनारे पर।
सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है,इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है।
सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता।
लम्हा-लम्हा शुमार करते हैं,ज़िंदगी को उधार करते हैं।

आदत इस की भी आदमी सी है,तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं।
तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं,सपनों की कोई सरहद नहीं होती।
क़ाफ़िला साथ था और सफ़र तन्हा,गुलशन में तो हर फूल का अपना ही रंग है।
थोड़ा सा रफ़ू करके देखिए ना,वक़्त में पड़ गया है बल शायद।

न दिल में कसक होगी न आँखों में नमी होगी,खुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में।
शाम से आँख में नमी सी है,ये बात और है कि दिल बे-करार रहता है।
वक़्त में पड़ गया है बल शायद,सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें।
बहुत मुश्किल से करता हूँ तेरी यादों का कारोबार,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

एक पुराना ख़त खोला अनजाने में,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
तेरे बग़ैर भी हम जी रहे हैं शान से,वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते।
कोई आवाज़ देगा किनारे पर,तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं।
सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें,सपनों की कोई सरहद नहीं होती।

ज़िंदगी को उधार करते हैं,गुलशन में तो हर फूल का अपना ही रंग है।
तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,वक़्त में पड़ गया है बल शायद।
मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,खुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में।
जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है,ये बात और है कि दिल बे-करार रहता है।

वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते,सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें।
आईना देख कर तसल्ली हुई,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
रात भी आई और चाँद भी था मगर नींद नहीं,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
आँखों को वीज़ा नहीं लगता,वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते।

फिर से नई सी लगेगी ज़िंदगी ही तो है,तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं।
गुलशन में तो हर फूल का अपना ही रंग है,सपनों की कोई सरहद नहीं होती।
आज फिर आप की कमी सी है,गुलशन में तो हर फूल का अपना ही रंग है।
बे-वजह तो नहीं होती यादों की बरसात,वक़्त में पड़ गया है बल शायद।

मुनाफ़ा कम है लेकिन गुज़ारा हो ही जाता है,खुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में।
दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई,ये बात और है कि दिल बे-करार रहता है।
ये बात और है कि दिल बे-करार रहता है,सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें।
सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है,वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते।
तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,सपनों की कोई सरहद नहीं होती।

बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,गुलशन में तो हर फूल का अपना ही रंग है।
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,वक़्त में पड़ गया है बल शायद।
हम को इस घर में जानता है कोई,खुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में।
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा,ये बात और है कि दिल बे-करार रहता है।

सपनों की कोई सरहद नहीं होती,सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें।
एक बार तो यूँ होगा थोड़ा सा सुकून होगा,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
काँटों की जुस्तजू में भटकता रहा हूँ मैं,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
कोई अटका हुआ है पल शायद,वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं टूटा करते।

कोई भीगा है शायद दिल के किसी कोने में,तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं।
खुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में,सपनों की कोई सरहद नहीं होती।
जैसे एहसान उतारता है कोई,गुलशन में तो हर फूल का अपना ही रंग है।
उम्र गुज़री है इस सहारे पर,वक़्त में पड़ गया है बल शायद।

इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है,खुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में।
लम्हा-लम्हा शुमार करते हैं,ये बात और है कि दिल बे-करार रहता है।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

गुलज़ार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

गुलज़ार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
गुलज़ार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
गुलज़ार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
गुलज़ार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
About Gulzar (गुलज़ार) — The Maestro of Human Emotion
Sampooran Singh Kalra, known universally by his pen name Gulzar, is India's most celebrated living poet, lyricist, author, and film director. Awarded the Padma Bhushan, Dadasaheb Phalke Award, Oscar, and Grammy, he revolutionized lyrical intimacy with his inventive three-line poetic form, 'Triveni'.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Gulzar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Contemporary Hindustani Poetry & Cinema, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Gulzar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Gulzar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Gulzar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Gulzar
Authentic answers about Gulzar's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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What was Gulzar's original birth name?
Gulzar was born Sampooran Singh Kalra on August 18, 1934, in Dina, Jhelum District (now in Pakistan).
What is Gulzar's poetic form 'Triveni'?
'Triveni' is a three-line poetic form invented by Gulzar. The first two lines create a thought or image, while the third line secretly unmasks a profound new meaning.
Which prestigious global awards has Gulzar won?
Gulzar won an Academy Award (Oscar) and a Grammy Award for the anthem 'Jai Ho' (Slumdog Millionaire), alongside India's highest film honor, the Dadasaheb Phalke Award.
What are Gulzar's most popular poetry books?
His celebrated collections include 'Raat Pashmine Ki', 'Pukhraj', 'Triveni', 'Pandrah Paanch Pachattar', and 'Selected Poems' translated by Pavan K. Varma.
What films did Gulzar direct?
Gulzar directed cinematic masterpieces including 'Aandhi', 'Mausam', 'Ijaazat', 'Angoor', 'Parichay', 'Koshish', and 'Lekin'.
Can I copy and download Gulzar's verses on Emotion Hub?
Yes! All 202 verses can be copied with one click, shared to WhatsApp, or downloaded as high-res 300 DPI wallpaper cards.
How does Gulzar describe his writing process?
Gulzar believes in capturing ordinary everyday moments—like sipping hot tea, waiting at a traffic signal, or looking at an old clock—and discovering cosmic emotion within them.
Can I customize a Gulzar quote in Canvas Studio?
Yes, clicking the palette icon on any verse loads it instantly into the Emotion Hub Canvas Studio with customizable fonts, gradients, and layouts.
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