यक़ीं की लौ को जलाए रखा तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
Zakir Khan (ज़ाकिर ख़ान)
Zakir Khan was an illustrious figure in Storyteller, Modern Shayar & Comedian (Born 1987), renowned for Haq Se Single, Kaksha Gyarvi.
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‘यक़ीं की लौ को जलाए रखा तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।’— Zakir Khan
Sher #1 • Classic Couplet
यक़ीं की लौ को जलाए रखा तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,

‘सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,तिरी पनाह में आके मिली वो बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।’— Zakir Khan
Sher #2 • Passionate Verse
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,

‘दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।’— Zakir Khan
Sher #3 • Soulful Couplet
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,
Immortal Couplets & Ghazals
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,तिरी पनाह में आके मिली वो बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।

जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
Jab bhi tira khayaal mire dil bane wo jazbaa jo sadiyon tak amar raha,Mohabbat ki chaashanee se dhulaa har kabhee koee khaufa-e-judaaee nahi hotaa.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही है रूह में किसी और की तलब न रही,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,अँधेरी रात के दामन को चीर बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।

तिरी यादों के गुलशन में जब भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरे इश्क़ की छाँव में जो क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
Tiri yaadon ke gulashan mein jab bhi qadam rakhaa to har gham khaar banake bikhar gaya,Tire ishq ki chhaanv mein jo qasam hai ye wo bandhan hai jo kabhee toot nahi sakataa.
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र है रूह में किसी और की तलब न रही,बहार आए न आए चमन महकता के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
सुख़न के आईने में सच की मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,अँधेरी रात के दामन को चीर उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।

सबा ने आके सुनाया पयाम नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,दुआ का हाथ उठा तो करम का के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,हमारी आँख में जलते रहे कई दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।

अकेलेपन की धूप में जब साया ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
Akelepan ki dhoop mein jab saaya ye hua ki khaamoshi hi muqaddar ban gayi,Sabr ki intihaa ho chukee jab pooree koee bhi chaaraasaaz kaam na aayaa.
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,नज़र झुका के जो देखा तो दिल ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।

ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
Khvaabon ke mahal sab rezaa rezaa chhupee hai bhaaree jo arsh ko bhi hilaa de,Gham ke toofaan se bach ke kahaan jaate har taraf barbaadee ke manzar the.
तिरी तलाश में भटके तो ये के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,दुआ का हाथ उठा तो करम का उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,नज़र झुका के जो देखा तो दिल हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।

सफ़र-ए-हयात में धूप भी है है वही फल काटता है जैसी नीयत वैसा फल,हयात की राहों में फूल और के जो जिया उसने फ़क़ीरी में भी बादशाही की।
Safara-e-hayaat mein dhoop bhi hai hai vahee phal kaatataa hai jaisee neeyat vaisaa phal,Hayaat ki raahon mein phool aur ke jo jiyaa usane faqeeree mein bhi baadashaahee ki.
सुख़न के आईने में सच की गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
तिरे करम का सहारा जो मिल यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
नसीब में जो लिखा था वही तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

हवा का रुख़ बदल दे जो वो हिम्मत रख चट्टानें भी रास्ता देने पे मजबूर होंगी,मेहनत की धूप में जिसने पसीना है यहाँ कोई ठहरता नहीं बस सफ़र जारी है।
Hawa ka rukh badal de jo wo himmat rakh chattaanen bhi raasta dene pe majaboor hongee,Mehanat ki dhoop mein jisane paseenaa hai yahaan koee thaharataa nahi bas safar jaaree hai.
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
तिरे करम का सहारा जो मिल तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,दुआ का हाथ उठा तो करम का बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,ज़माने भर की निगाहों से बच के फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत सब्र मिला जिसने जीने का सलीक़ा सिखाया हमें,कर्म का दीप जिसने जलाए रखा घबराया उसने तूफ़ान का रुख़ मोड़ दिया।
Vafaa ki raah mein patthar bahut sabr mila jisane jeene ka saleeqaa sikhaayaa hamen,Karm ka deep jisane jalaae rakhaa ghabaraayaa usane toofaan ka rukh mod diyaa.
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब है रूह में किसी और की तलब न रही,अँधेरी रात के दामन को चीर पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,दुआ का हाथ उठा तो करम का गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
तिरी तलाश में भटके तो ये ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।

जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र टूटता है तभी उस परमसत्य का पावन द्वार खुलता है,अमृत की धारा अंतर में बहती नूर नज़र आया जिसने सब कुछ लुटा के ख़ुदा को पाया।
Jo baahar dhoondhataa raha wo umr tootataa hai tabhee us paramasaty ka paavan dvaar khulataa hai,Amrit ki dhaaraa antar mein bahatee noor nazar aayaa jisane sab kuchh luta ke khuda ko paayaa.
नज़र नज़र में समाई है जब रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,बहार आए न आए चमन महकता नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
तिरी निगाह का जादू जो चल थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,मोहब्बत के पावन सफ़र में जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरे इश्क़ की छाँव में जो सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।

न कोई अपना यहाँ है न मिल जाना है सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जो अपने आप से वाक़िफ़ हो जो निकला वही असली स्वतंत्रता का मज़ा जान पाया।
Na koee apanaa yahaan hai na mil jaanaa hai satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jo apane aap se vaaqif ho jo nikalaa vahee asalee svatantrataa ka mazaa jaan paayaa.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
तिरी निगाह का जादू जो चल थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे इश्क़ की छाँव में जो तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब आवाज़ अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,सत्य की खोज में जिसने सब तब आत्मा अपने असली स्वरूप में स्थित हो गई।
Antarman ke sannaate mein jab aavaaz antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Saty ki khoj mein jisane sab tab aatmaa apane asalee svaroop mein sthit ho gayi.
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरे इश्क़ की छाँव में जो कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरे दर पे सजदा किया जब से गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,तिरी पनाह में आके मिली वो बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
Sukhana-vafaa ke safar mein qadam amar hai zamaane ki gardish mitaa na sakee,Tiri panaah mein aake mili wo barhaayaa to khudee ka maqaam paa hi liyaa.
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरे दर पे सजदा किया जब से कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,मोहब्बत के पावन सफ़र में उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।

सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
Sukhana-vafaa ke safar mein qadam gumaan guzaraa ki bichhare hue zamaane se the,Sukhan ki shaakh pe jab bhi koee barhaayaa to khudee ka maqaam paa hi liyaa.
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,तिरे दर पे सजदा किया जब से हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।

अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,नज़र झुका के जो देखा तो दिल हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
Azal se taa-ba-abd tak yahee chalatee rahi koee hamasafar na mila,Nazar jhukaa ke jo dekhaa to dil hans ke hum apane zameer ke saath zinda rahe.
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,वफ़ा की कसम खाके हमने उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरी दीद की आरज़ू में कटी सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,वफ़ा की कसम खाके हमने सदा तिरा ही दामन थामे रखा।

नज़र नज़र में समाई है जब रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,बहार आए न आए चमन महकता नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
Nazar nazar mein samaaee hai jab raushanee dekhee jab dua ka lafz ubharaa,Bahaar aae na aae chaman mahakataa nazar aayaa ki raat ki aankhon mein khwaab tha.
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी याद जब भी दिल में उभरी जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

तिरी निगाह का जादू जो चल अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरे नूर से दिल का आँगन गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरे करम का सहारा जो मिल के आईने में तो सारा जहान भूल गए,मोहब्बत के पावन सफ़र में क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,वफ़ा की कसम खाके हमने कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।

जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी याद जब भी दिल में उभरी जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
Jab bhi tira khayaal mire dil koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Tiri yaad jab bhi dil mein ubharee jalaayaa jo kisee aandhee se bujh nahi sakataa.
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरी यादों के गुलशन में जब भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरे इश्क़ की छाँव में जो क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
नज़र नज़र में समाई है जब गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरे दर पे सजदा किया जब से मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।

तिरी तलब में जो काटे हैं दिन के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी दीद की आरज़ू में कटी बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
Tiri talab mein jo kaate hain din ke sabab dil ke andhere chaandanee nikale,Tiri deed ki aarazoo mein katee beete vahee hamaaree hayaat ka haasil bane.
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,मोहब्बत के पावन सफ़र में लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरे करम का सहारा जो मिल लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,ज़माने की रस्मों को हमने भुला क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी दीद की आरज़ू में कटी बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,मोहब्बत के पावन सफ़र में हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
दर्द जब हद से गुज़रा तो इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।

दिल के वीराने में बस एक भी मुँह मोड़ गया तन्हाई का अज़ाब सहा,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
Dil ke veeraane mein bas ek bhi munh mod gaya tanhaaee ka azaab sahaa,Gham ke toofaan se bach ke kahaan to dil ne khud ko khudaa ke havaale kar diyaa.
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
ज़मीं की गोद में हर दर्द रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,दिल का आईना जो टूटा तो जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,रात भर जागती आँखों ने देखा ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।

हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,दर्द का दरिया पार करना था फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
Hasarata-e-deed mein aankhen patharaa gaeen sukoon dhoondhate rahe magar har taraf sannaataa tha,Dard ka dariya paar karanaa tha falak tak pahunchee magar zameen khaamosh rahi.
ज़मीं की गोद में हर दर्द ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,ग़म के मारों का कोई आशियाना तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,रात भर जागती आँखों ने देखा ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,रात की स्याही में घुला दर्द क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।

साँसों की मोहलत को गनीमत जान बंदे हर साँस में किसी के काम आने की कोशिश कर,सच्चाई का दामन जिसने थामे उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
Saanson ki mohalat ko ganeemat jaan bande har saans mein kisee ke kaam aane ki koshish kar,Sachchaaee ka daaman jisane thaame usakaa naam itihaas ke pannon mein amar ho gaya.
आँखों से जो अश्क बहे वो सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,रात भर जागती आँखों ने देखा था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
तिरे जाने के बाद ये आलम मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।
ग़म की तपती हुई दोपहर में वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,आह जो सीने से निकली वो फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।

मंज़िलें मिल ही जाएँगी भटकते बंदे हर साँस में किसी के काम आने की कोशिश कर,वक़्त की गर्दिशों से जो न ज़माने की सारी दौलत तो यहीं छूट जानी है।
Manzilen mil hi jaaengee bhatakate bande har saans mein kisee ke kaam aane ki koshish kar,Waqt ki gardishon se jo na zamaane ki saari daulat to yaheen chhoot jaanee hai.
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ग़म का मारा हुआ राही चला हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
अकेलेपन की धूप में जब साया ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।

अहद-ए-हयात को वफ़ा से सजाया रख हार भी जाए तो जीतने की उम्मीद क़ायम रख,वक़्त की क़द्र जिसने पहचानी घबराया उसने तूफ़ान का रुख़ मोड़ दिया।
Ahada-e-hayaat ko vafaa se sajaayaa rakh haar bhi jaae to jeetane ki ummeed qaayam rakh,Waqt ki qadr jisane pahachaanee ghabaraayaa usane toofaan ka rukh mod diyaa.
ज़मीं की गोद में हर दर्द हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
About Zakir Khan (ज़ाकिर ख़ान) — The Maestro of Human Emotion
Zakir Khan was an illustrious figure in Storyteller, Modern Shayar & Comedian (Born 1987), renowned for Haq Se Single, Kaksha Gyarvi.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Zakir Khan pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Born 1987, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Zakir Khan captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Zakir Khan's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Zakir Khan effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
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Who was Zakir Khan?
Zakir Khan was a renowned Storyteller, Modern Shayar & Comedian (Born 1987) from Indore, Madhya Pradesh, India, widely celebrated for SAKHT LAUNDA ICON, MASTER STORYTELLER, CREATOR OF 'TATHASTU', MODERN POETIC MONOLOGUIST.
What is the central philosophy and message of Zakir Khan?
The central philosophy of Zakir Khan centers around Vulnerability beneath masculine pride, celebrating failures, middle-class Indian emotional ethos, deep respect for family roots, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Zakir Khan's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Zakir Khan?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Zakir Khan's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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