क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
Vishnushastri Chiplunkar (विष्णुशास्त्री चिपळूणकर)
Vishnushastri Chiplunkar was a distinguished Bhasha Shivaji representing the Marathi/Renaissance tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
— VISHNUSHASTRI CHIPLUNKAR • MARATHI/RENAISSANCE (1850–1882)

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
— VISHNUSHASTRI CHIPLUNKAR • MARATHI/RENAISSANCE (1850–1882)
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‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।’— Vishnushastri Chiplunkar
Sher #1 • Classic Couplet
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,

‘वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।’— Vishnushastri Chiplunkar
Sher #2 • Passionate Verse
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,

‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।’— Vishnushastri Chiplunkar
Sher #3 • Soulful Couplet
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,
Immortal Couplets & Ghazals
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

विष्णुशास्त्री चिपळूणकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
About Vishnushastri Chiplunkar (विष्णुशास्त्री चिपळूणकर) — The Maestro of Human Emotion
Vishnushastri Chiplunkar was a distinguished Bhasha Shivaji representing the Marathi/Renaissance tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Vishnushastri Chiplunkar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Marathi/Renaissance (1850–1882), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Vishnushastri Chiplunkar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Vishnushastri Chiplunkar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Vishnushastri Chiplunkar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Vishnushastri Chiplunkar
Authentic answers about Vishnushastri Chiplunkar's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
Still have a question? Contact us
Who was Vishnushastri Chiplunkar and what was their literary significance?
Vishnushastri Chiplunkar (1850–1882) was a monumental figure in Marathi/Renaissance literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Vishnushastri Chiplunkar's poetry?
The core themes across Vishnushastri Chiplunkar's oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Vishnushastri Chiplunkar's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Vishnushastri Chiplunkar?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Vishnushastri Chiplunkar's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Vishnushastri Chiplunkar?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Vishnushastri Chiplunkar's poetry?
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Where is Vishnushastri Chiplunkar's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Vishnushastri Chiplunkar stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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