धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Vidyaapati (विद्यापति)
Vidyapati, known as Maithil Kokil, was a legendary poet whose melodious lyrics of Radha-Krishna romance and Shaivite devotion shaped eastern Indian literature.

धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
— VIDYAAPATI • MAITHILI MEDIEVAL RENAISSANCE

धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
— VIDYAAPATI • MAITHILI MEDIEVAL RENAISSANCE
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‘धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— Vidyaapati
Sher #1 • Classic Couplet
धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अमर नाम जग में उसी का उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— Vidyaapati
Sher #2 • Passionate Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।’— Vidyaapati
Sher #3 • Soulful Couplet
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,
Immortal Couplets & Ghazals
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अमर नाम जग में उसी का उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन के निर्मल दर्पण में जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्संग की निर्मल गंगा में निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Ishq jab rooh mein utarataa hai dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem nagar ka vaasee banakar jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,माटी का चोला पाकर जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्य का दीप जब जलता है अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Man mandir mein basaa jo moorati doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Man mandir ki paavan aaratee jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
मन मंदिर में जो दीप जले रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अमर नाम जग में उसी का अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,मोह-निशा से जो जन जागा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नाम और दौलत तो माटी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem nagar ka vaasee banakar jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

छाले पड़े हैं पाँवों में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब सबने मुँह फेर लिया केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Chhaale pare hain paanvon mein antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab sabane munh pher liyaa keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
सत्य का दीप जब जलता है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,वाणी में जिसके मिठास घुली मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,मोह-निशा से जो जन जागा उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन मंदिर में जो दीप जले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,भवसागर की लहरों से जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

कोई न अपना इस जग में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अकेलेपन की इस राह पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Koee na apanaa is jag mein hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Akelepan ki is raah par arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
अहंकार की दीवारें जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
धरती की छाती पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

आशा का दीप जब बुझने भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Aashaa ka deep jab bujhane bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Dil ke phapholon ko dekhakar tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,साधु पुरुष की वाणी कभी रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,त्याग और सेवा की भावना से जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,नेकी की राह पे जो जन लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्संग की निर्मल गंगा में जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

जिसने मन को जीत लिया भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जीवन की सच्ची पूँजी वही कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Jisane man ko jeet liyaa bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Jeevan ki sachchee poonjee vahee ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
मन के निर्मल दर्पण में जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

सच्ची लगन से जो जन करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,संतोषी सदा सुखी रहता है उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Sachchee lagan se jo jan karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नदिया की धारा बहती जावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,परहित में जिसने जीवन सौंपा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,नेकी की राह पे जो जन वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की इस पावन धारा में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

जो भीतर झाँक के देखता कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
इश्क़ जब रूह में उतरता है जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,अमर प्रेम की अमर कहानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की मस्ती में जो झूमा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

ज्ञान की पावन भोर भई जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,विरह का हर इक आँसू बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन की वीणा बज उठी जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,मन मंदिर की पावन आरती उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अमर नाम जग में उसी का उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Karm ki khetee jo jan bove ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Amar naam jag mein usee ka use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Maatee ka yeh deh banaa hai maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Satsang ki nirmal gangaa mein us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन की वीणा बज उठी जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अमर प्रेम की अमर कहानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Ahankaar ki deevaaren jab saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Amar naam jag mein usee ka jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरी याद का पावन साया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,नेकी की राह पे जो जन वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Man mandir mein jo deep jale man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Nekee ki raah pe jo jan woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
फासले मिट गए जब दिल से जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Nainan aage too hi too naache tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Jisane prem ka marm samajh jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,सच्चे प्रेम की यही निशानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रियतम की याद में जो नैना तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह का हर इक आँसू बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Hriday ke paavan sinhaasan par motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के चरणों में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Ishq ki raah anokhee bande do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Priyatam ke charanon mein jisane usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के चरणों में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के चरणों में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

भीतर-भीतर घुटता जाए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
दर्द की रात में जब कोई हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,टूटे दिल की इस वीणा से केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
सपनों के महल जब टूटे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

आशा का दीप जब बुझने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Aashaa ka deep jab bujhane doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Toote hue dil ka dard keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
आशा का दीप जब बुझने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
आँखों के आँसू जब सूखे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब कोई सहारा न बचा कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
छाले पड़े हैं पाँवों में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब सबने मुँह फेर लिया केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
आँखों के आँसू जब सूखे सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

छाले पड़े हैं पाँवों में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Chhaale pare hain paanvon mein aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jab apanon ne hi diye zakhm pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
कोई न अपना इस जग में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब कोई सहारा न बचा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
दिल का आईना जब टूटा लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द का यह गहरा सागर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आशा का दीप जब बुझने पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
ग़म की तपती दुपहरी में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब कोई सहारा न बचा तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

चंद साँसों की मोहलत में जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,मेहनत और लगन से जिसने जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Chand saanson ki mohalat mein jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Mehanat aur lagan se jisane jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
भीतर-भीतर घुटता जाए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
दिल का आईना जब टूटा दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
अकेलेपन की धूप जब साए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस लंबी यात्रा में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जिसने समय की चाल पहचानी तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jisane samay ki chaal pahachaanee tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
विरह की अगन में जलता मन पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आँखों के आँसू जब सूखे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,इस दर्द भरे दिल की सदा सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
तन्हाई के अँधियारे में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
कोई न अपना इस जग में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अकेलेपन की इस राह पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,कर्म की खेती में जो पसीना और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Karm ki khetee mein jo paseenaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
कोई न अपना इस जग में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,टूटे हुए दिल का दर्द अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
About Vidyaapati (विद्यापति) — The Maestro of Human Emotion
Vidyapati, known as Maithil Kokil, was a legendary poet whose melodious lyrics of Radha-Krishna romance and Shaivite devotion shaped eastern Indian literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Vidyaapati pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Maithili Medieval Renaissance, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Vidyaapati captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Vidyaapati's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Vidyaapati effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Vidyaapati
Authentic answers about Vidyaapati's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Vidyaapati and what was their literary significance?
Vidyaapati (1352–1448) was a monumental figure in Maithili/Bhakti literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Vidyaapati's poetry?
The core themes across Vidyaapati's oeuvre encompass राधा-कृष्ण का मधुर मिलन व विरह, शिव-पार्वती नचारी व भक्ति, रूप-सौन्दर्य का अमृत प्रवाह, प्रकृति-वसंत का उल्लास, मानवीय प्रेम की अमरता, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Vidyaapati's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Vidyaapati?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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