मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ,मोसों कहत मोल को लीन्हौ तू जसुमति कब जायौ।
Sant Surdas (संत सूरदास)
Sant Surdas was a 16th-century blind Hindu devotional poet and singer, renowned for his exquisite lyrics written in praise of Krishna in Braj Bhasha.
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‘मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ,मोसों कहत मोल को लीन्हौ तू जसुमति कब जायौ।’— Sant Surdas
Sher #1 • Classic Couplet
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ,

‘अँखियाँ हरि दरसन की भूखी,कैसे रहतिं रूप रस राची ये बतियां सुनि रूखी।’— Sant Surdas
Sher #2 • Passionate Verse
अँखियाँ हरि दरसन की भूखी,

‘मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै,जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै।’— Sant Surdas
Sher #3 • Soulful Couplet
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै,
Immortal Couplets & Ghazals
अँखियाँ हरि दरसन की भूखी,कैसे रहतिं रूप रस राची ये बतियां सुनि रूखी।
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै,जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै।
चरन कमल बंदौ हरि राई,जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै अंधर को सब कछु दरसाई।

निसिदिन बरसत नैन हमारे,सदा रहति पाउस रितु हमपै जब तें स्याम सिधारे।
मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी,किती बार मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी।
मधुर प्रेम की छाँव में बीती हर सुहानी रात,हृदय के तारों ने छेड़ी अनकही सी बात।
राह के काँटों ने हँस कर जब भी कुछ कहा,धैर्य और विश्वास का दीपक सदा जलता रहा।

चरन कमल बंदौ हरिराई,जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै अंधेर सब कछु दरसाई।
मिट्टी की देह में बसा जो अमर है प्रकाश,सत्य के पथ पर कभी न हो मन में कोई निराशा।
साहस और संकल्प से जो बढ़ते हैं आगे सदा,विपत्ति के मेघ भी उनके आगे झुक जाते हैं यथा।
कैसे रहतिं रूप रस राची ये बतियां सुनि रूखी,चरन कमल बंदौ हरि राई।

चरन कमल बंदौ हरि राई,किती बार मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी।
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो,भोर भयो गैयन के पाछे मधुबन मोहि पठायो।
मधुर प्रेम की छाँव में बीती हर सुहानी रात,विपत्ति के मेघ भी उनके आगे झुक जाते हैं यथा।
धैर्य और विश्वास का दीपक सदा जलता रहा,मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।

मिट्टी की देह में बसा जो अमर है प्रकाश,सदा रहति पाउस रितु हमपै जब तें स्याम सिधारे।
विपत्ति के मेघ भी उनके आगे झुक जाते हैं यथा,राह के काँटों ने हँस कर जब भी कुछ कहा।
अँखियाँ हरि दरसन की भूखी,सत्य के पथ पर कभी न हो मन में कोई निराशा।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै,अँखियाँ हरि दरसन की भूखी।

निसिदिन बरसत नैन हमारे,जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै अंधर को सब कछु दरसाई।
किती बार मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी,मधुर प्रेम की छाँव में बीती हर सुहानी रात।
राह के काँटों ने हँस कर जब भी कुछ कहा,कर्मवीर ही रचते हैं इतिहास का विशेष।
कर्मवीर ही रचते हैं इतिहास का विशेष,मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।

साहस और संकल्प से जो बढ़ते हैं आगे सदा,जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै।
मोसों कहत मोल को लीन्हौ तू जसुमति कब जायौ,मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी।
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै,धैर्य और विश्वास का दीपक सदा जलता रहा।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै अंधर को सब कछु दरसाई,साहस और संकल्प से जो बढ़ते हैं आगे सदा।

मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी,कैसे रहतिं रूप रस राची ये बतियां सुनि रूखी।
हृदय के तारों ने छेड़ी अनकही सी बात,निसिदिन बरसत नैन हमारे।
ऊधो मन न भए दस बीस,एक हुतो सो गयौ स्याम संग को अवराधै ईस।
सत्य के पथ पर कभी न हो मन में कोई निराशा,मिट्टी की देह में बसा जो अमर है प्रकाश।

नर हो, न निराश करो मन को,कुछ काम करो, कुछ काम करो,जग में रह कर कुछ नाम करो।
मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी?किती बार मोहि दूध पियत भई यह अजहूँ है छोटी।
नैनों के दर्पण में बसा जो रूप सलोना है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दर्द जब हद से गुज़रा तो दवा बन गया,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर ठहरा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
जो समझता है हक़ीक़त को वो ख़ामोश रहा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
चरन कमल बंदौ हरि राई।जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै अंधर कौं सब कछु दरसाई।
अंखियाँ हरि-दरसन की भूखी।कैसे रहति रूप-रस-राँची ये बतियाँ सुनि रूखी।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर ठहरा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
जसोदा हरि पालनैं झुलावै।हलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ सोइ कछु गावै।
जग में रह कर कुछ नाम करो,नर हो, न निराश करो मन को।
नैनों के दर्पण में बसा जो रूप सलोना है,नैनों के दर्पण में बसा जो रूप सलोना है।

ऊधो, मन न भए दस बीस।एक हुतौ सो गयौ स्याम संग, को आराधे ईस।
जो समझता है हक़ीक़त को वो ख़ामोश रहा,जग में रह कर कुछ नाम करो।
कुछ काम करो, कुछ काम करो,दर्द जब हद से गुज़रा तो दवा बन गया।
जिसके हर लफ़्ज़ में इंसान का दर्द होता है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

दर्द जब हद से गुज़रा तो दवा बन गया,जिसके हर लफ़्ज़ में इंसान का दर्द होता है।
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।मोसों कहत मोल को लीन्हौं तू जसुमति कब जायौ।
नर हो, न निराश करो मन को,कुछ काम करो, कुछ काम करो।
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ,‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’

वृक्ष हों भले खड़े,हों घने, हों बड़े,एक पत्र-छाहँ भी मांग मत, मांग मत, मांग मत!अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
मुसलमान औ’ हिन्दू है दो, एक मगर उनका प्याला,एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला,दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,बैर बढ़ाते मन्दिर मस्जिद मेल कराती मधुशाला!
तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी,कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!
जो बीत गई सो बात गई!जीवन में एक सितारा था, माना वह बेहद प्यारा था,वह डूब गया तो डूब गया; अंबर के आनन को देखो,कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे,जो छूट गए फिर कहाँ मिले; पर बोलो टूटे तारों परकब अंबर शोक मनाता है?जो बीत गई सो बात गई!

‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’,एक पत्र-छाहँ भी मांग मत, मांग मत, मांग मत!।
एक पत्र-छाहँ भी मांग मत, मांग मत, मांग मत!,बैर बढ़ाते मन्दिर मस्जिद मेल कराती मधुशाला!।
एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला,जीवन में एक सितारा था, माना वह बेहद प्यारा था।
तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी,जो बीत गई सो बात गई!।

जो बीत गई सो बात गई!,राह के काँटों ने हँस कर जब भी कुछ कहा।
कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे,सत्य के पथ पर कभी न हो मन में कोई निराशा।
जो बीत गई सो बात गई!,वृक्ष हों भले खड़े।
मधुर प्रेम की छाँव में बीती हर सुहानी रात,एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला।

धैर्य और विश्वास का दीपक सदा जलता रहा,अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!।
मिट्टी की देह में बसा जो अमर है प्रकाश,जो छूट गए फिर कहाँ मिले; पर बोलो टूटे तारों पर।
‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला,मधुर प्रेम की छाँव में बीती हर सुहानी रात।
वृक्ष हों भले खड़े,कर्मवीर ही रचते हैं इतिहास का विशेष।

मुसलमान औ’ हिन्दू है दो, एक मगर उनका प्याला,एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला,दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,बैर बढ़ाते मन्दिर मस्जिद मेल कराती मधुशाला!
Musalamaan au’ hindoo hai do, ek magar unakaa pyaalaa,Ek magar unakaa madiraalay, ek magar unakee haalaa,Donon rahate ek na jab tak masjid mandir mein jaate,Bair barhaate mandir masjid mel karaatee madhushaalaa!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!,अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ।
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!।
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!,तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी।
जीवन में एक सितारा था, माना वह बेहद प्यारा था,वह डूब गया तो डूब गया; अंबर के आनन को देखो।

जो छूट गए फिर कहाँ मिले; पर बोलो टूटे तारों पर,साहस और संकल्प से जो बढ़ते हैं आगे सदा।
साहस और संकल्प से जो बढ़ते हैं आगे सदा,धैर्य और विश्वास का दीपक सदा जलता रहा।
हृदय के तारों ने छेड़ी अनकही सी बात,मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला।
अखियाँ हरि दरसन की भूखीं,कैसे रहतिं रूप-रस-राँची ये बतियाँ सुनि रूखीं।

सत्य के पथ पर कभी न हो मन में कोई निराशा,दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते।
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ,जो बीत गई सो बात गई!।
हों घने, हों बड़े,कब अंबर शोक मनाता है?।
मुसलमान औ’ हिन्दू है दो, एक मगर उनका प्याला,हृदय के तारों ने छेड़ी अनकही सी बात।

बैर बढ़ाते मन्दिर मस्जिद मेल कराती मधुशाला!,मिट्टी की देह में बसा जो अमर है प्रकाश।
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!,‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।’।
वह डूब गया तो डूब गया; अंबर के आनन को देखो,मुसलमान औ’ हिन्दू है दो, एक मगर उनका प्याला।
कब अंबर शोक मनाता है?,कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!।

विपत्ति के मेघ भी उनके आगे झुक जाते हैं यथा,कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे।
राह के काँटों ने हँस कर जब भी कुछ कहा,विपत्ति के मेघ भी उनके आगे झुक जाते हैं यथा।
निसिदिन बरसत नैन हमारे,सदा रहत पावस ऋतु हम पै जब तें स्याम सिधारे।
मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,‘किस पथ से जाऊँ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला।

मानुष हों तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन,जो पसु हों तो कहा बस मेरो चरौं नित नंद की धेनु मंझारन।
जिसके हर लफ़्ज़ में इंसान का दर्द होता है,दर्द जब हद से गुज़रा तो दवा बन गया।
दर्द जब हद से गुज़रा तो दवा बन गया,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
निरगुन कौन देस कौ बासी।मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै बूझति साँच न हाँसी।

मानुष हों तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
जिसके हर लफ़्ज़ में इंसान का दर्द होता है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
मधुकर स्याम हमारे चोर।मन हरि लियौ तनिक चितवनि मैं चपल नैन की कोर।
मानुष हों तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

जिसके हर लफ़्ज़ में इंसान का दर्द होता है,जो समझता है हक़ीक़त को वो ख़ामोश रहा।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे,हम ज़मीं पे बैठ कर बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हमारे हरि हारिल की लकरी।मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।

कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
About Sant Surdas (संत सूरदास) — The Maestro of Human Emotion
Sant Surdas was a 16th-century blind Hindu devotional poet and singer, renowned for his exquisite lyrics written in praise of Krishna in Braj Bhasha.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Sant Surdas pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Bhakti Kal (Ashtachhap), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Sant Surdas captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Sant Surdas's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Sant Surdas effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Sant Surdas
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Who was Surdas?
Surdas was a 16th-century saint and foremost poet of the Ashtachhap school of Krishna bhakti.
When and where was Sant Surdas born?
Sant Surdas lived through 1478 to 1583 (Bhakti Kal (Ashtachhap)).
What makes Sant Surdas's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Sant Surdas?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Sant Surdas's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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Memorials and historic landmarks commemorating Sant Surdas stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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