मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Netaji Subhash Chandra Bose (नेताजी सुभाष चंद्र बोस)
Netaji Subhash Chandra Bose was an illustrious figure in Rashtranayak & Revolutionary Leader (1897–1945), renowned for The Indian Struggle, An Indian Pilgrim.

मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
— NETAJI SUBHASH CHANDRA BOSE • 1897–1945

मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
— NETAJI SUBHASH CHANDRA BOSE • 1897–1945
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‘मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— Netaji Subhash Chandra Bose
Sher #1 • Classic Couplet
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— Netaji Subhash Chandra Bose
Sher #2 • Passionate Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— Netaji Subhash Chandra Bose
Sher #3 • Soulful Couplet
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Netaji Subhash Chandra Bose
Sher #4 • Philosophical Verse
प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,
Immortal Couplets & Ghazals
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

साँसों की सरगम में घुल गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन धारा में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Saanson ki saragam mein ghul gaya us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem ki is paavan dhaaraa mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
मन के निर्मल दर्पण में जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हृदय में जिसके दया बसी है मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नाम और दौलत तो माटी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

साँसों की सरगम में घुल गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,मन मंदिर की पावन आरती जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Saanson ki saragam mein ghul gaya tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Man mandir ki paavan aaratee jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,दीन-बंधु का सहारा बन के वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अमर नाम जग में उसी का के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अहंकार का त्याग किया जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,दीन-बंधु का सहारा बन के व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

साँसों की सरगम में घुल गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Saanson ki saragam mein ghul gaya amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Prem nagar ka vaasee banakar aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
आशा तृष्णा सब छूटी जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
अहंकार की दीवारें जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नदिया की धारा बहती जावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

नैनों से जो नीर बहे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,अंधेरी रात के सन्नाटे में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Nainon se jo neer bahe jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Andheree raat ke sannaate mein saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
कर्म की खेती जो जन बोवे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

आँखों के आँसू जब सूखे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Aankhon ke aansoo jab sookhe yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Waqt ke is kroor prahaar ne tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मोह-निशा से जो जन जागा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

उम्र भर का सफ़र और जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Umr bhar ka safar aur jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Dard ki is ekaant gufaa mein zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

दुःख में सुमिरन सब कोई है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,सदाचार के पावन नियमों पर बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Duhkh mein sumiran sab koee hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Sadaachaar ke paavan niyamon par bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जीवन की सच्ची पूँजी वही अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Satkarmon ki amit poonjee binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jeevan ki sachchee poonjee vahee apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,नेकी की राह पे जो जन उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्य का दीप जब जलता है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
धरती की छाती पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,मोह-निशा से जो जन जागा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

ठोकर खाकर जो संभलता तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,जो अपने वचन का पक्का है उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Jo apane vachan ka pakkaa hai usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

काल का पहिया घूमता है कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
फासले मिट गए जब दिल से जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,हृदय के पावन सिंहासन पर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

माया के इस झूठे जग व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,अंतःकरण जब दर्पण की तरह तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Maayaa ke is jhoothe jag vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Antahkaran jab darpan ki tarah to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह की रात जब ढलने लगी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
साँसों की सरगम में घुल गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन धारा में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

मोह-निशा जब ढलती है जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा हुआ उसे तीनों लोकों का कोई भी प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता।
Moha-nishaa jab dhalatee hai jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa hua use teenon lokon ka koee bhi pralobhan apanee or aakarshit nahi kar sakataa.
नैन मिले जब नैनन से तब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी याद का पावन साया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन धारा में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Karm ki khetee jo jan bove maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Vaanee mein jisake mithaas ghulee usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

नदिया की धारा बहती जावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Satya-ahinsaa ki raahon par usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
मन की वीणा बज उठी जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,सच्चे प्रेम की यही निशानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
साँसों की सरगम में घुल गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Maatee ka cholaa paakar jisane usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
साँसों की सरगम में घुल गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,मन मंदिर की पावन आरती जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे मिलन की आस में बीते हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Naam aur daulat to maatee soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Hari ki kripaa ka paavan saaya avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे दीदार की एक झलक ने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन की वीणा बज उठी जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Ishq ki raah anokhee bande tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Man mandir ki paavan aaratee jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
मन की वीणा बज उठी जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे दीदार की एक झलक ने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,मन मंदिर की पावन आरती लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

तेरे दीदार की एक झलक ने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Tere deedaar ki ek jhalak ne to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Hriday ke paavan sinhaasan par naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
साँसों की सरगम में घुल गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Man ki veenaa baj uthee jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ki paavan jyoti jagaaee sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
प्रियतम की याद में जो नैना तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम के रंग में रंग कर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

टूटे दिल की ख़ामोशी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे दिल की इस वीणा से तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Toote dil ki khaamoshi mein jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Toote dil ki is veenaa se tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
मन की वीणा बज उठी जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जब से नैना रूप में उलझे सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
उम्र भर का सफ़र और जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
नैनों से जो नीर बहे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

टूटी नाव भँवर में फँसी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Tootee naav bhanvar mein phansee koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Jab apanon ne hi diye zakhm saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
दर्द की रात में जब कोई हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,टूटे दिल की इस वीणा से तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
तन्हाई के अँधियारे में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
नैनों से जो नीर बहे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,अंधेरी रात के सन्नाटे में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
घायल की गति घायल जाने सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म की इस आँधी ने जब कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

उम्र भर का सफ़र और को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Umr bhar ka safar aur ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Andheree raat ke sannaate mein chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,अकेलेपन की इस राह पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
भीतर-भीतर घुटता जाए जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब सबने मुँह फेर लिया तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
नैनों से जो नीर बहे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
उम्र भर का सफ़र और अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए दिल का दर्द तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

गिरने में कोई हार नहीं ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,जो सबको अपना मान के चले पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Girane mein koee haar nahi hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Jo sabako apanaa maan ke chale paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
टूटे दिल की ख़ामोशी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे दिल की इस वीणा से तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
ग़म की तपती दुपहरी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आशा का दीप जब बुझने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस लंबी यात्रा में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
कोई न अपना इस जग में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

मन मंदिर में जो दीप जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जो अपने वचन का पक्का है पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Man mandir mein jo deep jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jo apane vachan ka pakkaa hai paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
वक़्त की आँधी ने तोड़े रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई सहारा न बचा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आँखों में जो नमी है वो हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
ग़म की तपती दुपहरी में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,अकेलेपन की इस राह पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
आँखों के आँसू जब सूखे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

जीवन का यह कठिन सफ़र कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,सच्चे मित्र की पहचान यही बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Jeevan ka yeh kathin safar kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Sachche mitr ki pahachaan yahee bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
कोई न अपना इस जग में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,आँसुओं की इस भाषा को अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
About Netaji Subhash Chandra Bose (नेताजी सुभाष चंद्र बोस) — The Maestro of Human Emotion
Netaji Subhash Chandra Bose was an illustrious figure in Rashtranayak & Revolutionary Leader (1897–1945), renowned for The Indian Struggle, An Indian Pilgrim.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Netaji Subhash Chandra Bose pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1897–1945, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Netaji Subhash Chandra Bose captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Netaji Subhash Chandra Bose's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Netaji Subhash Chandra Bose effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Netaji Subhash Chandra Bose
Authentic answers about Netaji Subhash Chandra Bose's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Netaji Subhash Chandra Bose?
Netaji Subhash Chandra Bose was a renowned Rashtranayak & Revolutionary Leader (1897–1945) from Cuttack, Odisha, India, widely celebrated for NETAJI, SUPREME COMMANDER OF AZAD HIND FAUJ (INA), PATRIOT OF PATRIOTS.
What is the central philosophy and message of Netaji Subhash Chandra Bose?
The central philosophy of Netaji Subhash Chandra Bose centers around Total dedication to freedom, military defiance of imperialism, national discipline, youth mobilization, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Netaji Subhash Chandra Bose's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Netaji Subhash Chandra Bose?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Netaji Subhash Chandra Bose's impact on literary culture?
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