ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Sheikh Noor-ud-din Wali (शेख़ नूरुद्दीन वली (नंद ऋषि))
شیخ نور الدین ولی
Sheikh Noor-ud-din Noorani (Nund Rishi) was the patron saint of Kashmir and founder of the syncretic Rishi order, teaching harmony, ecology, and universal peace.

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
— SHEIKH NOOR-UD-DIN WALI • KASHMIR RISHI GOLDEN AGE (1377–1440)

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
— SHEIKH NOOR-UD-DIN WALI • KASHMIR RISHI GOLDEN AGE (1377–1440)
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‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— Sheikh Noor-ud-din Wali
Sher #1 • Classic Couplet
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— Sheikh Noor-ud-din Wali
Sher #2 • Passionate Verse
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘अहंकार की दीवारें जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— Sheikh Noor-ud-din Wali
Sher #3 • Soulful Couplet
अहंकार की दीवारें जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,
Immortal Couplets & Ghazals
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
अहंकार की दीवारें जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मन के मैल को जिसने धोया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Man mandir mein basaa jo moorati tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem ki mastee mein jo jhoomaa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
वाणी वही जो घाव भरे और स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,जीवन का यह पावन सूत्र जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Prem rang mein jo rang gaya palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Prem ki paavan jyoti jagaaee ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

प्रेम रंग में जो रंग गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Prem rang mein jo rang gaya ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Jisane prem ka marm samajh liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,नेकी की राह पे जो जन उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
साधु-संगत की छाया में जो अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
धरती की छाती पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

आँखों के आँसू जब सूखे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस लंबी यात्रा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Aankhon ke aansoo jab sookhe aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Gham ki is lanbee yaatraa mein manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हरि की कृपा का पावन साया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
माटी का यह देह बना है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन मंदिर में जो दीप जले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

अकेलेपन की धूप जब साए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Akelepan ki dhoop jab saae so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jeevan ke is kathin mod par manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,माटी का चोला पाकर जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

नैनों से जो नीर बहे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस गहरी रात में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Nainon se jo neer bahe haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Gham ki is gaharee raat mein tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
संतन की संगति में आकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,नेकी की राह पे जो जन परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,नेकी की राह पे जो जन उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

जीवन का यह कठिन सफ़र है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,जो अपने वचन का पक्का है चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Jeevan ka yeh kathin safar hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Jo apane vachan ka pakkaa hai chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
अहंकार की दीवारें जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
अहंकार की दीवारें जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,शांति और संतोष का धन जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

धैर्य और संतोष का धन चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जिसने अहंकार को त्याग दिया चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Dhairy aur santosh ka dhan chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
साधु-संगत की छाया में जो का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मन के मैल को जिसने धोया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्संग की निर्मल गंगा में अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

मन मंदिर में जो दीप भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य और धर्म की राहों पर पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Man mandir mein jo deep bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Saty aur dharm ki raahon par paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
सत्य के पावन पथ पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
धरती की छाती पर जिसने भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
वाणी में जो अमृत घोले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,परम शांति का यह पावन धाम जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Mrityu koee ant nahi bas avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Param shaanti ka yeh paavan dhaam jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

मन की चंचलता को जिसने उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Man ki chanchalataa ko jisane usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
बिरहा की आग में तप के कुंदन जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

मोह-निशा जब ढलती है उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु जिसने अपना शीश नवाया उसने परम मुक्ति का अमर वरदान प्राप्त कर लिया।
Moha-nishaa jab dhalatee hai umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu jisane apanaa sheesh navaayaa usane param mukti ka amar varadaan praapt kar liyaa.
बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
साँसों की सरगम में घुल गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Saty ke paavan path par jisane saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Parahit mein jisane jeevan saunpaa avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन की वीणा बज उठी जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Parahit mein jisane jeevan saunpaa vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम रंग में जो रंग गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम के रंग में रंग कर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,नेकी की राह पे जो जन उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Saty ka deep jab jalataa hai to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Nekee ki raah pe jo jan use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन धारा में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Saty ke paavan path par jisane svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Satsang ki nirmal gangaa mein usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जब से नैना रूप में उलझे नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

मन मंदिर में बसा जो मूरति जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Man mandir mein basaa jo moorati jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Prem ke is paavan teerath mein ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन घाटी में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

नैनों के दर्पण में बसा जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Nainon ke darpan mein basaa jab antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Amar prem ki amar kahaanee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन धारा में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जब से नैना रूप में उलझे संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

नैनन आगे तू ही तू नाचे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Nainan aage too hi too naache barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Jisane prem ka marm samajh jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरी याद का पावन साया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम नगर का वासी बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैनन आगे तू ही तू नाचे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

घायल की गति घायल जाने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Jab koee chaaraasaaz na mila keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
प्रेम रंग में जो रंग गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम का दीपक अंतर में जो अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी आँखों की झील में जो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
तन्हाई के अँधियारे में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस गहरी रात में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Zakhm wo nahi jo jism hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Gham ki is gaharee raat mein tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
घायल की गति घायल जाने कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द का यह गहरा सागर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,दर्द की भट्टी में तपकर ही चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
आँखों के आँसू जब सूखे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस लंबी यात्रा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
आँखों में जो नमी है वो को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द का यह गहरा सागर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Zakhm wo nahi jo jism kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
सांस-सांस में याद तुम्हारी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
विरह की अगन में जलता मन कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
विरह की अगन में जलता मन किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब सबने मुँह फेर लिया तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
आँखों में जो नमी है वो बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे हुए दिल का दर्द तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

चंद साँसों की मोहलत में मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जो अपने वचन का पक्का है उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Chand saanson ki mohalat mein man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jo apane vachan ka pakkaa hai use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
घायल की गति घायल जाने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
सपनों के महल जब टूटे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब धैर्य की सीमा टूट गई धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म के मारों की बस्ती में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस गहरी रात में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

हौसलों के तरकश में जब कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,जीवन की सच्ची पूँजी वही वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Hausalon ke tarakash mein jab kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Jeevan ki sachchee poonjee vahee vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
अकेलेपन की धूप जब साए दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
छाले पड़े हैं पाँवों में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब सबने मुँह फेर लिया तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
टूटे दिल की ख़ामोशी में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे दिल की इस वीणा से तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
अकेलेपन की धूप जब साए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

जिसने मन को जीत लिया जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,हृदय में जिसके दया और करुणा जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Jisane man ko jeet liyaa jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,इस दर्द भरे दिल की सदा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
About Sheikh Noor-ud-din Wali (शेख़ नूरुद्दीन वली (नंद ऋषि)) — The Maestro of Human Emotion
Sheikh Noor-ud-din Noorani (Nund Rishi) was the patron saint of Kashmir and founder of the syncretic Rishi order, teaching harmony, ecology, and universal peace.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Sheikh Noor-ud-din Wali pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Kashmir Rishi Golden Age (1377–1440), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Sheikh Noor-ud-din Wali captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Sheikh Noor-ud-din Wali's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Sheikh Noor-ud-din Wali effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Sheikh Noor-ud-din Wali
Authentic answers about Sheikh Noor-ud-din Wali's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Sheikh Noor-ud-din Wali and what was their literary significance?
Sheikh Noor-ud-din Wali (1377–1440) was a monumental figure in Kashmiri/Sufi literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Sheikh Noor-ud-din Wali's poetry?
The core themes across Sheikh Noor-ud-din Wali's oeuvre encompass प्रकृति-प्रेम व पर्यावरण-संरक्षण, धार्मिक सद्भाव व आपसी भाईचारा, सच्ची इबादत व सेवा, लोभ और अहंकार का त्याग, अहिंसा और सादा जीवन, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Sheikh Noor-ud-din Wali's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Sheikh Noor-ud-din Wali?
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