शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
Sheikh Ibrahim Zauq (शेख़ इब्राहीम ज़ौक़)
شیخ ابراہیم ذوق
Sheikh Ibrahim Zauq was the poet laureate of the last Mughal court and poetic mentor (ustad) to Emperor Bahadur Shah Zafar, renowned for pristine Urdu diction.

शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
— SHEIKH IBRAHIM ZAUQ • MUGHAL TWILIGHT (1789–1854)

शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
— SHEIKH IBRAHIM ZAUQ • MUGHAL TWILIGHT (1789–1854)
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‘शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।’— Sheikh Ibrahim Zauq
Sher #1 • Classic Couplet
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,

‘तिरे करम का सहारा जो मिल के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।’— Sheikh Ibrahim Zauq
Sher #2 • Passionate Verse
तिरे करम का सहारा जो मिल के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,

‘तिरे ख़याल की खुशबू बसी रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।’— Sheikh Ibrahim Zauq
Sher #3 • Soulful Couplet
तिरे ख़याल की खुशबू बसी रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,
Immortal Couplets & Ghazals
तिरे करम का सहारा जो मिल के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

तिरी आँखों की गहराइयों में खो लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
Tiri aankhon ki gaharaaiyon mein kho liyaa tire baghair duniya ajab veeraanaa thi,Vafaa ka ye gulashan hameshaa mahakegaa kyonki ise hamane apane khoona-e-jigar se seenchaa hai.
दिलों की बस्ती में जब भी कोई हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,अँधेरी रात के दामन को चीर देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
तिरे करम का सहारा जो मिल चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

तिरी तलब में जो काटे हैं दिन नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरी याद जब भी दिल में उभरी क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
Tiri talab mein jo kaate hain din nazar aayaa ki raat ki aankhon mein khwaab the,Tiri yaad jab bhi dil mein ubharee qasam hai ye wo bandhan hai jo kabhee toot nahi sakataa.
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,तिरी पनाह में आके मिली वो बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
Dila-e-muztar ko jab bhi tira ujda makaan tha tire aane se aabaad hua,Tiri aarazoo ka diyaa har gharee jaanaa ki haqeeqata-e-hayaat kyaa hotee hai.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।

ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
Zakhm wo jo jism pe nahi lageen to sabr ka daaman thaam liyaa hamane,Ashk palakon pe thaharate hi nahi to dil ne khud ko khudaa ke havaale kar diyaa.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,हमारी आँख में जलते रहे कई थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,सहर की पहली किरन ने पयाम बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।

शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
Shaba-e-gham ki taareekiyaan jab daraane rooh pe lage wo kabhee bhar nahi paate,Gham ke toofaan se bach ke kahaan nahi hotaa har mod pe begaanaapan milataa hai.
सबा ने आके सुनाया पयाम तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
तिरी तलाश में भटके तो ये रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,सहर की पहली किरन ने पयाम राह में कभी कोई सौदा न किया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी राह में कभी कोई सौदा न किया।

अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही है रूह में किसी और की तलब न रही,बहार आए न आए चमन महकता के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सबा ने आके सुनाया पयाम हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,सहर की पहली किरन ने पयाम हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।

हौसलों के तरकश में तीर ज़िंदा सब्र मिला जिसने जीने का सलीक़ा सिखाया हमें,ज़िंदगी की किताब के हर पन्ने घबराया उसने तूफ़ान का रुख़ मोड़ दिया।
Hausalon ke tarakash mein teer zinda sabr mila jisane jeene ka saleeqaa sikhaayaa hamen,Zindagi ki kitaab ke har panne ghabaraayaa usane toofaan ka rukh mod diyaa.
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,सहर की पहली किरन ने पयाम नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।

हौसलों के तरकश में तीर ज़िंदा सबक़ देता है सीखने वाला हर मोड़ से सीखता है,मेहनत की धूप में जिसने पसीना नहीं गर यक़ीं की आँख से देखा जाए।
Hausalon ke tarakash mein teer zinda sabaq detaa hai seekhane vaalaa har mod se seekhataa hai,Mehanat ki dhoop mein jisane paseenaa nahi gar yaqeen ki aankh se dekhaa jaae.
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,सहर की पहली किरन ने पयाम बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,ज़माने भर की निगाहों से बच के में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया वो अपनी ही ज़िंदगानी का दुश्मन बन गया,हक़ की आवाज़ पे जो लबबैक उसके दिल का आँगन कभी अंधेरे में न रहा।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar gaya wo apanee hi zindagaanee ka dushman ban gaya,Haq ki aavaaz pe jo lababaik usake dil ka aangan kabhee andhere mein na raha.
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,ज़माने भर की निगाहों से बच के देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब आवाज़ जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को जलाए रखा,अमृत की धारा अंतर में बहती देखे वही असली ज्ञानी और मुक्त पुरुष कहलाता है।
Antarman ke sannaate mein jab aavaaz jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko jalaae rakhaa,Amrit ki dhaaraa antar mein bahatee dekhe vahee asalee jnyaanee aur mukt purush kahalaataa hai.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा तो दिल को अजब सा सुकून मिला,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
तिरे अक्स को देखा जो दिल बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरे नूर से दिल का आँगन बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

ख़ुदा की खोज में भटके जो उसने फ़क़ीरी में भी सल्तनत का मज़ा चख लिया,दुनिया की हर शय नश्वर है नहीं सकता ये तो अफ़लाक से परे का सफ़र है।
Khuda ki khoj mein bhatake jo usane faqeeree mein bhi saltanat ka mazaa chakh liyaa,Duniya ki har shay nashvar hai nahi sakataa ye to afalaak se pare ka safar hai.
तिरे करम का सहारा जो मिल बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो के आईने में तो सारा जहान भूल गए,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,वफ़ा की कसम खाके हमने हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में इस हयात के बाद असली सफ़र अंधेरों के पार होता है,सच्चा वैराग्य वही जो दिल फ़क़त सच और नेकी का नूर ही हमेशा बाक़ी रहेगा।
Ahankaar ki deevaaren jab antar mein is hayaat ke baad asalee safar andheron ke paar hotaa hai,Sachchaa vairaagy vahee jo dil faqat sach aur nekee ka noor hi hameshaa baaqee rahegaa.
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,ज़माने की रस्मों को हमने भुला मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरे दर पे सजदा किया जब से क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
नज़र नज़र में समाई है जब भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही सदा तिरा ही दामन थामे रखा।

तिरे अक्स को देखा जो दिल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरे अक्स को देखा जो दिल गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

यक़ीं की लौ को जलाए रखा गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
Yaqeen ki lau ko jalaae rakhaa gumaan guzaraa ki bichhare hue zamaane se the,Ahada-e-vafaa ko nibhaayaa hai jaan gaye jahaan koee saayaa-e-gham na tha.
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरी याद जब भी दिल में उभरी क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरे दर पे सजदा किया जब से हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।

शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
तिरी निगाह का जादू जो चल ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरे इश्क़ की छाँव में जो अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे दर पे सजदा किया जब से हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
इश्क़ जब रूह की गहराई में भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरी याद जब भी दिल में उभरी तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।

मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
Miri jaan tire tabassum pe nisaar hai tiri hansi ne kaee veeraane mahakaa diye,Ishq mein khud ko khokar hi hamane hamen har maqaam pe azamat ataa hui.
इश्क़ की आग में तप के कुंदन बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरे करम का सहारा जो मिल में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी दीद की आरज़ू में कटी दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,वफ़ा की कसम खाके हमने उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।

तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे दर पे सजदा किया जब से हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
Tire jamaal ki khaamosh raushanee aayaa to dil ki har dharakan ibaadat ban gayi,Tire dar pe sajadaa kiyaa jab se hamane hamen har maqaam pe azamat ataa hui.
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरे नूर से दिल का आँगन कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरे करम का सहारा जो मिल नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

तिरी यादों के गुलशन में जब के आईने में तो सारा जहान भूल गए,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
Tiri yaadon ke gulashan mein jab ke aaeene mein to saaraa jahaan bhool gaye,Har ik mod pe tira deedaar mila lafz hamaaree shaayaree ka unavaan ban gaya.
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
मोहब्बत की गली में जो भी लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,ज़माने की रस्मों को हमने भुला तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
तिरी यादों के गुलशन में जब के आईने में तो सारा जहान भूल गए,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham vaaste to na the zamaane bhar ko sunaaee gayi,Gham ke toofaan se bach ke kahaan kyaa samajhegaa jo khud is aag mein na jalaa ho.
हज़ार बार तिरा नाम लब पे में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी याद जब भी दिल में उभरी लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरी चाहत का नशा रूह में अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,आह जो सीने से निकली वो तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।
किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।

सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,आँखों की नमी ने बयाँ कर था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।

ग़म की तपती हुई दोपहर में पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,दर्द का दरिया पार करना था का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
Gham ki tapatee hui dopahar mein pahunche hamaare paanv ke chhaalon ne dam toraa,Dard ka dariya paar karanaa tha ka maaraa subah ka intizaar karataa raha.
तिरे जाने के बाद ये आलम हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
ग़म की तपती हुई दोपहर में हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,रात की स्याही में घुला दर्द में सब अपने अपने घरों को चले गए।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ग़म के मारों का कोई आशियाना ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।

हौसलों के तरकश में तीर ज़िंदा मिला हमको तिरी रज़ा पे सर झुका दिया हमने,कर्म का दीप जिसने जलाए रखा काँटे दोनों हैं काँटों पे चलके ही मंज़िल मिलती है।
Hausalon ke tarakash mein teer zinda mila hamako tiri razaa pe sar jhukaa diyaa hamane,Karm ka deep jisane jalaae rakhaa kaante donon hain kaanton pe chalake hi manzil milatee hai.
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,दर्द का दरिया पार करना था मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।

सुख़न के आईने में सच की हिम्मत रख चट्टानें भी रास्ता देने पे मजबूर होंगी,उम्मीद का सूरज कभी डूबता लिया उसने हर हाल में ख़ुशी का रास्ता पा लिया।
Sukhan ke aaeene mein sach ki himmat rakh chattaanen bhi raasta dene pe majaboor hongee,Ummeed ka sooraj kabhee doobataa liyaa usane har haal mein khushee ka raasta paa liyaa.
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ग़म के मारों का कोई आशियाना ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,अपनी बेबसी पे रोना आया था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।

कर्म की खेती जो इंसान बोता और छाँव भी हर हाल में मुस्कुराना सीख ले,सब्र और शुक्र की चादर ओढ़ उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
Karm ki khetee jo insaan botaa aur chhaanv bhi har haal mein muskuraanaa seekh le,Sabr aur shukr ki chaadar orh usakaa naam itihaas ke pannon mein amar ho gaya.
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,रात भर जागती आँखों ने देखा क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।
About Sheikh Ibrahim Zauq (शेख़ इब्राहीम ज़ौक़) — The Maestro of Human Emotion
Sheikh Ibrahim Zauq was the poet laureate of the last Mughal court and poetic mentor (ustad) to Emperor Bahadur Shah Zafar, renowned for pristine Urdu diction.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Sheikh Ibrahim Zauq pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Mughal Twilight (1789–1854), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Sheikh Ibrahim Zauq captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Sheikh Ibrahim Zauq's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Sheikh Ibrahim Zauq effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Sheikh Ibrahim Zauq
Authentic answers about Sheikh Ibrahim Zauq's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Sheikh Ibrahim Zauq and what was their literary significance?
Sheikh Ibrahim Zauq (1789–1854) was a monumental figure in Urdu/Classical literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Sheikh Ibrahim Zauq's poetry?
The core themes across Sheikh Ibrahim Zauq's oeuvre encompass ज़िंदगी, मौत और क़िस्मत का फलसफ़ा, ज़बान की पाकीज़गी व मुहावरा, दुनिया की बे-सबाती व फ़ना, इश्क़ और सब्र की तालीम, अदब और उस्तादाना कमाल, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Sheikh Ibrahim Zauq's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Sheikh Ibrahim Zauq?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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