मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,मैं ग़म-ए-जहाँ से हूँ ख़ूगर मुझे यूँ सता के मज़ा न दे।
Shakeel Badayuni (शकील बदायूँनी)
Shakeel Badayuni (1916–1970) was a titan of Urdu/Ghazal literature, celebrated for profound insights, lyrical beauty, and lasting emotional resonance.

मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,मैं ग़म-ए-जहाँ से हूँ ख़ूगर मुझे यूँ सता के मज़ा न दे।
— SHAKEEL BADAYUNI • GOLDEN ERA OF FILM & CLASSICAL GHAZAL (1916–1970)

मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,मैं ग़म-ए-जहाँ से हूँ ख़ूगर मुझे यूँ सता के मज़ा न दे।
— SHAKEEL BADAYUNI • GOLDEN ERA OF FILM & CLASSICAL GHAZAL (1916–1970)
Download Aesthetic Shakeel Badayuni Story Cards

‘मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,मैं ग़म-ए-जहाँ से हूँ ख़ूगर मुझे यूँ सता के मज़ा न दे।’— Shakeel Badayuni
Sher #1 • Classic Couplet
मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,

‘मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।’— Shakeel Badayuni
Sher #2 • Passionate Verse
मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,

‘मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,मैं ग़म-ए-जहाँ का सताया हूँ मुझे प्यार का भी गिला न दे।’— Shakeel Badayuni
Sher #3 • Soulful Couplet
मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,
Immortal Couplets & Ghazals
मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,मैं ग़म-ए-जहाँ का सताया हूँ मुझे प्यार का भी गिला न दे।
मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
About Shakeel Badayuni (शकील बदायूँनी) — The Maestro of Human Emotion
Shakeel Badayuni (1916–1970) was a titan of Urdu/Ghazal literature, celebrated for profound insights, lyrical beauty, and lasting emotional resonance.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Shakeel Badayuni pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Golden Era of Film & Classical Ghazal (1916–1970), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Shakeel Badayuni captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Shakeel Badayuni's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Shakeel Badayuni effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
Explore Other Ghazal Masters
Create Aesthetic Cards in Under 30 Seconds
Select your favourite shayari or quote, choose an ethereal cosmic gradient, adjust the font to Noto Serif Devanagari, and export immediately.
- No sign up
- No watermark
- Free forever
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic PoetryMessages for every occasion and every person
Pick who you are writing to, or the festival, and open a ready collection.
- Birthday for dadWarm lines for the man who raised you
- Anniversary for husbandSweet notes for the one by your side
- Good morning, familyA bright start for the family group
- Good night, girlfriendSoft words before she sleeps
- Diwali wishesFestive messages for family and friends
- Holi wishesColourful lines for your friends
- Eid wishesEid Mubarak for your loved ones
- Farewell, colleagueKind goodbyes for a teammate
- CongratulationsCheer on a friend's big win
- Miss you, girlfriendFor the days when distance feels long
- Funny birthdayLight-hearted wishes for a best friend
- Christmas wishesSeason's greetings for the family
Popular searches
- Breakup Shayari for Girlfriend
- Attitude Shayari for Boys
- Attitude Shayari for Girls
- Attitude Status for Boys
- Alone Shayari
- 2 Line Attitude Shayari
- 2 Line Breakup Shayari
- Love Shayari for Girlfriend
- Miss You Shayari for Girlfriend
- Emotional Shayari for Mom
- Heart Touching Shayari for Husband
- Birthday Wishes for Wife
- Birthday Wishes for Husband
- Love Status for WhatsApp
- Inspirational Quotes for Students
- Life Quotes for Self
Poets, Festivals & Status
Read the voices behind the verses, plan ahead for festivals and grab a quick status line
Essential Questions About Shakeel Badayuni
Authentic answers about Shakeel Badayuni's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
Still have a question? Contact us
Who was Shakeel Badayuni?
Shakeel Badayuni (1916–1970) was an eminent literary figure in Urdu/Ghazal, renowned worldwide for monumental poetry.
What are the major themes in Shakeel Badayuni's poetry?
Their poetry explores love, philosophical contemplation, human resilience, spiritual elevation, and social consciousness.
What makes Shakeel Badayuni's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Shakeel Badayuni?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Shakeel Badayuni's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Shakeel Badayuni?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Shakeel Badayuni's poetry?
Yes! You can download high-resolution 300 DPI cards with full typography, or customize them in our online studio.
Where is Shakeel Badayuni's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Shakeel Badayuni stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
Ready to Express Yourself?
Pick a line, add your style and send it off. Your first card is a few taps away.






