सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Shah Hussain (शाह हुसैन)
شاہ حسین
Shah Hussain (Madho Lal Hussain) was a 16th-century Punjabi Sufi mystic who pioneered the Kafi genre of poetry, singing of absolute divine union.

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— SHAH HUSSAIN • MUGHAL SUFI RENAISSANCE (1538–1599)

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— SHAH HUSSAIN • MUGHAL SUFI RENAISSANCE (1538–1599)
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‘सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— Shah Hussain
Sher #1 • Classic Couplet
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Shah Hussain
Sher #2 • Passionate Verse
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘धरती की छाती पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Shah Hussain
Sher #3 • Soulful Couplet
धरती की छाती पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,
Immortal Couplets & Ghazals
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
धरती की छाती पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
कर्म की खेती जो जन बोवे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हरि की कृपा का पावन साया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

तेरे मिलन की आस में बीते रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन धारा में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Tere milan ki aas mein beete raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Prem ki is paavan dhaaraa mein motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,माटी का चोला पाकर जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Tere roop ki paavan jhaankee priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Prem ki mastee mein jo jhoomaa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मन के मैल को जिसने धोया रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Nainan aage too hi too naache palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Prem ki paavan jyoti jagaaee yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
नदिया की धारा बहती जावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मन के मैल को जिसने धोया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Waqt ke thaperon ne hamen hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Andheree raat ke sannaate mein tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
नदिया की धारा बहती जावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

वक़्त की आँधी ने तोड़े पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Waqt ki aandhee ne tore par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Gham ki is lanbee yaatraa mein tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सदाचार की पावन वेदी पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मन के मैल को जिसने धोया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Waqt ke thaperon ne hamen jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Jab apanon ne hi diye zakhm sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अहंकार का त्याग किया जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
अहंकार की दीवारें जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हृदय में जिसके दया बसी है अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

नदी की तरह बहते रहना जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,सत्संगति का पावन प्रभाव जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Nadee ki tarah bahate rahanaa jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Satsangati ka paavan prabhaav jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
नदिया की धारा बहती जावे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हृदय में जिसके दया बसी है व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

नदी की तरह बहते रहना जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,विपदाओं से जो कभी न डरा चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Vipadaaon se jo kabhee na daraa chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

समय का पहिया चलता जाए जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,समय की अमूल्य बूँदों को वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Samay ki amooly boondon ko vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
सत्य का दीप जब जलता है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,भवसागर की लहरों से जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

घट-घट में वह एक अनंता में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम की चाहत में जिसने एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

परमसत्य का पावन दर्शन इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,परम पद की प्राप्ति उसी को होती जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Paramasaty ka paavan darshan ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Param pad ki praapti usee ko hotee jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जब से नैना रूप में उलझे मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे मिलन की आस में बीते रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन धारा में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Saty ka deep jab jalataa hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Amrit svaroop us paramaatmaa mein woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,मन मंदिर की पावन आरती जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Man ke nirmal darpan mein jab saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Moha-nishaa se jo jan jaagaa use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,मन मंदिर की पावन आरती कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

वाणी वही जो घाव भरे और अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मन के मैल को जिसने धोया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Man ke mail ko jisane dhoyaa usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
तेरे रूप की पावन झांकी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,अमर प्रेम की अमर कहानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
फासले मिट गए जब दिल से का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Maatee ka cholaa paakar jisane use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Karm ki khetee jo jan bove ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
बिरहा की आग में तप के कुंदन हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम की चाहत में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के रंग में रंग कर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Man mandir mein basaa jo moorati palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Priyatam ki chaahat mein jisane to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
तेरे रूप की पावन झांकी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem binaa sab soonaa jag mein priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Sachche prem ki yahee nishaanee use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के रंग में रंग कर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैनन आगे तू ही तू नाचे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे दीदार की एक झलक ने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

प्रियतम की याद में जो नैना संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Priyatam ka anuraag hi jisakaa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
प्रियतम की याद में जो नैना दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे प्रेम की यही निशानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रियतम की याद में जो नैना संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

दर्द की रात में जब कोई हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस गहरी रात में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Dard ki raat mein jab koee hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Gham ki is gaharee raat mein tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
तेरे मिलन की आस में बीते पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के रंग में रंग कर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
अकेलेपन की धूप जब साए जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म की इस लंबी यात्रा में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
उम्र भर का सफ़र और पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Zakhm wo nahi jo jism haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Waqt ke is kroor prahaar ne akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
दर्द की रात में जब कोई हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
दिल का आईना जब टूटा चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
तन्हाई के अँधियारे में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,टूटे हुए दिल का दर्द तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

आशा का दीप जब बुझने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Aashaa ka deep jab bujhane antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab apanon ne hi diye zakhm tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
सांस-सांस में याद तुम्हारी रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
नैनों से जो नीर बहे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
मन के कोने में सिमटी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,टूटे हुए सपनों की किरचें तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
ग़म की तपती दुपहरी में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

चंद साँसों की मोहलत में ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,समय की अमूल्य बूँदों को उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Chand saanson ki mohalat mein hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Samay ki amooly boondon ko usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
दर्द की रात में जब कोई हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस गहरी रात में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
नैनों से जो नीर बहे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब कोई सहारा न बचा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
दिल का आईना जब टूटा पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
दर्द की रात में जब कोई भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

चंद साँसों की मोहलत में चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,अंत समय जब निकट आएगा मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Chand saanson ki mohalat mein chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Ant samay jab nikat aaegaa manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
कोई न अपना इस जग में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
कोई न अपना इस जग में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
कोई न अपना इस जग में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब सबने मुँह फेर लिया ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
वक़्त की आँधी ने तोड़े पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

धरती की छाती पर जिसने जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,त्याग और सेवा की भावना से जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Dharatee ki chhaatee par jisane jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
भीतर-भीतर घुटता जाए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अकेलेपन की इस राह पर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
About Shah Hussain (शाह हुसैन) — The Maestro of Human Emotion
Shah Hussain (Madho Lal Hussain) was a 16th-century Punjabi Sufi mystic who pioneered the Kafi genre of poetry, singing of absolute divine union.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Shah Hussain pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Mughal Sufi Renaissance (1538–1599), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Shah Hussain captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Shah Hussain's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Shah Hussain effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Shah Hussain
Authentic answers about Shah Hussain's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Shah Hussain and what was their literary significance?
Shah Hussain (1538–1599) was a monumental figure in Punjabi/Sufi literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Shah Hussain's poetry?
The core themes across Shah Hussain's oeuvre encompass अद्वैत प्रेम व आत्मा का मिलन, ख़ुदी को मिटाकर प्रभु में लीन होना, सांसारिक मान-सम्मान का त्याग, काफ़ी छंद का मधुर संगीत, सच्ची लगन और रूहानी मस्ती, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Shah Hussain's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Shah Hussain?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Shah Hussain's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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