दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) (साने गुरुजी)
Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) was a distinguished Rishi of Pure Affection representing the Marathi/Humanist tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
— PANDURANG SADASHIV SANE (SANE GURUJI) • MARATHI/HUMANIST (1899–1950)

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
— PANDURANG SADASHIV SANE (SANE GURUJI) • MARATHI/HUMANIST (1899–1950)
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‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।’— Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)
Sher #1 • Classic Couplet
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,

‘नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Pandurang Sadashiv Sane,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।’— Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)
Sher #2 • Passionate Verse
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Pandurang Sadashiv Sane,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Pandurang Sadashiv Sane,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।’— Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)
Sher #3 • Soulful Couplet
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Pandurang Sadashiv Sane,
Immortal Couplets & Ghazals
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Pandurang Sadashiv Sane,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Pandurang Sadashiv Sane,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Pandurang Sadashiv Sane,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Pandurang Sadashiv Sane,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Pandurang Sadashiv Sane,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Pandurang Sadashiv Sane,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Pandurang Sadashiv Sane,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Pandurang Sadashiv Sane,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
Sataguru mile to raah dikhaave bharam ka pardaa tore,. Pandurang Sadashiv Sane,Kaayar baithe bhaagy gine aur dheer purush kar dikhalaave.
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Pandurang Sadashiv Sane,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Pandurang Sadashiv Sane,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Pandurang Sadashiv Sane,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Pandurang Sadashiv Sane,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Pandurang Sadashiv Sane,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Pandurang Sadashiv Sane,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Pandurang Sadashiv Sane,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Pandurang Sadashiv Sane,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। Pandurang Sadashiv Sane,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
Saane gurujee kahen suno bhaee saadho man ko nirmal keejai,. Pandurang Sadashiv Sane,Krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa.
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Pandurang Sadashiv Sane,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Pandurang Sadashiv Sane,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Pandurang Sadashiv Sane,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Pandurang Sadashiv Sane,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। Pandurang Sadashiv Sane,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Pandurang Sadashiv Sane,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Pandurang Sadashiv Sane,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Pandurang Sadashiv Sane,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Pandurang Sadashiv Sane,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Pandurang Sadashiv Sane,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Pandurang Sadashiv Sane,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Pandurang Sadashiv Sane,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Pandurang Sadashiv Sane,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Pandurang Sadashiv Sane,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Pandurang Sadashiv Sane,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Pandurang Sadashiv Sane,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Pandurang Sadashiv Sane,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Pandurang Sadashiv Sane,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab prabhu charanon chit laagaa,. Pandurang Sadashiv Sane,Ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee.
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Pandurang Sadashiv Sane,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Pandurang Sadashiv Sane,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Pandurang Sadashiv Sane,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Pandurang Sadashiv Sane,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Pandurang Sadashiv Sane,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Pandurang Sadashiv Sane,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Pandurang Sadashiv Sane,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Pandurang Sadashiv Sane,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Pandurang Sadashiv Sane,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
साने गुरुजी कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Pandurang Sadashiv Sane,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Pandurang Sadashiv Sane,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Pandurang Sadashiv Sane,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Pandurang Sadashiv Sane,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
About Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) (साने गुरुजी) — The Maestro of Human Emotion
Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) was a distinguished Rishi of Pure Affection representing the Marathi/Humanist tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Marathi/Humanist (1899–1950), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)
Authentic answers about Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) and what was their literary significance?
Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) (1899–1950) was a monumental figure in Marathi/Humanist literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s poetry?
The core themes across Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s poetry?
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Where is Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji)'s memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Pandurang Sadashiv Sane (Sane Guruji) stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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