यक़ीं की लौ को जलाए रखा फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
Rumi (मौलाना जलालुद्दीन रूमी)
مولانا جلال الدین رومی
Jalal al-Din Muhammad Rumi was the 13th-century Persian Sufi poet whose universal hymns on divine love, ecstasy, and spiritual union enchant humanity across all borders.

यक़ीं की लौ को जलाए रखा फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
— RUMI • PERSIAN MYSTIC GOLDEN AGE (1207–1273)

यक़ीं की लौ को जलाए रखा फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
— RUMI • PERSIAN MYSTIC GOLDEN AGE (1207–1273)
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‘यक़ीं की लौ को जलाए रखा फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।’— Rumi
Sher #1 • Classic Couplet
यक़ीं की लौ को जलाए रखा फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,

‘ज़मीं की गोद में हर दर्द सो यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।’— Rumi
Sher #2 • Passionate Verse
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,

‘हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सहर की पहली किरन ने पयाम तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।’— Rumi
Sher #3 • Soulful Couplet
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,
Immortal Couplets & Ghazals
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सहर की पहली किरन ने पयाम तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,हमारी आँख में जलते रहे कई ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,सहर की पहली किरन ने पयाम फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
सबा ने आके सुनाया पयाम यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,बहार आए न आए चमन महकता ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

नज़र नज़र में समाई है जब मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,तिरी पनाह में आके मिली वो गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
तिरी तलाश में भटके तो ये ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,तिरी पनाह में आके मिली वो पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।

ख़ुदी को खो के जो पाया वो फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
तिरी तलाश में भटके तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,हमारी आँख में जलते रहे कई के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।

यक़ीं की लौ को जलाए रखा रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,दुआ का हाथ उठा तो करम का आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
सुख़न के आईने में सच की फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,नज़र झुका के जो देखा तो दिल फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,हमारी आँख में जलते रहे कई आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।

वक्त का पहिया घूमता है बिना ठहरा जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,नेकियों की पूंजी जो संग लेकर और मज़बूत इरादों का इंसान बना दिया।
Waqt ka pahiyaa ghoomataa hai binaa thaharaa jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Nekiyon ki poonjee jo sang lekar aur mazaboot iraadon ka insaan banaa diyaa.
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
तिरी तलाश में भटके तो ये फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया मंज़िलें खुद ब खुद रास्ता बनाती चली गईं,वक़्त की गर्दिशों से जो न काँटे दोनों हैं काँटों पे चलके ही मंज़िल मिलती है।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar gaya manzilen khud ba khud raasta banaatee chalee gaeen,Waqt ki gardishon se jo na kaante donon hain kaanton pe chalake hi manzil milatee hai.
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
तिरे करम का सहारा जो मिल मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हमारी आँख में जलते रहे कई उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
नज़र नज़र में समाई है जब अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सहर की पहली किरन ने पयाम थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।

हवा का रुख़ बदल दे जो वो का सफ़र है आज ग़म तो कल ख़ुशी का सूरज चमकेगा,इंसानियत का फ़र्ज़ जिसने निभाया पे हमने सच और ईमानदारी की इबारत लिखी।
Hawa ka rukh badal de jo wo ka safar hai aaj gham to kal khushee ka sooraj chamakegaa,Insaaniyat ka farz jisane nibhaayaa pe hamane sach aur eemaanadaaree ki ibaarat likhee.
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।

मैं और मेरा का भ्रम जब दश्त-ओ-सहरा में वो अपने दिल में समाया हुआ न देख सके,सत्य की खोज में जिसने सब हुआ जब जाना कि जिसे ढूँढते थे वो खुद अपने अंदर था।
Main aur mera ka bhram jab dashta-o-saharaa mein wo apane dil mein samaayaa hua na dekh sake,Saty ki khoj mein jisane sab hua jab jaanaa ki jise dhoondhate the wo khud apane andar tha.
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा के आईने में तो सारा जहान भूल गए,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब आवाज़ दश्त-ओ-सहरा में वो अपने दिल में समाया हुआ न देख सके,परम चैतन्य का आलोक जब फैला कर पाता है जो समस्त कामनाओं से मुक्त हो चुका हो।
Antarman ke sannaate mein jab aavaaz dashta-o-saharaa mein wo apane dil mein samaayaa hua na dekh sake,Param chaitany ka aalok jab phailaa kar paataa hai jo samast kaamanaaon se mukt ho chukaa ho.
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी चाहत का नशा रूह में हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी याद जब भी दिल में उभरी तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी दीद की आरज़ू में कटी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु टूटता है तभी उस परमसत्य का पावन द्वार खुलता है,सत्य की खोज में जिसने सब का द्वार है जहाँ कोई संशय और द्वंद्व बाक़ी नहीं रहता।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab prabhu tootataa hai tabhee us paramasaty ka paavan dvaar khulataa hai,Saty ki khoj mein jisane sab ka dvaar hai jahaan koee sanshay aur dvandv baaqee nahi rahataa.
वफ़ा का जाम जो पी ले वो में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी चाहत का नशा रूह में गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
Zameen ki god mein har dard so yaqeen ki lau ko bujhane na diyaa hamane,Hamaaree khaamoshi bhi ik sadaa banee gaa utheen mohabbat ka taraanaa goonj uthaa.
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरे इश्क़ की छाँव में जो लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,मोहब्बत के पावन सफ़र में गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
नज़र नज़र में समाई है जब अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी याद जब भी दिल में उभरी अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
मोहब्बत की गली में जो भी आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।

तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरे नूर से दिल का आँगन हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी दीद की आरज़ू में कटी जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
इश्क़ जब रूह की गहराई में के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरी चाहत का नशा रूह में उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar gavaahee dee ki ashkon mein raat kaatee hai,Na koee shikavaa zabaan par na aankh ke nikalee wo subah jisakee aarazoo thi hamen.
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरे इश्क़ की छाँव में जो तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
तिरी यादों के गुलशन में जब आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरे इश्क़ की छाँव में जो सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।

तिरी निगाह का जादू जो चल गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी याद जब भी दिल में उभरी गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरे अक्स को देखा जो दिल में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
नज़र नज़र में समाई है जब थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

तिरी तलब में जो काटे हैं दिन वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
Tiri talab mein jo kaate hain din wo raaten hamaaree ibaadaton ka haasil baneen,Dilon ke taaalluq ko sadiyon ki jaanaa ki haqeeqata-e-hayaat kyaa hotee hai.
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरे नूर से दिल का आँगन सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,ज़माने की रस्मों को हमने भुला पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
तिरे करम का सहारा जो मिल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी याद जब भी दिल में उभरी मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।

क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी दीद की आरज़ू में कटी हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
Qadama-ba-qadam tira naqsha-e-vafaa khayaal aayaa to har ik zakhm muskuraa uthaa,Tiri deed ki aarazoo mein katee hamen too hi too nazar aayaa jahaan bhi dekhaa.
मोहब्बत की गली में जो भी आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरे इश्क़ की छाँव में जो ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरी याद जब भी दिल में उभरी क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,तिरी दीद की आरज़ू में कटी हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

तिरे करम का सहारा जो मिल में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
ग़म की तपती हुई दोपहर में टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।

मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,रात की स्याही में घुला दर्द तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
Mire ashkon ki qeemat koee kyaa magar tira koee payaam na aayaa ai sitamagar,Raat ki syaahee mein ghulaa dard tanhaaee ki kashti mein koee mallaah na tha.
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने में सब अपने अपने घरों को चले गए।
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,रात की स्याही में घुला दर्द तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
तन्हाई की रात में जब कोई दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,अपनी बेबसी पे रोना आया दिया वो दर्द जो लफ़्ज़ों में न समा सका।

दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
छाले पड़े हैं पाँवों में और ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,अपनी बेबसी पे रोना आया सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।
ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,आह जो सीने से निकली वो में सब अपने अपने घरों को चले गए।

कर्म की खेती जो इंसान बोता सबक़ देता है सीखने वाला हर मोड़ से सीखता है,इंसानियत का फ़र्ज़ जिसने निभाया उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
Karm ki khetee jo insaan botaa sabaq detaa hai seekhane vaalaa har mod se seekhataa hai,Insaaniyat ka farz jisane nibhaayaa usakaa naam itihaas ke pannon mein amar ho gaya.
अकेलेपन की धूप में जब साया जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।
किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,दर्द की वादियों में जब भी क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।

जो तूफ़ानों में कश्ती को खेते मिला हमको तिरी रज़ा पे सर झुका दिया हमने,हर ठोकर ने हमें चलना सिखाया गया वो ज़माने की हर बाज़ी जीत गया।
Jo toofaanon mein kashti ko khete mila hamako tiri razaa pe sar jhukaa diyaa hamane,Har thokar ne hamen chalanaa sikhaayaa gaya wo zamaane ki har baazee jeet gaya.
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।
छाले पड़े हैं पाँवों में और पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
छाले पड़े हैं पाँवों में और मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ फ़लक तक पहुँची मगर ज़मीं ख़ामोश रही।
तिरे जाने के बाद ये आलम हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल था अपनी ही धड़कनों का मातम करता हुआ।

ठोकरों से संभलना ही ज़िंदगी का और छाँव भी हर हाल में मुस्कुराना सीख ले,नेक नामी ही असल दौलत है और मज़बूत इरादों का इंसान बना दिया।
Thokaron se sanbhalanaa hi zindagi ka aur chhaanv bhi har haal mein muskuraanaa seekh le,Nek naamee hi asal daulat hai aur mazaboot iraadon ka insaan banaa diyaa.
दर्द जब हद से गुज़रा तो हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
About Rumi (मौलाना जलालुद्दीन रूमी) — The Maestro of Human Emotion
Jalal al-Din Muhammad Rumi was the 13th-century Persian Sufi poet whose universal hymns on divine love, ecstasy, and spiritual union enchant humanity across all borders.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Rumi pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Persian Mystic Golden Age (1207–1273), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Rumi captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Rumi's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Rumi effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Rumi
Authentic answers about Rumi's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Rumi and what was their literary significance?
Rumi (1207–1273) was a monumental figure in Persian/Sufi literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Rumi's poetry?
The core themes across Rumi's oeuvre encompass रूहानी इश्क़ की असीम शक्ति, आत्मा का परमात्मा से मिलन, हृदय की शुद्धि और प्रकाश, मानवता और सार्वभौमिक शांति, सच्ची मुक्ति व आंतरिक नृत्य, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Rumi's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Rumi?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Rumi's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Rumi?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Rumi's poetry?
Yes! You can download high-resolution 300 DPI cards with full typography, or customize them in our online studio.
Where is Rumi's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Rumi stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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