आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Rasul Mir (रसूल मीर)
رسول میر
Rasul Mir of Shahabad was the supreme Romantic poet of Kashmir, celebrated as the 'John Keats of Kashmir' for introducing the modern romantic ghazal into Kashmiri.

आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
— RASUL MIR • ROMANTIC KASHMIRI ERA (1840–1900)

आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
— RASUL MIR • ROMANTIC KASHMIRI ERA (1840–1900)
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— Rasul Mir
Sher #1 • Classic Couplet
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— Rasul Mir
Sher #2 • Passionate Verse
नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— Rasul Mir
Sher #3 • Soulful Couplet
वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,
Immortal Couplets & Ghazals
नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

तेरे मिलन की आस में बीते संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Tere milan ki aas mein beete sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Prem nagar ka vaasee banakar ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्य का दीप जब जलता है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,माटी का चोला पाकर जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम के इस पावन तीरथ में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Nain mile jab nainan se tab us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem ke is paavan teerath mein aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हरि की कृपा का पावन साया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Man ki veenaa baj uthee jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Saanson ke har taar pe jisakaa apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
अहंकार की दीवारें जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,भवसागर की लहरों से जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

आशा का दीप जब बुझने जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब नयनों के सब आँसू सूखे ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Aashaa ka deep jab bujhane jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
नाम और दौलत तो माटी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,नेकी की राह पे जो जन जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

आँखों में जो नमी है वो पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Aankhon mein jo namee hai wo par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Jab koee chaaraasaaz na mila keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
नदिया की धारा बहती जावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नदिया की धारा बहती जावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

कोई न अपना इस जग में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब नयनों के सब आँसू सूखे धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Koee na apanaa is jag mein par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

धैर्य और संतोष का धन जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,अंत समय जब निकट आएगा और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Dhairy aur santosh ka dhan jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Ant samay jab nikat aaegaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,दीन-बंधु का सहारा बन के जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य वचन जो मुख से बोले उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जिसने समय की चाल पहचानी है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Satkarmon ki amit poonjee jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jisane samay ki chaal pahachaanee hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
अहंकार की दीवारें जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हृदय में जिसके दया बसी है उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,जीवन का यह पावन सूत्र जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,संतोषी सदा सुखी रहता है और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Zindagi aur kuchh nahi bas jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मन के मैल को जिसने धोया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सच्चा मोक्ष वही कहलाता है जहाँ जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Antarman ke sannaate mein jab barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Sachchaa moksh vahee kahalaataa hai jahaan jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
नाम और दौलत तो माटी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
बिरहा की आग में तप के कुंदन डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

संतन की संगति में आकर उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,अंतःकरण जब दर्पण की तरह अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Santan ki sangati mein aakar umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Antahkaran jab darpan ki tarah antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
फासले मिट गए जब दिल से दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम का दीपक अंतर में जो प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे मिलन की आस में बीते संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,वैराग्य की इस पावन धारा में जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Antarman ke sannaate mein jab hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Vairaagy ki is paavan dhaaraa mein jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
तेरी याद का पावन साया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
मन की वीणा बज उठी जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Shaanti aur santosh ka dhan jo vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,मन मंदिर की पावन आरती अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी याद का पावन साया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

साधु-संगत की छाया में जो अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Man ke mail ko jisane dhoyaa jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरी आँखों की झील में जो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे मिलन की आस में बीते प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

वाणी वही जो घाव भरे और स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Parahit mein jisane jeevan saunpaa use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम के इस पावन तीरथ में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

नाम और दौलत तो माटी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Naam aur daulat to maatee ramaa rahe har dam use sansaar ki koee chintaa kabhee sataa nahi sakatee,Satsang ki nirmal gangaa mein usane paramaanand paayaa ahankaar mitate hi antar ka sachchaa sukh milataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
मन की वीणा बज उठी जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Nainan aage too hi too naache dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Sachche aashiq ki pahachaan yahee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी याद का पावन साया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अमर प्रेम की अमर कहानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जब से नैना रूप में उलझे अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Ishq ki raah anokhee bande do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Saanson ke har taar pe jisakaa jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
तेरे रूप की पावन झांकी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

मन की वीणा बज उठी जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Man ki veenaa baj uthee jab jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Priyatam ke charanon mein jisane sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,मन मंदिर की पावन आरती और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरी आँखों की झील में जो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
मन की वीणा बज उठी जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

ग़म की तपती दुपहरी में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Gham ki tapatee dupaharee mein yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Dard ka yeh gaharaa saagar tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने प्रेम का मर्म समझ मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,साँसों के हर तार पे जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
आँखों में जो नमी है वो यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,टूटे दिल की इस वीणा से जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
कोई न अपना इस जग में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

छाले पड़े हैं पाँवों में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,इस दर्द भरे दिल की सदा तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Chhaale pare hain paanvon mein yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Is dard bhare dil ki sadaa tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
वक़्त की आँधी ने तोड़े अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस आँधी ने जब सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,टूटे हुए सपनों की किरचें तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
आशा का दीप जब बुझने जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब नयनों के सब आँसू सूखे ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
टूटी नाव भँवर में फँसी जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द की भट्टी में तपकर ही सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

सांस-सांस में याद तुम्हारी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Waqt ke is kroor prahaar ne sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
दर्द की रात में जब कोई किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दिल के फफोलों को देखकर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
अकेलेपन की धूप जब साए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई सहारा न बचा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
कोई न अपना इस जग में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब सबने मुँह फेर लिया सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म की इस गहरी रात में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Ahankaar ki deevaaren jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Karmanyataa ka paavan vrat lekar jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
ग़म की तपती दुपहरी में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,अंधेरी रात के सन्नाटे में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
घायल की गति घायल जाने कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब कोई सहारा न बचा अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
जिसके दिल पर बीत रही रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे हुए दिल का दर्द तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य और धर्म की राहों पर उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Saty aur dharm ki raahon par use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
सांस-सांस में याद तुम्हारी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
उम्र भर का सफ़र और दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए दिल का दर्द अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
सपनों के महल जब टूटे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
आँखों में जो नमी है वो पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

जीवन का यह कठिन सफ़र सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,संतोषी सदा सुखी रहता है पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Jeevan ka yeh kathin safar saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
टूटी नाव भँवर में फँसी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए दिल का दर्द तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
About Rasul Mir (रसूल मीर) — The Maestro of Human Emotion
Rasul Mir of Shahabad was the supreme Romantic poet of Kashmir, celebrated as the 'John Keats of Kashmir' for introducing the modern romantic ghazal into Kashmiri.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Rasul Mir pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Romantic Kashmiri Era (1840–1900), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Rasul Mir captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Rasul Mir's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Rasul Mir effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Rasul Mir
Authentic answers about Rasul Mir's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Rasul Mir and what was their literary significance?
Rasul Mir (1840–1900) was a monumental figure in Kashmiri/Romantic literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Rasul Mir's poetry?
The core themes across Rasul Mir's oeuvre encompass सौन्दर्य का मदमाता वर्णन, इश्क़ और जवानी का उल्लास, कश्मीरी ग़ज़ल की मधुरता, झेलम और सेब के बाग़ों की छटा, प्रियतम के नैनों का सम्मोहन, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Rasul Mir's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Rasul Mir?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Rasul Mir's impact on literary culture?
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