मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Ranna (कवि रन्न)
Ranna was one of the celebrated 'Ratnatraya' (Three Gems) of classical Kannada poetry, famed for his epic Gadaayuddha depicting the battle of Bhima and Duryodhana.

मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
— RANNA • RASHTRAKUTA & CHALUKYA GOLDEN AGE

मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
— RANNA • RASHTRAKUTA & CHALUKYA GOLDEN AGE
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‘मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— Ranna
Sher #1 • Classic Couplet
मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,

‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।’— Ranna
Sher #2 • Passionate Verse
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— Ranna
Sher #3 • Soulful Couplet
नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,
Immortal Couplets & Ghazals
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Prem ki doree baandh laee jab se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Amar prem ki amar kahaanee jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Ishq jab rooh mein utarataa hai dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Jisane prem ka marm samajh utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
वाणी वही जो घाव भरे और अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
साधु-संगत की छाया में जो सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Jab se nainaa roop mein ulajhe jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
नाम और दौलत तो माटी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नदिया की धारा बहती जावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
नाम और दौलत तो माटी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,अमर नाम जग में उसी का व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

सांस-सांस में याद तुम्हारी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब धैर्य की सीमा टूट गई ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Jab dhairy ki seemaa toot gayi zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

ग़म की तपती दुपहरी में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दिल के फफोलों को देखकर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Gham ki tapatee dupaharee mein patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Dil ke phapholon ko dekhakar to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

आँखों के आँसू जब सूखे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द का यह गहरा सागर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Aankhon ke aansoo jab sookhe ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Dard ka yeh gaharaa saagar tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
वाणी में जो अमृत घोले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

जीवन का यह कठिन सफ़र धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जो सबको अपना मान के चले जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Jeevan ka yeh kathin safar dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jo sabako apanaa maan ke chale jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
साधु-संगत की छाया में जो अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,माटी का चोला पाकर जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

धरती की छाती पर जिसने है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,हृदय में जिसके दया और करुणा चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
कर्म की खेती जो जन बोवे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सदाचार की पावन वेदी पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

जीवन की इस रणभूमि में जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,संतोषी सदा सुखी रहता है उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मन के मैल को जिसने धोया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,माटी का चोला पाकर जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

माटी का यह देह बना है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,परमानंद का यह अलौकिक रस उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Maatee ka yeh deh banaa hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
नाम और दौलत तो माटी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,नेकी की राह पे जो जन परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी याद का पावन साया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

ज्ञान की पावन भोर भई है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

परमसत्य का पावन दर्शन है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,परम पद की प्राप्ति उसी को होती जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Paramasaty ka paavan darshan hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Param pad ki praapti usee ko hotee jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
प्रेम गली अति साँकरी जामें संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Sadaachaar ki paavan vedee par lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन की वीणा बज उठी जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Jo toofaanon mein apanee naav ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन की वीणा बज उठी जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अंतर में जब प्रेम समाया उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Prem ki gangaa antar mein bahe man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Vaanee mein jisake mithaas ghulee rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के चरणों में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नाम और दौलत तो माटी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,नेकी की राह पे जो जन परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Naam aur daulat to maatee antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Nekee ki raah pe jo jan paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

मन की वीणा बज उठी जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Man ki veenaa baj uthee jab antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Man mandir ki paavan aaratee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम बिना सब सूना जग में जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

प्रेम गली अति साँकरी जामें तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem galee ati saankaree jaamen tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Jisane prem ka marm samajh utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,साँसों के हर तार पे जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह की रात जब ढलने लगी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

प्रेम गली अति साँकरी जामें सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,साँसों के हर तार पे जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem galee ati saankaree jaamen sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Saanson ke har taar pe jisakaa naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे प्रेम की यही निशानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अमर प्रेम की अमर कहानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरी याद का पावन साया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम का दीपक अंतर में जो मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम गली अति साँकरी जामें सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,साँसों के हर तार पे जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

तन्हाई के अँधियारे में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Tanhaaee ke andhiyaare mein so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jab apanon ne hi diye zakhm tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
विरह की अगन में जलता मन हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,टूटे दिल की इस वीणा से ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
अकेलेपन की धूप जब साए दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब आशा की हर किरण बुझी केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

छाले पड़े हैं पाँवों में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Chhaale pare hain paanvon mein par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Jab dhairy ki seemaa toot gayi manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
उम्र भर का सफ़र और पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
सांस-सांस में याद तुम्हारी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब धैर्य की सीमा टूट गई ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
घायल की गति घायल जाने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब सबने मुँह फेर लिया अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

आँखों के आँसू जब सूखे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस आँधी ने जब तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Aankhon ke aansoo jab sookhe hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Gham ki is aandhee ne jab tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
दिल का आईना जब टूटा किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द का यह गहरा सागर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
आशा का दीप जब बुझने यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
उम्र भर का सफ़र और सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,आँसुओं की इस भाषा को सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

मन मंदिर में जो दीप अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जिसने समय की चाल पहचानी उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Man mandir mein jo deep agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jisane samay ki chaal pahachaanee use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
तन्हाई के अँधियारे में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
अकेलेपन की धूप जब साए को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस गहरी रात में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
छाले पड़े हैं पाँवों में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए सपनों की किरचें जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

संतन की संगति में आकर मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जीवन के इस महासमर में का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Santan ki sangati mein aakar mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jeevan ke is mahaasamar mein ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
आशा का दीप जब बुझने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,आँसुओं की इस भाषा को पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आँखों में जो नमी है वो रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
ग़म की तपती दुपहरी में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दिल के फफोलों को देखकर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

हौसलों के तरकश में जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,संतोषी सदा सुखी रहता है जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Hausalon ke tarakash mein jab bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
तन्हाई के अँधियारे में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब कोई सहारा न बचा तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
About Ranna (कवि रन्न) — The Maestro of Human Emotion
Ranna was one of the celebrated 'Ratnatraya' (Three Gems) of classical Kannada poetry, famed for his epic Gadaayuddha depicting the battle of Bhima and Duryodhana.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Ranna pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Rashtrakuta & Chalukya Golden Age, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Ranna captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Ranna's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Ranna effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Ranna
Authentic answers about Ranna's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Ranna and what was their literary significance?
Ranna (949–1020) was a monumental figure in Kannada/Classical literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Ranna's poetry?
The core themes across Ranna's oeuvre encompass वीर रस व युद्ध का सजीव चित्रण, धर्म, न्याय और प्रारब्ध, कर्त्तव्यनिष्ठा व अटूट मित्रता, कन्नड़ भाषा का ओजस्वी गौरव, स्वाभिमान व आत्मबलिदान, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Ranna's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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