हित-वचन नहीं तूने माना,मैत्री का मूल्य न पहचाना,तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।याचना नहीं, अब रण होगा,जीवन-जय या कि मरण होगा!
Ramdhari Singh Dinkar (रामधारी सिंह दिनकर)
Ramdhari Singh Dinkar was an Indian Hindi poet, essayist, and academic. Regarded as a Rashtrakavi (National Poet), his rebellious poetry fueled India's freedom movement.

हित-वचन नहीं तूने माना,मैत्री का मूल्य न पहचाना,तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।याचना नहीं, अब रण होगा,जीवन-जय या कि मरण होगा!
— RAMDHARI SINGH DINKAR • CHHAYAVADOTTAR & RASHTRIYA DHARA

हित-वचन नहीं तूने माना,मैत्री का मूल्य न पहचाना,तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।याचना नहीं, अब रण होगा,जीवन-जय या कि मरण होगा!
— RAMDHARI SINGH DINKAR • CHHAYAVADOTTAR & RASHTRIYA DHARA
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‘हित-वचन नहीं तूने माना,मैत्री का मूल्य न पहचाना,तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।याचना नहीं, अब रण होगा,जीवन-जय या कि मरण होगा!’— Ramdhari Singh Dinkar
Sher #1 • Classic Couplet
हित-वचन नहीं तूने माना,

‘सच है, विपत्ति जब आती है,कायर को ही दहलाती है,सूरमा नहीं विचलित होते,क्षण एक नहीं धीरज खोते।’— Ramdhari Singh Dinkar
Sher #2 • Passionate Verse
सच है, विपत्ति जब आती है,

‘है कौन विघ्न ऐसा जग में,टिक सके वीर नर के मग में?खम ठोक ठेलता है जब नर,पर्वत के जाते पाँव उखड़!’— Ramdhari Singh Dinkar
Sher #3 • Soulful Couplet
है कौन विघ्न ऐसा जग में,
Immortal Couplets & Ghazals
सच है, विपत्ति जब आती है,कायर को ही दहलाती है,सूरमा नहीं विचलित होते,क्षण एक नहीं धीरज खोते।
है कौन विघ्न ऐसा जग में,टिक सके वीर नर के मग में?खम ठोक ठेलता है जब नर,पर्वत के जाते पाँव उखड़!
मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का,धनुष छोड़ छूटता कभी क्या प्रण खर तीर तरों का?जाति-जाति रटते जिनकी पूंजी केवल पाखंड,मैं क्या जानूं जाति, जाति हैं मेरे ये भुजदंड!

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,उसको क्या जो दन्तहीन विषरहित विनीत सरल हो।
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ,सच है, विपत्ति जब आती है।
सच है, विपत्ति जब आती है,टिक सके वीर नर के मग में?।

क्षण एक नहीं धीरज खोते,जाति-जाति रटते जिनकी पूंजी केवल पाखंड।
खम ठोक ठेलता है जब नर,मधुर प्रेम की छाँव में बीती हर सुहानी रात।
धनुष छोड़ छूटता कभी क्या प्रण खर तीर तरों का?,कर्मवीर ही रचते हैं इतिहास का विशेष।
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!,हित-वचन नहीं तूने माना।

मधुर प्रेम की छाँव में बीती हर सुहानी रात,जीवन-जय या कि मरण होगा!।
धैर्य और विश्वास का दीपक सदा जलता रहा,है कौन विघ्न ऐसा जग में।
मिट्टी की देह में बसा जो अमर है प्रकाश,धनुष छोड़ छूटता कभी क्या प्रण खर तीर तरों का?।
विपत्ति के मेघ भी उनके आगे झुक जाते हैं यथा,उसको क्या जो दन्तहीन विषरहित विनीत सरल हो।

वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?,अतुलित यश-क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?।
जीवन-जय या कि मरण होगा!,विपत्ति के मेघ भी उनके आगे झुक जाते हैं यथा।
सूरमा नहीं विचलित होते,याचना नहीं, अब रण होगा।
टिक सके वीर नर के मग में?,क्षण एक नहीं धीरज खोते।

मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का,मूल जानना बड़ा कठिन है नदियों का, वीरों का।
मैं क्या जानूं जाति, जाति हैं मेरे ये भुजदंड!,क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
उसको क्या जो दन्तहीन विषरहित विनीत सरल हो,धैर्य और विश्वास का दीपक सदा जलता रहा।
राह के काँटों ने हँस कर जब भी कुछ कहा,साहस और संकल्प से जो बढ़ते हैं आगे सदा।

कर्मवीर ही रचते हैं इतिहास का विशेष,अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
साहस और संकल्प से जो बढ़ते हैं आगे सदा,सूरमा नहीं विचलित होते।
मैत्री का मूल्य न पहचाना,पर्वत के जाते पाँव उखड़!।
याचना नहीं, अब रण होगा,सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!।

कायर को ही दहलाती है,राह के काँटों ने हँस कर जब भी कुछ कहा।
है कौन विघ्न ऐसा जग में,सत्य के पथ पर कभी न हो मन में कोई निराशा।
पर्वत के जाते पाँव उखड़!,तो ले, मैं भी अब जाता हूँ।
जाति-जाति रटते जिनकी पूंजी केवल पाखंड,कायर को ही दहलाती है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,खम ठोक ठेलता है जब नर।
हृदय के तारों ने छेड़ी अनकही सी बात,मैं क्या जानूं जाति, जाति हैं मेरे ये भुजदंड!।
हित-वचन नहीं तूने माना,मैत्री का मूल्य न पहचाना।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
रामधारी सिंह दिनकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

रामधारी सिंह दिनकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
रामधारी सिंह दिनकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

रामधारी सिंह दिनकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

रामधारी सिंह दिनकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
रामधारी सिंह दिनकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
रामधारी सिंह दिनकर कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
About Ramdhari Singh Dinkar (रामधारी सिंह दिनकर) — The Maestro of Human Emotion
Ramdhari Singh Dinkar was an Indian Hindi poet, essayist, and academic. Regarded as a Rashtrakavi (National Poet), his rebellious poetry fueled India's freedom movement.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Ramdhari Singh Dinkar pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Chhayavadottar & Rashtriya Dhara, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Ramdhari Singh Dinkar captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Ramdhari Singh Dinkar's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Ramdhari Singh Dinkar effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Ramdhari Singh Dinkar
Authentic answers about Ramdhari Singh Dinkar's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who is known as Rashtrakavi Dinkar?
Ramdhari Singh Dinkar was conferred the title of Rashtrakavi for his rousing nationalistic poetry.
What is Rashmirathi based on?
Rashmirathi is an epic poem celebrating the courage, tragic fate, and noble generosity of Karna from the Mahabharata.
What makes Ramdhari Singh Dinkar's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Ramdhari Singh Dinkar?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Ramdhari Singh Dinkar's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Ramdhari Singh Dinkar?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Ramdhari Singh Dinkar's poetry?
Yes! You can download high-resolution 300 DPI cards with full typography, or customize them in our online studio.
Where is Ramdhari Singh Dinkar's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Ramdhari Singh Dinkar stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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