मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Ramanujacharya (रामानुजाचार्य)
Ramanujacharya was an illustrious figure in Philosopher & Pioneer of Vishishtadvaita (1017–1137), renowned for Sri Bhashya (commentary on Brahma Sutras), Gita Bhashya.

मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
— RAMANUJACHARYA • 1017–1137

मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
— RAMANUJACHARYA • 1017–1137
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‘मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— Ramanujacharya
Sher #1 • Classic Couplet
मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,

‘संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— Ramanujacharya
Sher #2 • Passionate Verse
संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— Ramanujacharya
Sher #3 • Soulful Couplet
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,

‘सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,नेकी की राह पे जो जन वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— Ramanujacharya
Sher #4 • Philosophical Verse
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,
Immortal Couplets & Ghazals
संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,नेकी की राह पे जो जन वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

नैन मिले जब नैनन से तब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Nain mile jab nainan se tab do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Priyatam ke rang mein rang kar sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
धरती की छाती पर जिसने भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हृदय में जिसके दया बसी है उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन मंदिर में जो दीप जले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Jisane prem ka marm samajh usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Saanson ki saragam mein ghul gaya sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Prem ke is paavan teerath mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
माटी का यह देह बना है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,दीन-बंधु का सहारा बन के उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

छाले पड़े हैं पाँवों में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Chhaale pare hain paanvon mein antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab aashaa ki har kiran bujhee tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

आँखों में जो नमी है वो जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे हुए दिल का दर्द केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Aankhon mein jo namee hai wo jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Toote hue dil ka dard keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अहंकार का त्याग किया जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

ग़म का मारा पंछी जैसे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Gham ka maaraa panchhee jaise par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Dard ki is ekaant gufaa mein zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
संतन की संगति में आकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,नेकी की राह पे जो जन उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

नेकी की राह पे जो जन जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जो सबको अपना मान के चले जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Nekee ki raah pe jo jan jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jo sabako apanaa maan ke chale jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मन के मैल को जिसने धोया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,शांति और संतोष का धन जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

धरती की छाती पर जिसने जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य की नौका पर सवार होकर सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane jale to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Dhairy ki naukaa par savaar hokar saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जो अपने वचन का पक्का है तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Duhkh mein sumiran sab koee jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Jo apane vachan ka pakkaa hai tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

सत्य-अहिंसा की राहों पर कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Satya-ahinsaa ki raahon par kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Jisane is nashvar shareer ka moh samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

संतन की संगति में आकर उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Santan ki sangati mein aakar usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
तेरी याद का पावन साया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनों के दर्पण में बसा जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

माटी का यह देह बना प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Maatee ka yeh deh banaa prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम सुधा का रस जो चखा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Santan ki sangati mein aakar ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Satkarmon ki amit kamaaee hi jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
फासले मिट गए जब दिल से अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अंतर में जब प्रेम समाया जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैन मिले जब नैनन से तब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Jo toofaanon mein apanee naav baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Nekee ki raah pe jo jan avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह का हर इक आँसू बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Jo toofaanon mein apanee naav amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,मन मंदिर की पावन आरती उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
फासले मिट गए जब दिल से जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम की चाहत में जिसने नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Saty ke paavan path par jisane ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Satsang ki nirmal gangaa mein ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

फासले मिट गए जब दिल से अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Phaasale mit gaye jab dil se amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Aankhon ke raste dil mein utaraa jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
मन मंदिर में बसा जो मूरति बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह की रात जब ढलने लगी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरी आँखों की झील में जो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Phaasale mit gaye jab dil se dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem ki is paavan dhaaraa mein ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जब से नैना रूप में उलझे उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अमर प्रेम की अमर कहानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम रंग में जो रंग गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

तेरे मिलन की आस में बीते पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Tere milan ki aas mein beete palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Amar prem ki amar kahaanee jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन धारा में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे मिलन की आस में बीते पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

ग़म का मारा पंछी जैसे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Gham ka maaraa panchhee jaise kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
ग़म का मारा पंछी जैसे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए सपनों की किरचें सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस गहरी रात में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

जिसके दिल पर बीत रही दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,दर्द का यह गहरा सागर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Jisake dil par beet rahi dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Dard ka yeh gaharaa saagar manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
उम्र भर का सफ़र और अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब आशा की हर किरण बुझी तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे दिल की इस वीणा से केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द की भट्टी में तपकर ही अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Zakhm wo nahi jo jism hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Dard ki bhattee mein tapakar hi akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द का यह गहरा सागर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
अकेलेपन की धूप जब साए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,आँसुओं की इस भाषा को सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस गहरी रात में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
आशा का दीप जब बुझने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे दिल की इस वीणा से तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

अहंकार की दीवारें जब बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,सदाचार के पावन नियमों पर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Ahankaar ki deevaaren jab binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Sadaachaar ke paavan niyamon par jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
ग़म का मारा पंछी जैसे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
तन्हाई के अँधियारे में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
अकेलेपन की धूप जब साए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब सबने मुँह फेर लिया ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
विरह की अगन में जलता मन दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस आँधी ने जब तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,हृदय में जिसके दया और करुणा जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Zindagi aur kuchh nahi bas agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
ग़म का मारा पंछी जैसे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस गहरी रात में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
ग़म का मारा पंछी जैसे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस आँधी ने जब केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
उम्र भर का सफ़र और सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब कोई चारासाज़ न मिला ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
आँखों में जो नमी है वो जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे हुए दिल का दर्द केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

धैर्य और संतोष का धन कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,सत्संगति का पावन प्रभाव उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Dhairy aur santosh ka dhan kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Satsangati ka paavan prabhaav usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
सांस-सांस में याद तुम्हारी चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दिल के फफोलों को देखकर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
About Ramanujacharya (रामानुजाचार्य) — The Maestro of Human Emotion
Ramanujacharya was an illustrious figure in Philosopher & Pioneer of Vishishtadvaita (1017–1137), renowned for Sri Bhashya (commentary on Brahma Sutras), Gita Bhashya.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Ramanujacharya pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1017–1137, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Ramanujacharya captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Ramanujacharya's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Ramanujacharya effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Ramanujacharya?
Ramanujacharya was a renowned Philosopher & Pioneer of Vishishtadvaita (1017–1137) from Sriperumbudur, Tamil Nadu, India, widely celebrated for ACHARYA RAMANUJA, MASTER OF VISHISHTADVAITA (QUALIFIED NON-DUALISM), STATUE OF EQUALITY INSPIRATION.
What is the central philosophy and message of Ramanujacharya?
The central philosophy of Ramanujacharya centers around Vishishtadvaita, universal salvation (disclosed secret Ashtakshari mantra from temple tower to all castes), Saranagati (total surrender to God), leaving timeless guidance for humanity.
What makes Ramanujacharya's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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