प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Dr. Ram Manohar Lohia (डॉ. राममनोहर लोहिया)
Dr. Ram Manohar Lohia was an illustrious figure in Socialist Philosopher & Visionary (1910–1967), renowned for Marx, Gandhi and Socialism.

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
— DR. RAM MANOHAR LOHIA • 1910–1967

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
— DR. RAM MANOHAR LOHIA • 1910–1967
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‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— Dr. Ram Manohar Lohia
Sher #1 • Classic Couplet
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,

‘धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— Dr. Ram Manohar Lohia
Sher #2 • Passionate Verse
धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— Dr. Ram Manohar Lohia
Sher #3 • Soulful Couplet
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— Dr. Ram Manohar Lohia
Sher #4 • Philosophical Verse
सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,
Immortal Couplets & Ghazals
धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Tere deedaar ki ek jhalak ne banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ka deepak antar mein jo naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
माटी का यह देह बना है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Man mandir mein basaa jo moorati tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Sachche aashiq ki pahachaan yahee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

तेरे मिलन की आस में बीते बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Tere milan ki aas mein beete banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य वचन जो मुख से बोले परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

आशा का दीप जब बुझने दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब कोई चारासाज़ न मिला तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Aashaa ka deep jab bujhane dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jab koee chaaraasaaz na mila tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,शांति और संतोष का धन जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

दर्द की रात में जब कोई हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Dard ki raat mein jab koee hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Dard ki is ekaant gufaa mein sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,शांति और संतोष का धन जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी वही जो घाव भरे और तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

सपनों के महल जब टूटे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Sapanon ke mahal jab toote sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Jab koee chaaraasaaz na mila saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,माटी का चोला पाकर जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सत्य का दीप जब जलता है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन मंदिर में जो दीप जले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

जीवन का यह कठिन सफ़र जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,सच्चे मित्र की पहचान यही कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Jeevan ka yeh kathin safar jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Sachche mitr ki pahachaan yahee ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,माटी का चोला पाकर जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

हौसलों के तरकश में जब जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,हृदय में जिसके दया और करुणा और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Hausalon ke tarakash mein jab jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
साधु-संगत की छाया में जो अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
संतन की संगति में आकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

गिरने में कोई हार नहीं कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,सच्चे मित्र की पहचान यही उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Girane mein koee haar nahi kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Sachche mitr ki pahachaan yahee use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

ज्ञान की पावन भोर भई व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरे रूप की पावन झांकी रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे प्रेम की यही निशानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

कंचन और काँच में जिसने में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,परम शांति का यह पावन धाम निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Kanchan aur kaanch mein jisane mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Param shaanti ka yeh paavan dhaam nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैन मिले जब नैनन से तब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम के इस पावन तीरथ में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

जो बाहर ढूँढता रहा वो जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Jo baahar dhoondhataa raha wo jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरी याद का पावन साया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम का दीपक अंतर में जो संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे दीदार की एक झलक ने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Dharatee ki chhaatee par jisane man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Moha-nishaa se jo jan jaagaa jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Satkarmon ki amit jyoti jab to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे रूप की पावन झांकी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

मन मंदिर में जो दीप जले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Man mandir mein jo deep jale jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Moha-nishaa se jo jan jaagaa apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Man ke nirmal darpan mein jab antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Bhavasaagar ki laharon se jo maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरी याद का पावन साया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन घाटी में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैनन आगे तू ही तू नाचे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने प्रेम का मर्म समझ संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैनों के दर्पण में बसा जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

मन मंदिर में बसा जो मूरति का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Man mandir mein basaa jo moorati ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Virah ka har ik aansoo banakar jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
तेरे रूप की पावन झांकी हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के चरणों में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,मन मंदिर की पावन आरती जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

नैनन आगे तू ही तू नाचे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने प्रेम का मर्म समझ संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Nainan aage too hi too naache us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Jisane prem ka marm samajh sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे मिलन की आस में बीते बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Tere deedaar ki ek jhalak ne barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Jab se nainaa roop mein ulajhe jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
फासले मिट गए जब दिल से जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह का हर इक आँसू बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

सांस-सांस में याद तुम्हारी चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए दिल का दर्द सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Toote hue dil ka dard saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी याद का पावन साया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
जिसके दिल पर बीत रही और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
टूटी नाव भँवर में फँसी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Waqt ki aandhee ne tore hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jeevan ke is kathin mod par manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
छाले पड़े हैं पाँवों में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
आशा का दीप जब बुझने रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
आशा का दीप जब बुझने दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब कोई चारासाज़ न मिला तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
टूटी नाव भँवर में फँसी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दिल के फफोलों को देखकर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

घायल की गति घायल जाने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,अंधेरी रात के सन्नाटे में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Andheree raat ke sannaate mein tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
दर्द की रात में जब कोई पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब धैर्य की सीमा टूट गई धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
नैनों से जो नीर बहे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस गहरी रात में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

हौसलों के तरकश में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Hausalon ke tarakash mein jab jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jo doosaron ke sukh ki khaatir paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
सांस-सांस में याद तुम्हारी चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए दिल का दर्द सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
टूटे दिल की ख़ामोशी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
टूटी नाव भँवर में फँसी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,अकेलेपन की इस राह पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

चंद साँसों की मोहलत में चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,हृदय में जिसके दया और करुणा है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Chand saanson ki mohalat mein chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
मन के कोने में सिमटी जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
आँखों के आँसू जब सूखे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,अकेलेपन की इस राह पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आँखों में जो नमी है वो लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
दर्द की रात में जब कोई हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

अहंकार की दीवारें जब जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जिसने अहंकार को त्याग दिया जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Ahankaar ki deevaaren jab jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
घायल की गति घायल जाने जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जीवन के इस कठिन मोड़ पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
About Dr. Ram Manohar Lohia (डॉ. राममनोहर लोहिया) — The Maestro of Human Emotion
Dr. Ram Manohar Lohia was an illustrious figure in Socialist Philosopher & Visionary (1910–1967), renowned for Marx, Gandhi and Socialism.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Dr. Ram Manohar Lohia pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1910–1967, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Dr. Ram Manohar Lohia captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Dr. Ram Manohar Lohia's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Dr. Ram Manohar Lohia effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Dr. Ram Manohar Lohia
Authentic answers about Dr. Ram Manohar Lohia's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Dr. Ram Manohar Lohia?
Dr. Ram Manohar Lohia was a renowned Socialist Philosopher & Visionary (1910–1967) from Akbarpur, Uttar Pradesh, India, widely celebrated for CHAMPION OF DEMOCRATIC SOCIALISM, FOUNDER OF SAPTAKRANTI, VOICE OF THE DISPOSSESSED.
What is the central philosophy and message of Dr. Ram Manohar Lohia?
The central philosophy of Dr. Ram Manohar Lohia centers around Saptakranti (Seven Revolutions), eradication of caste barriers, indigenous language empowerment (Angrezi Hatao), democratic decentralization, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Dr. Ram Manohar Lohia's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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