माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Phanishwar Nath Renu (फणीश्वर नाथ 'रेणु')
Phanishwar Nath Renu was an illustrious figure in Father of Hindi Regional Novel (Aanchalik) (1921–1977), renowned for Maila Anchal, Parti Parikatha.

माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
— PHANISHWAR NATH RENU • 1921–1977

माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
— PHANISHWAR NATH RENU • 1921–1977
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‘माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— Phanishwar Nath Renu
Sher #1 • Classic Couplet
माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— Phanishwar Nath Renu
Sher #2 • Passionate Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— Phanishwar Nath Renu
Sher #3 • Soulful Couplet
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— Phanishwar Nath Renu
Sher #4 • Philosophical Verse
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,
Immortal Couplets & Ghazals
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम का दीपक अंतर में जो और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ka deepak antar mein jo aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Saanson ki saragam mein ghul gaya barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Priyatam ke charanon mein jisane jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
माटी का यह देह बना है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,नेकी की राह पे जो जन जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Ishq ki raah anokhee bande barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem nagar ka vaasee banakar liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
मन मंदिर में जो दीप जले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

आशा का दीप जब बुझने हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Aashaa ka deep jab bujhane hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Dil ke phapholon ko dekhakar tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
साधु-संगत की छाया में जो अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

जिसके दिल पर बीत रही बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दिल के फफोलों को देखकर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Jisake dil par beet rahi baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Dil ke phapholon ko dekhakar tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सदाचार की पावन वेदी पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

तन्हाई के अँधियारे में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Tanhaaee ke andhiyaare mein kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Gham ki is gaharee raat mein keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
अहंकार की दीवारें जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सदाचार की पावन वेदी पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
माटी का यह देह बना है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

अहंकार की दीवारें जब अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,सत्य और धर्म की राहों पर है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Ahankaar ki deevaaren jab agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Saty aur dharm ki raahon par hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
नाम और दौलत तो माटी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,धैर्य का दामन जिसने थामे उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

जीवन का यह कठिन सफ़र ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,सदाचार के पावन नियमों पर पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Jeevan ka yeh kathin safar hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Sadaachaar ke paavan niyamon par paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
मन मंदिर में जो दीप जले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सत्य का दीप जब जलता है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,जीवन का यह पावन सूत्र जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी के इस पुतले में जब का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Maatee ke is putale mein jab ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
माटी का यह देह बना है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,भवसागर की लहरों से जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

अहंकार की दीवारें जब अंतर और ज्ञान-भोर मुस्काए अमृत रस की बूँदें अंतर घट में बरसने लगती हैं,परम चेतना का आलोक जब फैला वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Ahankaar ki deevaaren jab antar aur jnyaana-bhor muskaae amrit ras ki boonden antar ghat mein barasane lagatee hain,Param chetanaa ka aalok jab phailaa woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,माटी का चोला पाकर जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

घट-घट में वह एक अनंता है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Jab man ki sab tarangen shaant hueen usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम गली अति साँकरी जामें संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम का दीपक अंतर में जो और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

माया के इस झूठे जग और ज्ञान-भोर मुस्काए अमृत रस की बूँदें अंतर घट में बरसने लगती हैं,ब्रह्मलीन होकर जो जन स्थित उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Maayaa ke is jhoothe jag aur jnyaana-bhor muskaae amrit ras ki boonden antar ghat mein barasane lagatee hain,Brahmaleen hokar jo jan sthit use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम का दीपक अंतर में जो नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Karm ki khetee jo jan bove saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Amar naam jag mein usee ka usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह की रात जब ढलने लगी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Vaanee mein jo amrit ghole amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Man ke mail ko jisane dhoyaa maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम नगर का वासी बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

माटी का यह देह बना है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Maatee ka yeh deh banaa hai antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
फासले मिट गए जब दिल से अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,माटी का चोला पाकर जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Satkarmon ki amit jyoti jab to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Maatee ka cholaa paakar jisane rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,हृदय के पावन सिंहासन पर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अमर प्रेम की अमर कहानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Tere milan ki aas mein beete tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem ki is paavan ghaatee mein jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनों के दर्पण में बसा जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अमर प्रेम की अमर कहानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Saanson ki saragam mein ghul gaya priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Hriday ke paavan sinhaasan par jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Sachche aashiq ki pahachaan yahee utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन की वीणा बज उठी जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

ग़म का मारा पंछी जैसे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द का यह गहरा सागर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Dard ka yeh gaharaa saagar sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
छाले पड़े हैं पाँवों में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस आँधी ने जब तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

छाले पड़े हैं पाँवों में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,इस दर्द भरे दिल की सदा सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Chhaale pare hain paanvon mein so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Is dard bhare dil ki sadaa saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
दर्द की रात में जब कोई सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
नैनों से जो नीर बहे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस लंबी यात्रा में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
आशा का दीप जब बुझने हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
उम्र भर का सफ़र और जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस लंबी यात्रा में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

अकेलेपन की धूप जब साए दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Akelepan ki dhoop jab saae dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jab apanon ne hi diye zakhm tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
भीतर-भीतर घुटता जाए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
मन के कोने में सिमटी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
घायल की गति घायल जाने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब आशा की हर किरण बुझी धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
वक़्त की आँधी ने तोड़े दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए दिल का दर्द पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

संतन की संगति में आकर कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,अंत समय जब निकट आएगा उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Santan ki sangati mein aakar kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Ant samay jab nikat aaegaa usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
ग़म का मारा पंछी जैसे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द का यह गहरा सागर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे हुए दिल का दर्द सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
तन्हाई के अँधियारे में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
टूटे दिल की ख़ामोशी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

समय का पहिया चलता जाए करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्संगति का पावन प्रभाव है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Satsangati ka paavan prabhaav hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
उम्र भर का सफ़र और और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
आशा का दीप जब बुझने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
जिसके दिल पर बीत रही बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दिल के फफोलों को देखकर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

सच्ची लगन से जो जन कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,त्याग और सेवा की भावना से चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Sachchee lagan se jo jan kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
दर्द की रात में जब कोई रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,अंधेरी रात के सन्नाटे में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
About Phanishwar Nath Renu (फणीश्वर नाथ 'रेणु') — The Maestro of Human Emotion
Phanishwar Nath Renu was an illustrious figure in Father of Hindi Regional Novel (Aanchalik) (1921–1977), renowned for Maila Anchal, Parti Parikatha.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Phanishwar Nath Renu pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1921–1977, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Phanishwar Nath Renu captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Phanishwar Nath Renu's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Phanishwar Nath Renu effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Phanishwar Nath Renu
Authentic answers about Phanishwar Nath Renu's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Phanishwar Nath Renu?
Phanishwar Nath Renu was a renowned Father of Hindi Regional Novel (Aanchalik) (1921–1977) from Aurahi Hingna, Araria, Bihar, India, widely celebrated for AUTHOR OF 'MAILA ANCHAL', ARCHITECT OF AANCHALIK LITERATURE, PADMA SHRI (RETURNED DURING EMERGENCY).
What is the central philosophy and message of Phanishwar Nath Renu?
The central philosophy of Phanishwar Nath Renu centers around Soulful folklore and dialect of rural Mithila/Purnea, beauty and tragedy of village India, political consciousness among the marginalized, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Phanishwar Nath Renu's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Phanishwar Nath Renu?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Phanishwar Nath Renu's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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