जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Pash (पाश (अवतार सिंह संधू))
Avtar Singh Sandhu 'Pash' was one of the greatest revolutionary poets of 20th-century India, whose fierce anti-establishment poems championed human dignity and hope.

जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
— PASH • REVOLUTIONARY MODERN PUNJABI (1950–1988)

जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
— PASH • REVOLUTIONARY MODERN PUNJABI (1950–1988)
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‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— Pash
Sher #1 • Classic Couplet
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।’— Pash
Sher #2 • Passionate Verse
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,

‘नदिया की धारा बहती जावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— Pash
Sher #3 • Soulful Couplet
नदिया की धारा बहती जावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,
Immortal Couplets & Ghazals
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

प्रेम रंग में जो रंग गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह का हर इक आँसू बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Prem rang mein jo rang gaya raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Virah ka har ik aansoo banakar sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
वाणी वही जो घाव भरे और सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,दीन-बंधु का सहारा बन के व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

तेरी आँखों की झील में जो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Teri aankhon ki jheel mein jo banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ke is paavan teerath mein utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सदाचार की पावन वेदी पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
वाणी वही जो घाव भरे और सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,धैर्य का दामन जिसने थामे निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Antar ghat mein jab jyoti jagee tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Hriday ke paavan sinhaasan par sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

दर्द की रात में जब कोई पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द का यह गहरा सागर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Dard ki raat mein jab koee par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Dard ka yeh gaharaa saagar sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
धरती की छाती पर जिसने मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी में जो अमृत घोले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मन के मैल को जिसने धोया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

मन के कोने में सिमटी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब सबने मुँह फेर लिया चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Man ke kone mein simatee dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jab sabane munh pher liyaa chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नाम और दौलत तो माटी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हृदय में जिसके दया बसी है व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
नदिया की धारा बहती जावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,दीन-बंधु का सहारा बन के परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

तन्हाई के अँधियारे में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Tanhaaee ke andhiyaare mein doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Jab apanon ne hi diye zakhm arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
अहंकार की दीवारें जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नाम और दौलत तो माटी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य वचन जो मुख से बोले जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

समय का पहिया चलता जाए धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जो अपने वचन का पक्का है जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jo apane vachan ka pakkaa hai jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नदिया की धारा बहती जावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

गिरने में कोई हार नहीं सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Girane mein koee haar nahi saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
मन के निर्मल दर्पण में जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,नेकी की राह पे जो जन उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

मन मंदिर में जो दीप अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Man mandir mein jo deep antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Karmanyataa ka paavan vrat lekar jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
माटी का यह देह बना है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,धैर्य का दामन जिसने थामे लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,शांति और संतोष का धन जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

शाश्वत शांति का अनुभव वही अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Shaashvat shaanti ka anubhav vahee avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन की वीणा बज उठी जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम के इस पावन तीरथ में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

घट-घट में वह एक अनंता पार उतरना हो तो हरि नाम की पावन नौका का आश्रय लेना पड़ता है,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa paar utaranaa ho to hari naam ki paavan naukaa ka aashray lenaa padta hai,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
फासले मिट गए जब दिल से तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी आँखों की झील में जो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह का हर इक आँसू बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

अहंकार की दीवारें जब अंतर व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Ahankaar ki deevaaren jab antar vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे मिलन की आस में बीते संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अंतर में जब प्रेम समाया एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Hari sumiran mein jisakaa chitt sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Shaanti aur santosh ka dhan jo lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Maatee ka yeh deh banaa hai saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Prem ki dor mein bandh gaya jo us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
तेरे मिलन की आस में बीते बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम की चाहत में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम गली अति साँकरी जामें उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
तेरी आँखों की झील में जो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे मिलन की आस में बीते रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
फासले मिट गए जब दिल से हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह का हर इक आँसू बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar bharam ka pardaa tore amrit ras ki varshaa hove jab moh mukh more,Satya-ahinsaa ki raahon par usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
तेरी आँखों की झील में जो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन धारा में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Hriday ke paavan sinhaasan par jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन धारा में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Prem ki doree baandh laee jab se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Prem ki is paavan dhaaraa mein ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
नैन मिले जब नैनन से तब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जब से नैना रूप में उलझे संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे दीदार की एक झलक ने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Sachche aashiq ki pahachaan yahee jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,साँसों के हर तार पे जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन की वीणा बज उठी जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

आशा का दीप जब बुझने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म के मारों की बस्ती में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Aashaa ka deep jab bujhane kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Gham ke maaron ki bastee mein arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
तेरी आँखों की झील में जो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन के कोने में सिमटी सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
घायल की गति घायल जाने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

नैनों से जो नीर बहे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Nainon se jo neer bahe doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Dil ke phapholon ko dekhakar manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
सपनों के महल जब टूटे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस आँधी ने जब तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
दर्द की रात में जब कोई पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द का यह गहरा सागर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
सपनों के महल जब टूटे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की भट्टी में तपकर ही तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

उम्र भर का सफ़र और सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Umr bhar ka safar aur sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Jab aashaa ki har kiran bujhee tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस आँधी ने जब अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
टूटे दिल की ख़ामोशी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
आँखों में जो नमी है वो सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
दर्द की रात में जब कोई बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

जीवन का यह कठिन सफ़र जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जो गिरतों को उठाना जानता है है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Jeevan ka yeh kathin safar jale to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
आशा का दीप जब बुझने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म के मारों की बस्ती में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
सपनों के महल जब टूटे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द का यह गहरा सागर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
आँखों के आँसू जब सूखे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

हौसलों के तरकश में जब तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,त्याग और सेवा की भावना से उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Hausalon ke tarakash mein jab tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
ग़म की तपती दुपहरी में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,इस दर्द भरे दिल की सदा जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आँखों में जो नमी है वो हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,टूटे हुए सपनों की किरचें पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
मन के कोने में सिमटी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब सबने मुँह फेर लिया चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

धैर्य और संतोष का धन जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जीवन की सच्ची पूँजी वही अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Dhairy aur santosh ka dhan jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jeevan ki sachchee poonjee vahee apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
नैनों से जो नीर बहे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब सबने मुँह फेर लिया तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
About Pash (पाश (अवतार सिंह संधू)) — The Maestro of Human Emotion
Avtar Singh Sandhu 'Pash' was one of the greatest revolutionary poets of 20th-century India, whose fierce anti-establishment poems championed human dignity and hope.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Pash pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Revolutionary Modern Punjabi (1950–1988), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Pash captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Pash's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Pash effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Pash and what was their literary significance?
Pash (1950–1988) was a monumental figure in Punjabi/Revolutionary literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Pash's poetry?
The core themes across Pash's oeuvre encompass सपनों और उम्मीदों की रक्षा, शोषितों और किसानों का संघर्ष, पाखंड और अन्याय के ख़िलाफ़ बगावत, जीवन का सच्चा हौसला, सत्य के लिए शहादत, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Pash's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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