तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Khamsa,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
Nizami Ganjavi (निज़ामी गंजवी)
نظامی گنجوی
Nizami Ganjavi was the undisputed master of romantic narrative poetry in Persian literature, famous for the Khamsa ('Five Treasures') including Layla and Majnun.
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‘तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Khamsa,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।’— Nizami Ganjavi
Sher #1 • Classic Couplet
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Khamsa,

‘तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।’— Nizami Ganjavi
Sher #2 • Passionate Verse
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,

‘नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।’— Nizami Ganjavi
Sher #3 • Soulful Couplet
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,
Immortal Couplets & Ghazals
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Khamsa,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Khamsa,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Khamsa,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Khamsa,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,। Khamsa,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Khamsa,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,। Khamsa,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Khamsa,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Khamsa,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Khamsa,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Khamsa,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Khamsa,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,। Khamsa,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Khamsa,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Khamsa,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Khamsa,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Khamsa,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
About Nizami Ganjavi (निज़ामी गंजवी) — The Maestro of Human Emotion
Nizami Ganjavi was the undisputed master of romantic narrative poetry in Persian literature, famous for the Khamsa ('Five Treasures') including Layla and Majnun.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Nizami Ganjavi pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Classical Persian Romantic Epic, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Nizami Ganjavi captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Nizami Ganjavi's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Nizami Ganjavi effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Nizami Ganjavi
Authentic answers about Nizami Ganjavi's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Nizami Ganjavi and what was their literary significance?
Nizami Ganjavi (1141–1209) was a monumental figure in Persian/Romantic literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Nizami Ganjavi's poetry?
The core themes across Nizami Ganjavi's oeuvre encompass मजनूँ का रेगिस्तानी जुनून व आत्म-समर्पण, शीरीं और फ़रहाद का अमर बलिदान, हफ़्त पैकर और सात रंगों का रहस्य, अदब, अख़लाक़ और शाहों को नसीहत, इश्क़-ए-मजाज़ी से इश्क़-ए-हक़ीक़ी की मंज़िल, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Nizami Ganjavi's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Nizami Ganjavi?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Nizami Ganjavi's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Nizami Ganjavi?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Nizami Ganjavi's poetry?
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Where is Nizami Ganjavi's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Nizami Ganjavi stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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