ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
Nazeer Akbarabadi (नज़ीर अकबराबादी)
نظیر اکبر آبادی
Nazeer Akbarabadi was the 'People's Poet' of India, writing vibrant verses celebrating every festival, season, and the universal fragility of human existence.
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‘ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।’— Nazeer Akbarabadi
Sher #1 • Classic Couplet
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,

‘सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।’— Nazeer Akbarabadi
Sher #2 • Passionate Verse
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,

‘ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।’— Nazeer Akbarabadi
Sher #3 • Soulful Couplet
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,
Immortal Couplets & Ghazals
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
About Nazeer Akbarabadi (नज़ीर अकबराबादी) — The Maestro of Human Emotion
Nazeer Akbarabadi was the 'People's Poet' of India, writing vibrant verses celebrating every festival, season, and the universal fragility of human existence.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Nazeer Akbarabadi pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Awami / People's Poetry Era, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Nazeer Akbarabadi captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Nazeer Akbarabadi's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Nazeer Akbarabadi effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Nazeer Akbarabadi
Authentic answers about Nazeer Akbarabadi's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Nazeer Akbarabadi and what was their literary significance?
Nazeer Akbarabadi (1735–1830) was a monumental figure in Urdu/Nazm literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Nazeer Akbarabadi's poetry?
The core themes across Nazeer Akbarabadi's oeuvre encompass आदमी नामा और इंसानियत के रंग, बंजारानामा और जीवन की नश्वरता, होली, दीवाली व मुश्तरका तहज़ीब, मेले, बाज़ार और ग़रीबों का रहन-सहन, फ़क़ीरी, सूफ़ीपन और ख़ुद्दारी, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Nazeer Akbarabadi's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Nazeer Akbarabadi?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Nazeer Akbarabadi's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Nazeer Akbarabadi?
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Can I download aesthetic cards for Nazeer Akbarabadi's poetry?
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Where is Nazeer Akbarabadi's memorial or tomb located?
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