सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Munir Niazi (मुनीर नियाज़ी)
Munir Niazi was an illustrious figure in Poet of Haunting Loneliness & Mystery (1928–2006), renowned for Tez Hawa Aur Tanha Phool, Jungle Mein Dhanak.

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
— MUNIR NIAZI • 1928–2006

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
— MUNIR NIAZI • 1928–2006
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‘सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— Munir Niazi
Sher #1 • Classic Couplet
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— Munir Niazi
Sher #2 • Passionate Verse
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,

‘साधु-संगत की छाया में जो माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— Munir Niazi
Sher #3 • Soulful Couplet
साधु-संगत की छाया में जो माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,
Immortal Couplets & Ghazals
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
साधु-संगत की छाया में जो माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हृदय में जिसके दया बसी है के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem ki paavan vedee par jisane dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Virah ka har ik aansoo banakar use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
साधु-संगत की छाया में जो सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
धरती की छाती पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Prem ki is paavan ghaatee mein naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Man mandir mein basaa jo moorati priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Virah ka har ik aansoo banakar apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
मन मंदिर में जो दीप जले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,भवसागर की लहरों से जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे हुए सपनों की किरचें धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Zakhm wo nahi jo jism jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Toote hue sapanon ki kirachen dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य-अहिंसा की राहों पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Toote dil ki khaamoshi mein ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Aansuon ki is bhaashaa ko to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
माटी का यह देह बना है अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Tanhaaee ke andhiyaare mein sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Toote hue dil ka dard sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

हौसलों के तरकश में जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जो अपने वचन का पक्का है सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Hausalon ke tarakash mein jab antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jo apane vachan ka pakkaa hai saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
नाम और दौलत तो माटी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

कर्म की पावन वेदी पर हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जीवन का असली आनंद वही अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Karm ki paavan vedee par hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jeevan ka asalee aanand vahee apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
माटी का यह देह बना है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,कर्म की खेती में जो पसीना अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Santan ki sangati mein aakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Karm ki khetee mein jo paseenaa apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रेम की डोर में बंध गया जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,अमर नाम जग में उसी का उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

सत्य का दीप जब जलता मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शाश्वत सत्य की इस पावन वेदी पर वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Saty ka deep jab jalataa man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Shaashvat saty ki is paavan vedee par woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
तेरी याद का पावन साया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

मोह-निशा जब ढलती है में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Moha-nishaa jab dhalatee hai mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन की वीणा बज उठी जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

सत्य का दीप जब जलता बिना किसी आवाज़ के राजा हो या रंक सब उसी मिट्टी में विलीन होते हैं,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Saty ka deep jab jalataa binaa kisee aavaaz ke raajaa ho yaa rank sab usee mitti mein vileen hote hain,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
फासले मिट गए जब दिल से जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे मिलन की आस में बीते दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह की रात जब ढलने लगी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Prem ki gangaa antar mein bahe sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Satkarmon ki amit kamaaee hi usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Dhairy ka daaman jisane thaame jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैन मिले जब नैनन से तब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,मन मंदिर की पावन आरती कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रियतम की याद में जो नैना हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Vaanee mein jisake mithaas ghulee woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
अंतर घट में जब ज्योति जगी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
फासले मिट गए जब दिल से अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Shaanti aur santosh ka dhan jo vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
तेरी आँखों की झील में जो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
साँसों की सरगम में घुल गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Nainon ke darpan mein basaa jab barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन की वीणा बज उठी जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम के इस पावन तीरथ में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Prem binaa sab soonaa jag mein priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Antar mein jab prem samaayaa jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
प्रियतम की याद में जो नैना तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी याद का पावन साया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह की रात जब ढलने लगी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Tere roop ki paavan jhaankee ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Virah ki raat jab dhalane lagee jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी याद का पावन साया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह की रात जब ढलने लगी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

ग़म का मारा पंछी जैसे कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द की भट्टी में तपकर ही तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Gham ka maaraa panchhee jaise koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Dard ki bhattee mein tapakar hi tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
दिल का आईना जब टूटा पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस लंबी यात्रा में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे हुए दिल का दर्द तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

घायल की गति घायल जाने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस आँधी ने जब तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Gham ki is aandhee ne jab tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
विरह की अगन में जलता मन पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द का यह गहरा सागर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
दर्द की रात में जब कोई भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म की इस आँधी ने जब तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे हुए सपनों की किरचें धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
दिल का आईना जब टूटा किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

घायल की गति घायल जाने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए दिल का दर्द ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Toote hue dil ka dard zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
सपनों के महल जब टूटे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,अकेलेपन की इस राह पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
जिसके दिल पर बीत रही जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
कोई न अपना इस जग में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म के मारों की बस्ती में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

नदी की तरह बहते रहना बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जीवन का असली आनंद वही कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jeevan ka asalee aanand vahee ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
ग़म का मारा पंछी जैसे कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द की भट्टी में तपकर ही तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
तन्हाई के अँधियारे में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
सपनों के महल जब टूटे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
टूटी नाव भँवर में फँसी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस आँधी ने जब ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

धैर्य और संतोष का धन बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,विपदाओं से जो कभी न डरा सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Dhairy aur santosh ka dhan binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Vipadaaon se jo kabhee na daraa saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
घायल की गति घायल जाने जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द का यह गहरा सागर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दर्द का यह गहरा सागर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब कोई चारासाज़ न मिला तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,सत्य और धर्म की राहों पर उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Satkarmon ki amit poonjee jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Saty aur dharm ki raahon par use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
About Munir Niazi (मुनीर नियाज़ी) — The Maestro of Human Emotion
Munir Niazi was an illustrious figure in Poet of Haunting Loneliness & Mystery (1928–2006), renowned for Tez Hawa Aur Tanha Phool, Jungle Mein Dhanak.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Munir Niazi pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1928–2006, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Munir Niazi captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Munir Niazi's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Munir Niazi effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Munir Niazi?
Munir Niazi was a renowned Poet of Haunting Loneliness & Mystery (1928–2006) from Khanpur, Punjab, India, widely celebrated for MASTER OF NOCTURNAL MYSTERY, CREATOR OF 'HAMESHA DER KAR DETA HOON MAIN', PRIDE OF PERFORMANCE.
What is the central philosophy and message of Munir Niazi?
The central philosophy of Munir Niazi centers around Nocturnal solitude, mythical fear and mystery, perpetual hesitation/delay in human action, surreal imagery, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Munir Niazi's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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