वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Mohan Rakesh (मोहन राकेश)
Mohan Rakesh was an illustrious figure in Pioneer of Modern Hindi Drama & Nayi Kahani (1925–1972), renowned for Ashadh Ka Ek Din, Adhe Adhure.

वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— MOHAN RAKESH • 1925–1972

वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— MOHAN RAKESH • 1925–1972
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‘वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— Mohan Rakesh
Sher #1 • Classic Couplet
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— Mohan Rakesh
Sher #2 • Passionate Verse
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— Mohan Rakesh
Sher #3 • Soulful Couplet
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Mohan Rakesh
Sher #4 • Philosophical Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,
Immortal Couplets & Ghazals
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Prem ki paavan vedee par jisane doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Jisane prem ka marm samajh apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी का चोला पाकर जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
माटी का यह देह बना है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem ki paavan jyoti jagaaee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
मन मंदिर में जो दीप जले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Roma-rom mein ram gaya preetam sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ki is paavan ghaatee mein yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Waqt ke thaperon ne hamen doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Gham ke maaron ki bastee mein keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
नाम और दौलत तो माटी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सत्य का दीप जब जलता है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

तन्हाई के अँधियारे में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Tanhaaee ke andhiyaare mein cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Dil ke phapholon ko dekhakar manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
मन के निर्मल दर्पण में जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
नाम और दौलत तो माटी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,वाणी में जिसके मिठास घुली मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

आशा का दीप जब बुझने हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Aashaa ka deep jab bujhane hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Jeevan ke is kathin mod par sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,शांति और संतोष का धन जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

नदी की तरह बहते रहना अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,त्याग और सेवा की भावना से जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Nadee ki tarah bahate rahanaa agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
माटी का यह देह बना है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,वाणी में जिसके मिठास घुली रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हृदय में जिसके दया बसी है अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,सच्चे मित्र की पहचान यही वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Sachche mitr ki pahachaan yahee vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,धैर्य का दामन जिसने थामे उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
माटी का यह देह बना है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

जीवन का यह कठिन सफ़र अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जिसने परोपकार का दीप जलाया कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Jeevan ka yeh kathin safar agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,माटी का चोला पाकर जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

माटी का यह देह बना एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Maatee ka yeh deh banaa ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने प्रेम का मर्म समझ और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

शाश्वत शांति का अनुभव वही है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,परम पद की प्राप्ति उसी को होती जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Shaashvat shaanti ka anubhav vahee hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Param pad ki praapti usee ko hotee jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
इश्क़ जब रूह में उतरता है संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन धारा में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रियतम की याद में जो नैना दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे प्रेम की यही निशानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
साँसों की सरगम में घुल गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

पानी केरा बुदबुदा अस पार उतरना हो तो हरि नाम की पावन नौका का आश्रय लेना पड़ता है,परमानंद का यह अलौकिक रस जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Paani keraa budabudaa as paar utaranaa ho to hari naam ki paavan naukaa ka aashray lenaa padta hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के रंग में रंग कर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Hriday mein jisake dayaa basee hai nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane ramaa rahe har dam use sansaar ki koee chintaa kabhee sataa nahi sakatee,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
फासले मिट गए जब दिल से सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे रूप की पावन झांकी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अंतर में जब प्रेम समाया उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Ahankaar ki deevaaren jab saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Saty vachan jo mukh se bole usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

प्रेम गली अति साँकरी जामें बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem galee ati saankaree jaamen banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Priyatam ke charanon mein jisane utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Tere deedaar ki ek jhalak ne doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Man mandir ki paavan aaratee jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम नगर का वासी बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे प्रेम की यही निशानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Nainan aage too hi too naache doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Prem nagar ka vaasee banakar sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
नैनों के दर्पण में बसा जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह का हर इक आँसू बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,विरह का हर इक आँसू बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

वक़्त की आँधी ने तोड़े दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,दर्द का यह गहरा सागर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Waqt ki aandhee ne tore dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Dard ka yeh gaharaa saagar tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
भीतर-भीतर घुटता जाए को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आँखों के आँसू जब सूखे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब सबने मुँह फेर लिया पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दिल के फफोलों को देखकर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Zakhm wo nahi jo jism jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Dil ke phapholon ko dekhakar akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
जिसके दिल पर बीत रही को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
कोई न अपना इस जग में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,आँसुओं की इस भाषा को तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
जिसके दिल पर बीत रही चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

आँखों के आँसू जब सूखे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,इस दर्द भरे दिल की सदा तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Aankhon ke aansoo jab sookhe patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Is dard bhare dil ki sadaa tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
आँखों में जो नमी है वो सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
घायल की गति घायल जाने सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द का यह गहरा सागर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
जिसके दिल पर बीत रही को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
घायल की गति घायल जाने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

धरती की छाती पर जिसने करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Dharatee ki chhaatee par jisane karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Jo doosaron ke sukh ki khaatir jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
वक़्त की आँधी ने तोड़े दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,दर्द का यह गहरा सागर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
ग़म की तपती दुपहरी में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
कोई न अपना इस जग में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस आँधी ने जब सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
नैनों से जो नीर बहे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जो गिरतों को उठाना जानता है चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Vaanee mein jo amrit ghole antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
दिल का आईना जब टूटा अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
कोई न अपना इस जग में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस आँधी ने जब पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आँखों में जो नमी है वो अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,इस दर्द भरे दिल की सदा अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
तन्हाई के अँधियारे में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

जीवन का यह कठिन सफ़र हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जीवन का असली आनंद वही कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Jeevan ka yeh kathin safar hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jeevan ka asalee aanand vahee ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
तन्हाई के अँधियारे में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
About Mohan Rakesh (मोहन राकेश) — The Maestro of Human Emotion
Mohan Rakesh was an illustrious figure in Pioneer of Modern Hindi Drama & Nayi Kahani (1925–1972), renowned for Ashadh Ka Ek Din, Adhe Adhure.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Mohan Rakesh pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1925–1972, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Mohan Rakesh captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Mohan Rakesh's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Mohan Rakesh effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Mohan Rakesh?
Mohan Rakesh was a renowned Pioneer of Modern Hindi Drama & Nayi Kahani (1925–1972) from Amritsar, Punjab, India, widely celebrated for PIONEER OF NAYI KAHANI MOVEMENT, PLAYWRIGHT OF 'ASHADH KA EK DIN' & 'ADHE ADHURE', SANGEET NATAK AKADEMI AWARDEE.
What is the central philosophy and message of Mohan Rakesh?
The central philosophy of Mohan Rakesh centers around Modern human alienation, incompleteness of human relationships (Adhe Adhure), tension between artistic purity and worldly fame, leaving timeless guidance for humanity.
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