वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मोह-निशा से जो जन जागा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Maulana Abul Kalam Azad (मौलाना अबुल कलाम आज़ाद)
Maulana Abul Kalam Azad was an illustrious figure in Scholar, Statesman & First Education Minister (1888–1958), renowned for India Wins Freedom, Tarjuman al-Quran.

वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मोह-निशा से जो जन जागा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
— MAULANA ABUL KALAM AZAD • 1888–1958

वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मोह-निशा से जो जन जागा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
— MAULANA ABUL KALAM AZAD • 1888–1958
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‘वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मोह-निशा से जो जन जागा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।’— Maulana Abul Kalam Azad
Sher #1 • Classic Couplet
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,

‘माटी का यह देह बना है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Maulana Abul Kalam Azad
Sher #2 • Passionate Verse
माटी का यह देह बना है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘माटी का यह देह बना है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सदाचार की पावन वेदी पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।’— Maulana Abul Kalam Azad
Sher #3 • Soulful Couplet
माटी का यह देह बना है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,

‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— Maulana Abul Kalam Azad
Sher #4 • Philosophical Verse
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,
Immortal Couplets & Ghazals
माटी का यह देह बना है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
माटी का यह देह बना है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सदाचार की पावन वेदी पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem galee ati saankaree jaamen antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem nagar ka vaasee banakar sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Nainon ke darpan mein basaa jab amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
आशा तृष्णा सब छूटी जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,माटी का चोला पाकर जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हृदय में जिसके दया बसी है अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हृदय में जिसके दया बसी है व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Prem ki paavan jyoti jagaaee man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
कर्म की खेती जो जन बोवे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हृदय में जिसके दया बसी है अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,माटी का चोला पाकर जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

दिल का आईना जब टूटा हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Dil ka aaina jab tootaa hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Dard ki is ekaant gufaa mein chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सदाचार की पावन वेदी पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
संतन की संगति में आकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

कोई न अपना इस जग में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दिल के फफोलों को देखकर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Koee na apanaa is jag mein aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Dil ke phapholon ko dekhakar saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

घायल की गति घायल जाने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी में जो अमृत घोले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

समय का पहिया चलता जाए जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,अंत समय जब निकट आएगा कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Ant samay jab nikat aaegaa ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
अहंकार की दीवारें जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जिसने अहंकार को त्याग दिया वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य वचन जो मुख से बोले जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

हौसलों के तरकश में जब जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जिसने समय की चाल पहचानी कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Hausalon ke tarakash mein jab jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jisane samay ki chaal pahachaanee ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
अहंकार की दीवारें जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

अमृत की बूँद अंतर में जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,परमानंद का यह अलौकिक रस तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Amrit ki boond antar mein jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
वाणी वही जो घाव भरे और अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,नेकी की राह पे जो जन रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,मन मंदिर की पावन आरती उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की पावन ज्योति जगाई प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,ब्रह्मलीन होकर जो जन स्थित जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Antarman ke sannaate mein jab hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Brahmaleen hokar jo jan sthit jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,मन मंदिर की पावन आरती उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

ज्ञान की पावन भोर भई उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,वैराग्य की इस पावन धारा में तब साधना पूर्ण हुई और भक्त भगवान के स्वरूप में ही विलीन हो गया।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Vairaagy ki is paavan dhaaraa mein tab saadhanaa poorn hui aur bhakt bhagavaan ke svaroop mein hi vileen ho gaya.
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम सुधा का रस जो चखा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे मिलन की आस में बीते प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

माटी का यह देह बना है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Maatee ka yeh deh banaa hai jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Moha-nishaa se jo jan jaagaa use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरी आँखों की झील में जो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Saty ke paavan path par jisane antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम के इस पावन तीरथ में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Parahit mein jisane jeevan saunpaa nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

वाणी वही जो घाव भरे और अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,नेकी की राह पे जो जन रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Nekee ki raah pe jo jan rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Aankhon ke raste dil mein utaraa jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन धारा में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह की रात जब ढलने लगी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन धारा में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
फासले मिट गए जब दिल से अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Nainon ke darpan mein basaa jab sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Priyatam ka anuraag hi jisakaa ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अमर प्रेम की अमर कहानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
मन मंदिर में बसा जो मूरति अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जब से नैना रूप में उलझे सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नैनों से जो नीर बहे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब कोई चारासाज़ न मिला मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Nainon se jo neer bahe yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Jab koee chaaraasaaz na mila manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
तेरे मिलन की आस में बीते उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम सुधा का रस जो चखा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
घायल की गति घायल जाने जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
घायल की गति घायल जाने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

भीतर-भीतर घुटता जाए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jab apanon ne hi diye zakhm jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
वक़्त की आँधी ने तोड़े चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दर्द की भट्टी में तपकर ही सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
ग़म की तपती दुपहरी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अकेलेपन की इस राह पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
दिल का आईना जब टूटा हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
वक़्त की आँधी ने तोड़े किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Zakhm wo nahi jo jism sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Jab aashaa ki har kiran bujhee paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
ग़म की तपती दुपहरी में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
नैनों से जो नीर बहे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द का यह गहरा सागर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
दर्द की रात में जब कोई जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
टूटे दिल की ख़ामोशी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

मन मंदिर में जो दीप अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जिसने अहंकार को त्याग दिया मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Man mandir mein jo deep antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
नैनों से जो नीर बहे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब कोई चारासाज़ न मिला मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
जिसके दिल पर बीत रही बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म के मारों की बस्ती में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
टूटी नाव भँवर में फँसी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अकेलेपन की इस राह पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दिल का आईना जब टूटा हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,त्याग और सेवा की भावना से जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Zindagi aur kuchh nahi bas saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
उम्र भर का सफ़र और हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
आशा का दीप जब बुझने दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म के मारों की बस्ती में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आशा का दीप जब बुझने सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द का यह गहरा सागर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
कोई न अपना इस जग में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दिल के फफोलों को देखकर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

माटी का यह चोला पाकर चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जो अपने वचन का पक्का है चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Maatee ka yeh cholaa paakar chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jo apane vachan ka pakkaa hai chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
About Maulana Abul Kalam Azad (मौलाना अबुल कलाम आज़ाद) — The Maestro of Human Emotion
Maulana Abul Kalam Azad was an illustrious figure in Scholar, Statesman & First Education Minister (1888–1958), renowned for India Wins Freedom, Tarjuman al-Quran.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Maulana Abul Kalam Azad pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1888–1958, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Maulana Abul Kalam Azad captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Maulana Abul Kalam Azad's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Maulana Abul Kalam Azad effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Maulana Abul Kalam Azad
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Who was Maulana Abul Kalam Azad?
Maulana Abul Kalam Azad was a renowned Scholar, Statesman & First Education Minister (1888–1958) from Mecca (settled in Kolkata), India, widely celebrated for FIRST EDUCATION MINISTER OF INDEPENDENT INDIA, ARCHITECT OF IITS/UGC, BHARAT RATNA.
What is the central philosophy and message of Maulana Abul Kalam Azad?
The central philosophy of Maulana Abul Kalam Azad centers around Composite Indian nationalism, modern scientific higher education, rejection of religious partition, universal humanism, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Maulana Abul Kalam Azad's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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