क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Madhvacharya (मध्वाचार्य)
Madhvacharya was an illustrious figure in Philosopher & Pioneer of Dvaita Vedanta (1238–1317), renowned for Sarvamula Grantha (37 works including Anu Vyakhyana, Gita Bhashya.

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
— MADHVACHARYA • 1238–1317

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
— MADHVACHARYA • 1238–1317
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‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मोह-निशा से जो जन जागा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— Madhvacharya
Sher #1 • Classic Couplet
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— Madhvacharya
Sher #2 • Passionate Verse
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— Madhvacharya
Sher #3 • Soulful Couplet
दीन-दुखी का आसरा बनकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,
Immortal Couplets & Ghazals
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Tere milan ki aas mein beete se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Priyatam ka anuraag hi jisakaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Prem ki paavan vedee par jisane amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Antar mein jab prem samaayaa apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,शांति और संतोष का धन जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
साधु-संगत की छाया में जो रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Nainon ke darpan mein basaa jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
नदिया की धारा बहती जावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन मंदिर में जो दीप जले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

आँखों में जो नमी है वो भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Aankhon mein jo namee hai wo bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Dil ke phapholon ko dekhakar tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

सांस-सांस में याद तुम्हारी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Is dard bhare dil ki sadaa keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सदाचार की पावन वेदी पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हरि की कृपा का पावन साया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

दर्द की रात में जब कोई जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब नयनों के सब आँसू सूखे तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Dard ki raat mein jab koee jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मन के मैल को जिसने धोया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,त्याग और सेवा की भावना से अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Duhkh mein sumiran sab koee jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
माटी का यह देह बना है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

सच्ची लगन से जो जन जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,जिसने परोपकार का दीप जलाया पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Sachchee lagan se jo jan jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

मन मंदिर में जो दीप ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,जिसने समय की चाल पहचानी उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Man mandir mein jo deep hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Jisane samay ki chaal pahachaanee use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
नदिया की धारा बहती जावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
अहंकार की दीवारें जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

अमृत की बूँद अंतर में है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Amrit ki boond antar mein hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Mrityu koee ant nahi bas barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम की चाहत में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
अंतर घट में जब ज्योति जगी हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
साँसों की सरगम में घुल गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जब से नैना रूप में उलझे एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

माया के इस झूठे जग जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Maayaa ke is jhoothe jag jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे रूप की पावन झांकी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम की चाहत में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Santan ki sangati mein aakar amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम गली अति साँकरी जामें रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम के इस पावन तीरथ में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Vaanee mein jo amrit ghole to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Satsang ki nirmal gangaa mein rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
नैनन आगे तू ही तू नाचे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरी याद का पावन साया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

वाणी वही जो घाव भरे और मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Satsang ki nirmal gangaa mein ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अंतर में जब प्रेम समाया मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Ahankaar ki deevaaren jab jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरी आँखों की झील में जो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अंतर में जब प्रेम समाया जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Teri aankhon ki jheel mein jo barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem ki is paavan dhaaraa mein sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
साँसों की सरगम में घुल गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम का दीपक अंतर में जो एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
फासले मिट गए जब दिल से अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Tere milan ki aas mein beete jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के रंग में रंग कर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Saanson ki saragam mein ghul gaya se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
साँसों की सरगम में घुल गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

भीतर-भीतर घुटता जाए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Jab apanon ne hi diye zakhm pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
अकेलेपन की धूप जब साए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,अकेलेपन की इस राह पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

भीतर-भीतर घुटता जाए जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द की भट्टी में तपकर ही तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Dard ki bhattee mein tapakar hi tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
सांस-सांस में याद तुम्हारी हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
आँखों के आँसू जब सूखे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,अकेलेपन की इस राह पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
आँखों में जो नमी है वो भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
टूटी नाव भँवर में फँसी जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द की भट्टी में तपकर ही धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Waqt ke thaperon ne hamen dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Zindagi ki is soonee dagar par zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म के मारों की बस्ती में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
घायल की गति घायल जाने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे हुए सपनों की किरचें तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
तन्हाई के अँधियारे में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जो सबको अपना मान के चले है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jo sabako apanaa maan ke chale hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
दिल का आईना जब टूटा चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
घायल की गति घायल जाने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
विरह की अगन में जलता मन पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,इस दर्द भरे दिल की सदा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

जीवन की इस रणभूमि में चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,माटी के इस पुतले में जब जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Jeevan ki is ranabhoomi mein chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Maatee ke is putale mein jab jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
आशा का दीप जब बुझने पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
सपनों के महल जब टूटे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,इस दर्द भरे दिल की सदा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
उम्र भर का सफ़र और जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
सांस-सांस में याद तुम्हारी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

वाणी में जो अमृत घोले हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,धैर्य की नौका पर सवार होकर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Vaanee mein jo amrit ghole hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
ग़म की तपती दुपहरी में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
About Madhvacharya (मध्वाचार्य) — The Maestro of Human Emotion
Madhvacharya was an illustrious figure in Philosopher & Pioneer of Dvaita Vedanta (1238–1317), renowned for Sarvamula Grantha (37 works including Anu Vyakhyana, Gita Bhashya.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Madhvacharya pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1238–1317, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Madhvacharya captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Madhvacharya's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Madhvacharya effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Madhvacharya
Authentic answers about Madhvacharya's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Madhvacharya?
Madhvacharya was a renowned Philosopher & Pioneer of Dvaita Vedanta (1238–1317) from Pajaka (Udupi), Karnataka, India, widely celebrated for ANANDA TIRTHA, PURNA PRAJNA, FOUNDER OF DVAITA (DUALIST) VEDANTA, FOUNDER OF UDUPI ASHTA MATHAS.
What is the central philosophy and message of Madhvacharya?
The central philosophy of Madhvacharya centers around Dvaita Vedanta (fundamental distinction between Jiva, Jagat, and Ishvara), supremacy of Lord Vishnu, Bhakti through rigorous logic, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Madhvacharya's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Madhvacharya?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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