कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Lala Lajpat Rai (लाला लाजपत राय)
Lala Lajpat Rai was an illustrious figure in Punjab Kesari & Freedom Titan (1865–1928), renowned for Unhappy India, Young India: An Interpretation and a History of the Nationalist Movement.

कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
— LALA LAJPAT RAI • 1865–1928

कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
— LALA LAJPAT RAI • 1865–1928
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‘कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।’— Lala Lajpat Rai
Sher #1 • Classic Couplet
कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— Lala Lajpat Rai
Sher #2 • Passionate Verse
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।’— Lala Lajpat Rai
Sher #3 • Soulful Couplet
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,
Immortal Couplets & Ghazals
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem rang mein jo rang gaya sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ka deepak antar mein jo utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
आशा तृष्णा सब छूटी जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,नेकी की राह पे जो जन जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
वाणी में जो अमृत घोले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Tere deedaar ki ek jhalak ne banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki paavan jyoti jagaaee motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
मन के निर्मल दर्पण में जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
संतन की संगति में आकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
अहंकार की दीवारें जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Antar ghat mein jab jyoti jagee raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Priyatam ke rang mein rang kar use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,हरि की कृपा का पावन साया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

विरह की अगन में जलता मन को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Virah ki agan mein jalataa man ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Dil ke phapholon ko dekhakar chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
सत्य का दीप जब जलता है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हृदय में जिसके दया बसी है उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

दर्द की रात में जब कोई जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब कोई सहारा न बचा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Dard ki raat mein jab koee jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Jab koee sahaaraa na bachaa arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

दर्द की रात में जब कोई यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Dard ki raat mein jab koee yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Jab apanon ne hi diye zakhm tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
मन मंदिर में जो दीप जले अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मन के मैल को जिसने धोया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

मन मंदिर में जो दीप चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,सदाचार के पावन नियमों पर है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Man mandir mein jo deep chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Sadaachaar ke paavan niyamon par hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
नाम और दौलत तो माटी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
अहंकार की दीवारें जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,वाणी में जिसके मिठास घुली मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

नेकी की राह पे जो जन तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,सत्य और धर्म की राहों पर चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Nekee ki raah pe jo jan tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Saty aur dharm ki raahon par chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
संतन की संगति में आकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,भवसागर की लहरों से जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

कर्म की पावन वेदी पर धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जीवन के इस महासमर में उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Karm ki paavan vedee par dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jeevan ke is mahaasamar mein use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,मन के मैल को जिसने धोया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

जो भीतर झाँक के देखता है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम रंग में जो रंग गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

पानी केरा बुदबुदा अस है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,जब आत्मा ने जाना अपना सत्य स्वरूप तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Paani keraa budabudaa as hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Jab aatmaa ne jaanaa apanaa saty svaroop to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम सुधा का रस जो चखा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रियतम की याद में जो नैना बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

कंचन और काँच में जिसने पार उतरना हो तो हरि नाम की पावन नौका का आश्रय लेना पड़ता है,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Kanchan aur kaanch mein jisane paar utaranaa ho to hari naam ki paavan naukaa ka aashray lenaa padta hai,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
मन मंदिर में बसा जो मूरति अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Hari sumiran mein jisakaa chitt jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Saty vachan jo mukh se bole usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
नैन मिले जब नैनन से तब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में बसा जो मूरति सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Santan ki sangati mein aakar bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Saadhu purush ki vaanee kabhee vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,मन मंदिर की पावन आरती मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी याद का पावन साया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे मिलन की आस में बीते बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,साँसों के हर तार पे जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Shaanti aur santosh ka dhan jo nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे प्रेम की यही निशानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

बिरहा की आग में तप के कुंदन से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Prem nagar ka vaasee banakar jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Tere roop ki paavan jhaankee dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ki is paavan dhaaraa mein aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
बिरहा की आग में तप के कुंदन हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
अंतर घट में जब ज्योति जगी रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Tere roop ki paavan jhaankee priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Prem ka deepak antar mein jo use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
फासले मिट गए जब दिल से दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

घायल की गति घायल जाने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब सबने मुँह फेर लिया तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Jab sabane munh pher liyaa tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
भीतर-भीतर घुटता जाए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
अकेलेपन की धूप जब साए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

विरह की अगन में जलता मन हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दिल के फफोलों को देखकर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Virah ki agan mein jalataa man hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Dil ke phapholon ko dekhakar keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
कोई न अपना इस जग में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दिल के फफोलों को देखकर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
उम्र भर का सफ़र और जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,अंधेरी रात के सन्नाटे में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
विरह की अगन में जलता मन को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
टूटे दिल की ख़ामोशी में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब सबने मुँह फेर लिया सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

सांस-सांस में याद तुम्हारी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म के मारों की बस्ती में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Gham ke maaron ki bastee mein chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
ग़म का मारा पंछी जैसे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दर्द की भट्टी में तपकर ही ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
ग़म की तपती दुपहरी में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
ग़म की तपती दुपहरी में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,अकेलेपन की इस राह पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

जिसने मन को जीत लिया सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,त्याग और सेवा की भावना से उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Jisane man ko jeet liyaa saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
घायल की गति घायल जाने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब सबने मुँह फेर लिया तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
दर्द की रात में जब कोई भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,इस दर्द भरे दिल की सदा सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
दिल का आईना जब टूटा हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म की इस लंबी यात्रा में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,इस दर्द भरे दिल की सदा सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

जीवन का यह कठिन सफ़र सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,कर्म की खेती में जो पसीना और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Jeevan ka yeh kathin safar saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Karm ki khetee mein jo paseenaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
सांस-सांस में याद तुम्हारी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द की भट्टी में तपकर ही सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
नैनों से जो नीर बहे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे हुए सपनों की किरचें धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
दर्द की रात में जब कोई जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब कोई सहारा न बचा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

दीन-दुखी का आसरा बनकर धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जो अपने वचन का पक्का है मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jo apane vachan ka pakkaa hai manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
छाले पड़े हैं पाँवों में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म के मारों की बस्ती में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
About Lala Lajpat Rai (लाला लाजपत राय) — The Maestro of Human Emotion
Lala Lajpat Rai was an illustrious figure in Punjab Kesari & Freedom Titan (1865–1928), renowned for Unhappy India, Young India: An Interpretation and a History of the Nationalist Movement.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Lala Lajpat Rai pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1865–1928, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Lala Lajpat Rai captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Lala Lajpat Rai's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Lala Lajpat Rai effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Lala Lajpat Rai
Authentic answers about Lala Lajpat Rai's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Lala Lajpat Rai?
Lala Lajpat Rai was a renowned Punjab Kesari & Freedom Titan (1865–1928) from Dhudike, Punjab, India, widely celebrated for PUNJAB KESARI (LION OF PUNJAB), LAL OF LAL-BAL-PAL TRIUMVIRATE, FOUNDER OF PNB.
What is the central philosophy and message of Lala Lajpat Rai?
The central philosophy of Lala Lajpat Rai centers around Economic nationalism, resistance to imperial exploitation (Simon Commission boycott), social reform through education, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Lala Lajpat Rai's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Lala Lajpat Rai?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Lala Lajpat Rai's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
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