मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Lal Ded (लल्लेश्वरी (लाल देद))
Lalleshwari (Lal Ded) was the foundational 14th-century Kashmiri Shaivite mystic saintess whose four-line verses (Vakhs) are the very cradle of Kashmiri literature.

मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— LAL DED • KASHMIR MYSTIC GOLDEN AGE (1320–1392)

मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— LAL DED • KASHMIR MYSTIC GOLDEN AGE (1320–1392)
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‘मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— Lal Ded
Sher #1 • Classic Couplet
मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।’— Lal Ded
Sher #2 • Passionate Verse
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,

‘साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— Lal Ded
Sher #3 • Soulful Couplet
साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,
Immortal Couplets & Ghazals
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem nagar ka vaasee banakar use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी का चोला पाकर जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हरि की कृपा का पावन साया अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Prem binaa sab soonaa jag mein banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki is paavan ghaatee mein jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,भवसागर की लहरों से जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Teri yaad ka paavan saaya priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
धरती की छाती पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

ग़म की तपती दुपहरी में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब आशा की हर किरण बुझी तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Gham ki tapatee dupaharee mein so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jab aashaa ki har kiran bujhee tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
संतन की संगति में आकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,धैर्य का दामन जिसने थामे वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

उम्र भर का सफ़र और हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म की इस आँधी ने जब ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Umr bhar ka safar aur hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Gham ki is aandhee ne jab zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
वाणी वही जो घाव भरे और भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नाम और दौलत तो माटी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

ग़म की तपती दुपहरी में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,आँसुओं की इस भाषा को तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Gham ki tapatee dupaharee mein yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Aansuon ki is bhaashaa ko tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
नाम और दौलत तो माटी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हृदय में जिसके दया बसी है उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्य का दीप जब जलता है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मन के मैल को जिसने धोया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

नदी की तरह बहते रहना जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जिसने समय की चाल पहचानी चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jisane samay ki chaal pahachaanee chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
नदिया की धारा बहती जावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

नेकी की राह पे जो जन जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,धैर्य की नौका पर सवार होकर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Nekee ki raah pe jo jan jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
मन मंदिर में जो दीप जले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,साधु पुरुष की वाणी कभी उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

धरती की छाती पर जिसने मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जिसने समय की चाल पहचानी विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jisane samay ki chaal pahachaanee vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,नेकी की राह पे जो जन जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

माटी का यह देह बना से निर्मल हो बाहर के पाखंड से मुक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन रहे,परम शांति का यह पावन धाम उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Maatee ka yeh deh banaa se nirmal ho baahar ke paakhand se mukt hokar prabhu bhakti mein leen rahe,Param shaanti ka yeh paavan dhaam usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

घट-घट में वह एक अनंता है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jisane is nashvar shareer ka moh hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे रूप की पावन झांकी हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,मन मंदिर की पावन आरती सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Ahankaar ki deevaaren jab antar hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jab man ki sab tarangen shaant hueen jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
मन की वीणा बज उठी जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम रंग में जो रंग गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन घाटी में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन धारा में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
नैनों के दर्पण में बसा जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Prem ki gangaa antar mein bahe amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Satya-ahinsaa ki raahon par lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम का दीपक अंतर में जो जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ जब रूह में उतरता है सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

मन मंदिर में जो दीप जले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Man mandir mein jo deep jale antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Satkarmon ki amit kamaaee hi use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मन के मैल को जिसने धोया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Hari sumiran mein jisakaa chitt prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Man ke mail ko jisane dhoyaa lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अंतर में जब प्रेम समाया सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
साँसों की सरगम में घुल गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम के इस पावन तीरथ में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Nainan aage too hi too naache se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Sachche aashiq ki pahachaan yahee liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,विरह का हर इक आँसू बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम रंग में जो रंग गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरी आँखों की झील में जो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Man mandir mein basaa jo moorati jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ki paavan jyoti jagaaee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
तेरे रूप की पावन झांकी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह का हर इक आँसू बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैन मिले जब नैनन से तब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,साँसों के हर तार पे जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,मन मंदिर की पावन आरती संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Nain mile jab nainan se tab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Man mandir ki paavan aaratee sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,मन मंदिर की पावन आरती संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

टूटे दिल की ख़ामोशी में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Toote dil ki khaamoshi mein hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Jeevan ke is kathin mod par sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
बिरहा की आग में तप के कुंदन उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अमर प्रेम की अमर कहानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरे दीदार की एक झलक ने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के चरणों में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
जिसके दिल पर बीत रही लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
ग़म का मारा पंछी जैसे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,अकेलेपन की इस राह पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

आँखों में जो नमी है वो जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे हुए दिल का दर्द ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Aankhon mein jo namee hai wo jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Toote hue dil ka dard zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब सबने मुँह फेर लिया तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
आशा का दीप जब बुझने हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
ग़म की तपती दुपहरी में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब आशा की हर किरण बुझी तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
भीतर-भीतर घुटता जाए पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

आँखों में जो नमी है वो चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Aankhon mein jo namee hai wo cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Zindagi ki is soonee dagar par manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
ग़म का मारा पंछी जैसे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
सांस-सांस में याद तुम्हारी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब नयनों के सब आँसू सूखे अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दिल का आईना जब टूटा रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे दिल की इस वीणा से तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
वक़्त की आँधी ने तोड़े सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की भट्टी में तपकर ही सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,सत्य और धर्म की राहों पर अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Saty aur dharm ki raahon par apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,इस दर्द भरे दिल की सदा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
भीतर-भीतर घुटता जाए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
दिल का आईना जब टूटा पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस लंबी यात्रा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

संतन की संगति में आकर जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जो गिरतों को उठाना जानता है उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Santan ki sangati mein aakar jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
तन्हाई के अँधियारे में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
कोई न अपना इस जग में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
ग़म की तपती दुपहरी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए दिल का दर्द ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
उम्र भर का सफ़र और हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म की इस आँधी ने जब ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

धरती की छाती पर जिसने करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हृदय में जिसके दया और करुणा सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
छाले पड़े हैं पाँवों में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
About Lal Ded (लल्लेश्वरी (लाल देद)) — The Maestro of Human Emotion
Lalleshwari (Lal Ded) was the foundational 14th-century Kashmiri Shaivite mystic saintess whose four-line verses (Vakhs) are the very cradle of Kashmiri literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Lal Ded pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Kashmir Mystic Golden Age (1320–1392), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Lal Ded captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Lal Ded's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Lal Ded effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Lal Ded
Authentic answers about Lal Ded's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Lal Ded and what was their literary significance?
Lal Ded (1320–1392) was a monumental figure in Kashmiri/Mystic literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Lal Ded's poetry?
The core themes across Lal Ded's oeuvre encompass कश्मीरी शैव-दर्शन व अद्वैत, आंतरिक साधना और बाह्य आडंबर का त्याग, शिव से अनन्य एकात्म, भवसागर से पार पाने की लगन, प्रेम, अहिंसा और समभाव, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Lal Ded's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Lal Ded?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Lal Ded's impact on literary culture?
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