संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
Roxorax Lakshminath Bezbarua (लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज))
Roxorax Lakshminath Bezbarua was a distinguished Roxorax (King of Humor) representing the Assamese/Renaissance tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
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‘संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।’— Roxorax Lakshminath Bezbarua
Sher #1 • Classic Couplet
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।’— Roxorax Lakshminath Bezbarua
Sher #2 • Passionate Verse
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,

‘लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।’— Roxorax Lakshminath Bezbarua
Sher #3 • Soulful Couplet
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,
Immortal Couplets & Ghazals
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ। रसराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
Lakshmeenaaraayan bezabaruaa. rasaraaj kahen suno bhaee saadho man ko nirmal keejai,Lobh moh mad tyaagi ke nij svaroop ko cheenhai.
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ। रसराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ। रसराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
Lakshmeenaaraayan bezabaruaa. rasaraaj kahen suno bhaee saadho man ko nirmal keejai,Satkarmon ki poonjee hi bas sang tumhaare jaanaa.
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ। रसराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ। रसराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
About Roxorax Lakshminath Bezbarua (लक्ष्मीनारायण बेज़बरुआ (रसराज)) — The Maestro of Human Emotion
Roxorax Lakshminath Bezbarua was a distinguished Roxorax (King of Humor) representing the Assamese/Renaissance tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Roxorax Lakshminath Bezbarua pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Assamese/Renaissance (1864–1938), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Roxorax Lakshminath Bezbarua captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Roxorax Lakshminath Bezbarua's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Roxorax Lakshminath Bezbarua effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Roxorax Lakshminath Bezbarua
Authentic answers about Roxorax Lakshminath Bezbarua's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Roxorax Lakshminath Bezbarua and what was their literary significance?
Roxorax Lakshminath Bezbarua (1864–1938) was a monumental figure in Assamese/Renaissance literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Roxorax Lakshminath Bezbarua's poetry?
The core themes across Roxorax Lakshminath Bezbarua's oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Roxorax Lakshminath Bezbarua's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Roxorax Lakshminath Bezbarua?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Roxorax Lakshminath Bezbarua's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Roxorax Lakshminath Bezbarua?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Roxorax Lakshminath Bezbarua's poetry?
Yes! You can download high-resolution 300 DPI cards with full typography, or customize them in our online studio.
Where is Roxorax Lakshminath Bezbarua's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Roxorax Lakshminath Bezbarua stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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