प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Kunwar Narayan (कुंवर नारायण)
Kunwar Narayan was an illustrious figure in Philosophical Poet & Jnanpith Laureate (1927–2017), renowned for Atmajayi (based on Nachiketa), Vajashrava Ke Bahane.

प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— KUNWAR NARAYAN • 1927–2017

प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— KUNWAR NARAYAN • 1927–2017
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‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— Kunwar Narayan
Sher #1 • Classic Couplet
प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— Kunwar Narayan
Sher #2 • Passionate Verse
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— Kunwar Narayan
Sher #3 • Soulful Couplet
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,
Immortal Couplets & Ghazals
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Antar ghat mein jab jyoti jagee sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Priyatam ke charanon mein jisane to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

मन की वीणा बज उठी जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Man ki veenaa baj uthee jab tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Virah ki raat jab dhalane lagee jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी वही जो घाव भरे और सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मोह-निशा से जो जन जागा उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

साँसों की सरगम में घुल गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Saanson ki saragam mein ghul gaya ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Antar mein jab prem samaayaa yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,नेकी की राह पे जो जन उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

अकेलेपन की धूप जब साए हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द का यह गहरा सागर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Akelepan ki dhoop jab saae hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Dard ka yeh gaharaa saagar pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हृदय में जिसके दया बसी है रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

ग़म का मारा पंछी जैसे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब आशा की हर किरण बुझी तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Gham ka maaraa panchhee jaise jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Jab aashaa ki har kiran bujhee tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
माटी का यह देह बना है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,नेकी की राह पे जो जन निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,माटी का चोला पाकर जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

टूटे दिल की ख़ामोशी में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Toote dil ki khaamoshi mein doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Toote hue sapanon ki kirachen tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
नदिया की धारा बहती जावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,माटी का चोला पाकर जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

सच्ची लगन से जो जन है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,सत्य और धर्म की राहों पर बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Sachchee lagan se jo jan hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Saty aur dharm ki raahon par bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
वाणी वही जो घाव भरे और निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

दुःख में सुमिरन सब कोई बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Duhkh mein sumiran sab koee binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jo doosaron ke sukh ki khaatir apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
माटी का यह देह बना है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
संतन की संगति में आकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हृदय में जिसके दया बसी है उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
नदिया की धारा बहती जावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,माटी का चोला पाकर जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

धैर्य और संतोष का धन अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,सत्य और धर्म की राहों पर अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Dhairy aur santosh ka dhan agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Saty aur dharm ki raahon par apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हरि की कृपा का पावन साया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,अमर नाम जग में उसी का जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

माटी का यह देह बना ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Maatee ka yeh deh banaa jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम के चरणों में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

जो भीतर झाँक के देखता में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Ahankaar ki deevaaren jab antar jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
प्रेम रंग में जो रंग गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,हृदय के पावन सिंहासन पर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Man ke nirmal darpan mein jab maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Saty vachan jo mukh se bole apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे प्रेम की यही निशानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
फासले मिट गए जब दिल से तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम सुधा का रस जो चखा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Satya-ahinsaa ki raahon par usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
तेरी याद का पावन साया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम सुधा का रस जो चखा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे प्रेम की यही निशानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,माटी का चोला पाकर जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Vaanee mein jo amrit ghole bharam ka pardaa tore amrit ras ki varshaa hove jab moh mukh more,Maatee ka cholaa paakar jisane usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
मन की वीणा बज उठी जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
मन की वीणा बज उठी जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी आँखों की झील में जो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Ahankaar ki deevaaren jab antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Satkarmon ki amit kamaaee hi vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
मन मंदिर में बसा जो मूरति संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन घाटी में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

प्रियतम की याद में जो नैना दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem ki paavan jyoti jagaaee sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
मन की वीणा बज उठी जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

मन मंदिर में बसा जो मूरति संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Man mandir mein basaa jo moorati sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Hriday ke paavan sinhaasan par ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
साँसों की सरगम में घुल गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
साँसों की सरगम में घुल गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे दीदार की एक झलक ने जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

तेरे दीदार की एक झलक ने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Tere deedaar ki ek jhalak ne antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem ki paavan jyoti jagaaee aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रियतम की याद में जो नैना सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

आँखों के आँसू जब सूखे सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दिल के फफोलों को देखकर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Aankhon ke aansoo jab sookhe so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Dil ke phapholon ko dekhakar dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
मन की वीणा बज उठी जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम नगर का वासी बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैनन आगे तू ही तू नाचे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन धारा में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दिल के फफोलों को देखकर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
दिल का आईना जब टूटा चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस लंबी यात्रा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

भीतर-भीतर घुटता जाए जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म के मारों की बस्ती में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Gham ke maaron ki bastee mein tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
ग़म की तपती दुपहरी में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब सबने मुँह फेर लिया मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
नैनों से जो नीर बहे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब नयनों के सब आँसू सूखे अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
अकेलेपन की धूप जब साए हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द का यह गहरा सागर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
दर्द की रात में जब कोई हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

दर्द की रात में जब कोई रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Dard ki raat mein jab koee ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
आँखों में जो नमी है वो पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
घायल की गति घायल जाने जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म की इस गहरी रात में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
विरह की अगन में जलता मन सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
दर्द की रात में जब कोई दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस आँधी ने जब धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

संतन की संगति में आकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Santan ki sangati mein aakar jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Karmanyataa ka paavan vrat lekar aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
आँखों के आँसू जब सूखे सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दिल के फफोलों को देखकर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
टूटे दिल की ख़ामोशी में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,आँसुओं की इस भाषा को मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
आशा का दीप जब बुझने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस आँधी ने जब पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
वक़्त की आँधी ने तोड़े पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

गिरने में कोई हार नहीं करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,कर्म की खेती में जो पसीना का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Girane mein koee haar nahi karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Karm ki khetee mein jo paseenaa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
छाले पड़े हैं पाँवों में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
नैनों से जो नीर बहे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
ग़म का मारा पंछी जैसे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब आशा की हर किरण बुझी तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

माटी का यह चोला पाकर धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जो सबको अपना मान के चले वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Maatee ka yeh cholaa paakar dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jo sabako apanaa maan ke chale woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
दर्द की रात में जब कोई जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
About Kunwar Narayan (कुंवर नारायण) — The Maestro of Human Emotion
Kunwar Narayan was an illustrious figure in Philosophical Poet & Jnanpith Laureate (1927–2017), renowned for Atmajayi (based on Nachiketa), Vajashrava Ke Bahane.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Kunwar Narayan pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1927–2017, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Kunwar Narayan captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Kunwar Narayan's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Kunwar Narayan effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Kunwar Narayan?
Kunwar Narayan was a renowned Philosophical Poet & Jnanpith Laureate (1927–2017) from Faizabad, Uttar Pradesh, India, widely celebrated for JNANPITH AWARDEE, AUTHOR OF 'ATMAJAYI', MEDITATIVE MASTER OF MODERN HINDI VERSE.
What is the central philosophy and message of Kunwar Narayan?
The central philosophy of Kunwar Narayan centers around Existential dialogue with mortality, ancient myth reimagined for modern dilemmas, ethical humanism, quiet intellectual dignity, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Kunwar Narayan's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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