नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Kshetrayya (क्षेत्रय्या)
Kshetrayya was a prolific 17th-century Telugu lyric poet and composer whose Muvva Gopala Padams remain the foundational bedrock of Kuchipudi and Bharatanatyam.

नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
— KSHETRAYYA • CARNATIC CLASSICAL RENAISSANCE (1600–1680)

नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
— KSHETRAYYA • CARNATIC CLASSICAL RENAISSANCE (1600–1680)
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‘नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।’— Kshetrayya
Sher #1 • Classic Couplet
नदिया की धारा बहती जावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— Kshetrayya
Sher #2 • Passionate Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— Kshetrayya
Sher #3 • Soulful Couplet
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— Kshetrayya
Sher #4 • Philosophical Verse
कर्म की खेती जो जन बोवे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,
Immortal Couplets & Ghazals
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

तेरे मिलन की आस में बीते दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Tere milan ki aas mein beete dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Sachche prem ki yahee nishaanee ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मन के मैल को जिसने धोया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Man mandir mein basaa jo moorati antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Antar mein jab prem samaayaa utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Tere deedaar ki ek jhalak ne sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ki mastee mein jo jhoomaa to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
आशा तृष्णा सब छूटी जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,भवसागर की लहरों से जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

तन्हाई के अँधियारे में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Tanhaaee ke andhiyaare mein haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Akelepan ki is raah par paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,अमर नाम जग में उसी का जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

घायल की गति घायल जाने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,अकेलेपन की इस राह पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Akelepan ki is raah par sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,मन के मैल को जिसने धोया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
वाणी में जो अमृत घोले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अहंकार का त्याग किया जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
मन मंदिर में जो दीप जले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

विरह की अगन में जलता मन जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अंधेरी रात के सन्नाटे में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Virah ki agan mein jalataa man jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Andheree raat ke sannaate mein dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
धरती की छाती पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
धरती की छाती पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,शांति और संतोष का धन जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
अहंकार की दीवारें जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,मेहनत और लगन से जिसने अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Mehanat aur lagan se jisane apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हृदय में जिसके दया और करुणा अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
संतन की संगति में आकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
संतन की संगति में आकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
संतन की संगति में आकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नाम और दौलत तो माटी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Duhkh mein sumiran sab koee chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jo doosaron ke sukh ki khaatir use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
मन मंदिर में जो दीप जले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्संग की निर्मल गंगा में लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

आत्मा अजर-अमर अविनाशी है जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,सच्चा मोक्ष वही कहलाता है जहाँ समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Aatmaa ajara-amar avinaashee hai jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Sachchaa moksh vahee kahalaataa hai jahaan samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
मन की वीणा बज उठी जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

माटी का यह देह बना जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Maatee ka yeh deh banaa jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Jisane is nashvar shareer ka moh jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम का दीपक अंतर में जो और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरी याद का पावन साया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन धारा में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

परमसत्य का पावन दर्शन पार उतरना हो तो हरि नाम की पावन नौका का आश्रय लेना पड़ता है,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Paramasaty ka paavan darshan paar utaranaa ho to hari naam ki paavan naukaa ka aashray lenaa padta hai,Jisane is nashvar shareer ka moh nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम के रंग में रंग कर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Karm ki khetee jo jan bove jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Shaanti aur santosh ka dhan jo nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

सत्य के पावन पथ पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Saty ke paavan path par jisane bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Sadaachaar ki paavan vedee par nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
अंतर घट में जब ज्योति जगी बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के रंग में रंग कर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

अहंकार की दीवारें जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Ahankaar ki deevaaren jab prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Prem ki dor mein bandh gaya jo use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन घाटी में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Santan ki sangati mein aakar saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ki is paavan ghaatee mein aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
तेरे दीदार की एक झलक ने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,हृदय के पावन सिंहासन पर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह का हर इक आँसू बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Nain mile jab nainan se tab us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Jab se nainaa roop mein ulajhe jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन घाटी में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem ki is paavan ghaatee mein ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम बिना सब सूना जग में उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के चरणों में जिसने युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैनन आगे तू ही तू नाचे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन घाटी में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

दिल का आईना जब टूटा कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द का यह गहरा सागर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Dil ka aaina jab tootaa koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Dard ka yeh gaharaa saagar paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
तेरे रूप की पावन झांकी बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे मिलन की आस में बीते संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
दर्द की रात में जब कोई हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,अकेलेपन की इस राह पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
तन्हाई के अँधियारे में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

अकेलेपन की धूप जब साए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Akelepan ki dhoop jab saae patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Gham ki is gaharee raat mein tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
दिल का आईना जब टूटा हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
विरह की अगन में जलता मन सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
तन्हाई के अँधियारे में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
छाले पड़े हैं पाँवों में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब सबने मुँह फेर लिया केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Waqt ki aandhee ne tore hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jeevan ke is kathin mod par keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
आशा का दीप जब बुझने को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
वक़्त की आँधी ने तोड़े पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
विरह की अगन में जलता मन सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

सच्ची लगन से जो जन मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Sachchee lagan se jo jan mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
दिल का आईना जब टूटा कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द का यह गहरा सागर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
अकेलेपन की धूप जब साए रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस गहरी रात में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
उम्र भर का सफ़र और दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,अंधेरी रात के सन्नाटे में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

नेकी की राह पे जो जन कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,धैर्य की नौका पर सवार होकर पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Nekee ki raah pe jo jan kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Dhairy ki naukaa par savaar hokar paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
आँखों के आँसू जब सूखे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे दिल की इस वीणा से तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
छाले पड़े हैं पाँवों में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब कोई चारासाज़ न मिला तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
नैनों से जो नीर बहे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म की इस गहरी रात में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
घायल की गति घायल जाने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,अकेलेपन की इस राह पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सदाचार के पावन नियमों पर उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Sadaachaar ke paavan niyamon par use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
कोई न अपना इस जग में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
About Kshetrayya (क्षेत्रय्या) — The Maestro of Human Emotion
Kshetrayya was a prolific 17th-century Telugu lyric poet and composer whose Muvva Gopala Padams remain the foundational bedrock of Kuchipudi and Bharatanatyam.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Kshetrayya pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Carnatic Classical Renaissance (1600–1680), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Kshetrayya captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Kshetrayya's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Kshetrayya effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Kshetrayya
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Who was Kshetrayya and what was their literary significance?
Kshetrayya (1600–1680) was a monumental figure in Telugu/Carnatic literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Kshetrayya's poetry?
The core themes across Kshetrayya's oeuvre encompass नायिका-नायक भाव व मधुर भक्ति, विरह-उत्कंठा व मिलन का उल्लास, शास्त्रीय राग-ताल का सामंजस्य, हृदय की अंतरंग भावनाएँ, आध्यात्मिक सौन्दर्य-बोध, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Kshetrayya's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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