संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
Keshavsut (K. D. Damle) (केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले))
Keshavsut (K. D. Damle) was a distinguished Father of Modern Marathi Poetry representing the Marathi/Modernist tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
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‘संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।’— Keshavsut (K. D. Damle)
Sher #1 • Classic Couplet
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,

‘अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।’— Keshavsut (K. D. Damle)
Sher #2 • Passionate Verse
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,

‘संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।’— Keshavsut (K. D. Damle)
Sher #3 • Soulful Couplet
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,
Immortal Couplets & Ghazals
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Keshavsut। K. D,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Keshavsut। K. D,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Keshavsut। K. D,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Keshavsut। K. D,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Keshavsut। K. D,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। Keshavsut। K. D,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
Keshavasut. krishnaajee keshav daamale kahen suno bhaee saadho man ko nirmal keejai,. Keshavsut. K. D,Usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Keshavsut। K. D,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Keshavsut। K. D,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Keshavsut। K. D,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Keshavsut। K. D,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Keshavsut। K. D,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Keshavsut। K. D,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Keshavsut। K. D,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Keshavsut। K. D,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Keshavsut। K. D,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Keshavsut। K. D,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Keshavsut। K. D,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Keshavsut। K. D,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Keshavsut। K. D,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Keshavsut। K. D,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Keshavsut। K. D,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Keshavsut। K. D,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। Keshavsut। K. D,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
Keshavasut. krishnaajee keshav daamale kahen suno bhaee saadho man ko nirmal keejai,. Keshavsut. K. D,Lobh moh mad tyaagi ke nij svaroop ko cheenhai.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Keshavsut। K. D,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Keshavsut। K. D,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Keshavsut। K. D,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Keshavsut। K. D,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Keshavsut। K. D,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Keshavsut। K. D,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Keshavsut। K. D,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Keshavsut। K. D,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Keshavsut। K. D,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Keshavsut। K. D,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Keshavsut। K. D,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Keshavsut। K. D,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। Keshavsut। K. D,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Keshavsut। K. D,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Keshavsut। K. D,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Keshavsut। K. D,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Keshavsut। K. D,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Keshavsut। K. D,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Keshavsut। K. D,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Keshavsut। K. D,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Keshavsut। K. D,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Keshavsut। K. D,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Keshavsut। K. D,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Keshavsut। K. D,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
केशवसुत। कृष्णाजी केशव दामले कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले) कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Keshavsut। K. D,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Keshavsut। K. D,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
About Keshavsut (K. D. Damle) (केशवसुत (कृष्णाजी केशव दामले)) — The Maestro of Human Emotion
Keshavsut (K. D. Damle) was a distinguished Father of Modern Marathi Poetry representing the Marathi/Modernist tradition, celebrated for monumental contributions to world literature.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Keshavsut (K. D. Damle) pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Marathi/Modernist (1866–1905), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Keshavsut (K. D. Damle) captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Keshavsut (K. D. Damle)'s Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Keshavsut (K. D. Damle) effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Keshavsut (K. D. Damle)
Authentic answers about Keshavsut (K. D. Damle)'s life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Keshavsut (K. D. Damle) and what was their literary significance?
Keshavsut (K. D. Damle) (1866–1905) was a monumental figure in Marathi/Modernist literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Keshavsut (K. D. Damle)'s poetry?
The core themes across Keshavsut (K. D. Damle)'s oeuvre encompass सत्य और आत्म-स्वाभिमान, मानवीय करुणा और समाज-सुधार, प्रकृति और सौंदर्य का आनंद, जीवन का यथार्थवादी संघर्ष, अलौकिक शांति और दार्शनिक विवेक, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Keshavsut (K. D. Damle)'s literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Keshavsut (K. D. Damle)?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Keshavsut (K. D. Damle)'s impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Keshavsut (K. D. Damle)?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Keshavsut (K. D. Damle)'s poetry?
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Where is Keshavsut (K. D. Damle)'s memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Keshavsut (K. D. Damle) stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
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