ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
Jigar Moradabadi (जिगर मुरादाबादी)
Jigar Moradabadi (1890–1960) was a titan of Urdu/Classical Ghazal literature, celebrated for profound insights, lyrical beauty, and lasting emotional resonance.
Download Aesthetic Jigar Moradabadi Story Cards

‘ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’— Jigar Moradabadi
Sher #1 • Classic Couplet
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,

‘ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।’— Jigar Moradabadi
Sher #2 • Passionate Verse
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,

‘ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।’— Jigar Moradabadi
Sher #3 • Soulful Couplet
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,
Immortal Couplets & Ghazals
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
About Jigar Moradabadi (जिगर मुरादाबादी) — The Maestro of Human Emotion
Jigar Moradabadi (1890–1960) was a titan of Urdu/Classical Ghazal literature, celebrated for profound insights, lyrical beauty, and lasting emotional resonance.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Jigar Moradabadi pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the Classical Ghazal (1890–1960), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Jigar Moradabadi captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Jigar Moradabadi's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Jigar Moradabadi effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
Explore Other Ghazal Masters
Create Aesthetic Cards in Under 30 Seconds
Select your favourite shayari or quote, choose an ethereal cosmic gradient, adjust the font to Noto Serif Devanagari, and export immediately.
- No sign up
- No watermark
- Free forever
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic PoetryMessages for every occasion and every person
Pick who you are writing to, or the festival, and open a ready collection.
- Birthday for dadWarm lines for the man who raised you
- Anniversary for husbandSweet notes for the one by your side
- Good morning, familyA bright start for the family group
- Good night, girlfriendSoft words before she sleeps
- Diwali wishesFestive messages for family and friends
- Holi wishesColourful lines for your friends
- Eid wishesEid Mubarak for your loved ones
- Farewell, colleagueKind goodbyes for a teammate
- CongratulationsCheer on a friend's big win
- Miss you, girlfriendFor the days when distance feels long
- Funny birthdayLight-hearted wishes for a best friend
- Christmas wishesSeason's greetings for the family
Popular searches
- Breakup Shayari for Girlfriend
- Attitude Shayari for Boys
- Attitude Shayari for Girls
- Attitude Status for Boys
- Alone Shayari
- 2 Line Attitude Shayari
- 2 Line Breakup Shayari
- Love Shayari for Girlfriend
- Miss You Shayari for Girlfriend
- Emotional Shayari for Mom
- Heart Touching Shayari for Husband
- Birthday Wishes for Wife
- Birthday Wishes for Husband
- Love Status for WhatsApp
- Inspirational Quotes for Students
- Life Quotes for Self
Poets, Festivals & Status
Read the voices behind the verses, plan ahead for festivals and grab a quick status line
Essential Questions About Jigar Moradabadi
Authentic answers about Jigar Moradabadi's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
Still have a question? Contact us
Who was Jigar Moradabadi?
Jigar Moradabadi (1890–1960) was an eminent literary figure in Urdu/Classical Ghazal, renowned worldwide for monumental poetry.
What are the major themes in Jigar Moradabadi's poetry?
Their poetry explores love, philosophical contemplation, human resilience, spiritual elevation, and social consciousness.
What makes Jigar Moradabadi's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
What are the most famous works of Jigar Moradabadi?
Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
What was Jigar Moradabadi's impact on literary culture?
They revolutionized poetic expression, leaving a lasting legacy that continues to inspire contemporary poets.
Can I copy and share couplets by Jigar Moradabadi?
Yes, you can copy any couplet with a single click and share it directly to WhatsApp, Instagram, or Facebook.
Can I download aesthetic cards for Jigar Moradabadi's poetry?
Yes! You can download high-resolution 300 DPI cards with full typography, or customize them in our online studio.
Where is Jigar Moradabadi's memorial or tomb located?
Memorials and historic landmarks commemorating Jigar Moradabadi stand as cherished cultural heritage sites for poetry enthusiasts.
Ready to Express Yourself?
Pick a line, add your style and send it off. Your first card is a few taps away.







