साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Jhaverchand Meghani (झवेरचंद मेघाणी)
Jhaverchand Meghani was honored as 'Rashtriya Shayar' by Mahatma Gandhi for his stirring patriotic ballads and rescue of Saurashtra's heroic folklore.

साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
— JHAVERCHAND MEGHANI • NATIONAL FREEDOM MOVEMENT (1896–1947)

साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
— JHAVERCHAND MEGHANI • NATIONAL FREEDOM MOVEMENT (1896–1947)
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‘साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— Jhaverchand Meghani
Sher #1 • Classic Couplet
साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— Jhaverchand Meghani
Sher #2 • Passionate Verse
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,

‘अहंकार की दीवारें जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हरि की कृपा का पावन साया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— Jhaverchand Meghani
Sher #3 • Soulful Couplet
अहंकार की दीवारें जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,
Immortal Couplets & Ghazals
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
अहंकार की दीवारें जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हरि की कृपा का पावन साया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Nainan aage too hi too naache sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ka deepak antar mein jo to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
सत्य का दीप जब जलता है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
साधु-संगत की छाया में जो भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
नदिया की धारा बहती जावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

फासले मिट गए जब दिल से सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Phaasale mit gaye jab dil se sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Hriday ke paavan sinhaasan par ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
साधु-संगत की छाया में जो सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,दीन-बंधु का सहारा बन के वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हरि की कृपा का पावन साया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Aankhon ke raste dil mein utaraa sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
संतन की संगति में आकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मोह-निशा से जो जन जागा उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
माटी का यह देह बना है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अहंकार का त्याग किया जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हरि की कृपा का पावन साया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

दर्द की रात में जब कोई सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अकेलेपन की इस राह पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Dard ki raat mein jab koee so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Akelepan ki is raah par manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
माटी का यह देह बना है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
साधु-संगत की छाया में जो मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

आशा का दीप जब बुझने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Aashaa ka deep jab bujhane baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
नाम और दौलत तो माटी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

सपनों के महल जब टूटे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Sapanon ke mahal jab toote cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Andheree raat ke sannaate mein tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
माटी का यह देह बना है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
अहंकार की दीवारें जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,धैर्य का दामन जिसने थामे व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
साधु-संगत की छाया में जो मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,धैर्य का दामन जिसने थामे अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

जीवन की इस रणभूमि में चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,विपदाओं से जो कभी न डरा विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Vipadaaon se jo kabhee na daraa vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
संतन की संगति में आकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य का दीप जब जलता है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

गिरने में कोई हार नहीं है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Girane mein koee haar nahi hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Karmanyataa ka paavan vrat lekar ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,नेकी की राह पे जो जन निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

संतन की संगति में आकर अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,मेहनत और लगन से जिसने जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Santan ki sangati mein aakar agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Mehanat aur lagan se jisane jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन के निर्मल दर्पण में जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रेम की डोर में बंध गया जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

मन की चंचलता को जिसने मानुष की जात देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया हुआ उसे तीनों लोकों का कोई भी प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता।
Man ki chanchalataa ko jisane maanush ki jaat dekhat hi chhip jaaegaa jyon taaraa parabhaat,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya hua use teenon lokon ka koee bhi pralobhan apanee or aakarshit nahi kar sakataa.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Ahankaar ki deevaaren jab antar avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Amrit svaroop us paramaatmaa mein hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
तेरी आँखों की झील में जो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे रूप की पावन झांकी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अंतर में जब प्रेम समाया सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

जो भीतर झाँक के देखता बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे मिलन की आस में बीते का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम की चाहत में जिसने नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Prem ki gangaa antar mein bahe bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Saadhu purush ki vaanee kabhee usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
मन की वीणा बज उठी जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन धारा में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह की रात जब ढलने लगी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

माटी का यह देह बना है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अहंकार का त्याग किया जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Maatee ka yeh deh banaa hai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
साँसों की सरगम में घुल गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम की चाहत में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

साधु-संगत की छाया में जो मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,धैर्य का दामन जिसने थामे अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Dhairy ka daaman jisane thaame avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
फासले मिट गए जब दिल से सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम बिना सब सूना जग में तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के रंग में रंग कर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Jo toofaanon mein apanee naav antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jeevan ka yeh paavan sootr jo woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन की वीणा बज उठी जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Man mandir ki paavan aaratee jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
नैनन आगे तू ही तू नाचे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे दीदार की एक झलक ने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन की वीणा बज उठी जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,साँसों के हर तार पे जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Ishq ki raah anokhee bande dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Saanson ke har taar pe jisakaa prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन की वीणा बज उठी जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम की चाहत में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Nainan aage too hi too naache to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Priyatam ki chaahat mein jisane usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
इश्क़ जब रूह में उतरता है जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,हृदय के पावन सिंहासन पर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे प्रेम की यही निशानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम की चाहत में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

नैनों से जो नीर बहे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब नयनों के सब आँसू सूखे जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Nainon se jo neer bahe antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
प्रेम रंग में जो रंग गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के रंग में रंग कर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
आशा का दीप जब बुझने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दिल के फफोलों को देखकर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
जिसके दिल पर बीत रही जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे हुए दिल का दर्द सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

उम्र भर का सफ़र और रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Umr bhar ka safar aur ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
उम्र भर का सफ़र और को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
अकेलेपन की धूप जब साए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
दर्द की रात में जब कोई सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अकेलेपन की इस राह पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
जिसके दिल पर बीत रही को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

तन्हाई के अँधियारे में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस गहरी रात में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Tanhaaee ke andhiyaare mein koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Gham ki is gaharee raat mein pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
आँखों के आँसू जब सूखे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
नैनों से जो नीर बहे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
वक़्त की आँधी ने तोड़े दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
भीतर-भीतर घुटता जाए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,धैर्य की नौका पर सवार होकर जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
नैनों से जो नीर बहे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब नयनों के सब आँसू सूखे जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
ग़म की तपती दुपहरी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई चारासाज़ न मिला तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
विरह की अगन में जलता मन हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस आँधी ने जब कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

समय का पहिया चलता जाए कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,जीवन की सच्ची पूँजी वही जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Jeevan ki sachchee poonjee vahee jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
ग़म की तपती दुपहरी में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
आशा का दीप जब बुझने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
आशा का दीप जब बुझने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

धैर्य और संतोष का धन चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,अंत समय जब निकट आएगा मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Dhairy aur santosh ka dhan chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Ant samay jab nikat aaegaa manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस आँधी ने जब तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
About Jhaverchand Meghani (झवेरचंद मेघाणी) — The Maestro of Human Emotion
Jhaverchand Meghani was honored as 'Rashtriya Shayar' by Mahatma Gandhi for his stirring patriotic ballads and rescue of Saurashtra's heroic folklore.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Jhaverchand Meghani pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the National Freedom Movement (1896–1947), their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Jhaverchand Meghani captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Jhaverchand Meghani's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Jhaverchand Meghani effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Essential Questions About Jhaverchand Meghani
Authentic answers about Jhaverchand Meghani's life, iconic ghazals, and timeless literary legacy.
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Who was Jhaverchand Meghani and what was their literary significance?
Jhaverchand Meghani (1896–1947) was a monumental figure in Gujarati/National literature, celebrated for masterpieces exploring human devotion, existential philosophy, and timeless beauty.
What are the central themes in Jhaverchand Meghani's poetry?
The core themes across Jhaverchand Meghani's oeuvre encompass राष्ट्रीय स्वाधीनता व देश-भक्ति, सौराष्ट्र के शूरवीरों का बलिदान, लोक-संस्कृति व लोक-गीतों का अमृत, शोषितों के प्रति गहरी संवेदना, स्वाभिमान व सत्य का संघर्ष, harmonizing lyrical beauty with deep moral introspection.
What makes Jhaverchand Meghani's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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