ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Jayaprakash Narayan (जयप्रकाश नारायण)
Jayaprakash Narayan was an illustrious figure in Loknayak & Architect of Total Revolution (1902–1979), renowned for Prison Diary, Towards Total Revolution.

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
— JAYAPRAKASH NARAYAN • 1902–1979

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
— JAYAPRAKASH NARAYAN • 1902–1979
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‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— Jayaprakash Narayan
Sher #1 • Classic Couplet
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।’— Jayaprakash Narayan
Sher #2 • Passionate Verse
जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— Jayaprakash Narayan
Sher #3 • Soulful Couplet
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,
Immortal Couplets & Ghazals
जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Jisane prem ka marm samajh naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नाम और दौलत तो माटी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य वचन जो मुख से बोले निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
अहंकार की दीवारें जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,नेकी की राह पे जो जन मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,परहित में जिसने जीवन सौंपा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

फासले मिट गए जब दिल से का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Phaasale mit gaye jab dil se ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Amar prem ki amar kahaanee jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मोह-निशा से जो जन जागा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,नेकी की राह पे जो जन अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Tere deedaar ki ek jhalak ne tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Priyatam ki chaahat mein jisane jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
अहंकार की दीवारें जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,साधु पुरुष की वाणी कभी उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

आँखों के आँसू जब सूखे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Aankhon ke aansoo jab sookhe par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Waqt ke is kroor prahaar ne sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
साधु-संगत की छाया में जो सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

सांस-सांस में याद तुम्हारी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म के मारों की बस्ती में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Gham ke maaron ki bastee mein tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अमर नाम जग में उसी का उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

विरह की अगन में जलता मन हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,टूटे दिल की इस वीणा से तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Virah ki agan mein jalataa man hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Toote dil ki is veenaa se tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,नेकी की राह पे जो जन उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

अहंकार की दीवारें जब अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जिसने समय की चाल पहचानी अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Ahankaar ki deevaaren jab agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jisane samay ki chaal pahachaanee apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मोह-निशा से जो जन जागा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्य का दीप जब जलता है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हरि की कृपा का पावन साया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

गिरने में कोई हार नहीं बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Girane mein koee haar nahi binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Karmanyataa ka paavan vrat lekar woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
अहंकार की दीवारें जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अहंकार का त्याग किया जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
अहंकार की दीवारें जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हृदय में जिसके दया बसी है वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,कर्म की खेती में जो पसीना विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Karm ki khetee mein jo paseenaa vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
नाम और दौलत तो माटी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मोह-निशा से जो जन जागा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नाम और दौलत तो माटी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
अहंकार की दीवारें जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,नेकी की राह पे जो जन उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

संतन की संगति में आकर इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,परम पद की प्राप्ति उसी को होती तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Santan ki sangati mein aakar ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Param pad ki praapti usee ko hotee to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रियतम की याद में जो नैना तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

घट-घट में वह एक अनंता व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन धारा में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

सत्य का दीप जब जलता एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,ब्रह्मलीन होकर जो जन स्थित का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Saty ka deep jab jalataa ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Brahmaleen hokar jo jan sthit ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जब से नैना रूप में उलझे मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
फासले मिट गए जब दिल से बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अमर प्रेम की अमर कहानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अंतर में जब प्रेम समाया उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Jo toofaanon mein apanee naav prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Sadaachaar ki paavan vedee par lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम रंग में जो रंग गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Jo toofaanon mein apanee naav ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Sadaachaar ki paavan vedee par nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
नैन मिले जब नैनन से तब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Vaanee mein jo amrit ghole nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Saadhu purush ki vaanee kabhee avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
फासले मिट गए जब दिल से का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,साँसों के हर तार पे जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
मन मंदिर में बसा जो मूरति का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे रूप की पावन झांकी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,हृदय के पावन सिंहासन पर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Roma-rom mein ram gaya preetam dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Amar prem ki amar kahaanee jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,अमर प्रेम की अमर कहानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन धारा में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Saanson ke har taar pe jisakaa sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
तेरे मिलन की आस में बीते रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने प्रेम का मर्म समझ तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम गली अति साँकरी जामें का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Antar mein jab prem samaayaa sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह की रात जब ढलने लगी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

आँखों में जो नमी है वो यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Aankhon mein jo namee hai wo yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Dil ke phapholon ko dekhakar tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
तेरी याद का पावन साया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
दिल का आईना जब टूटा कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
उम्र भर का सफ़र और सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

नैनों से जो नीर बहे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब आशा की हर किरण बुझी तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Nainon se jo neer bahe kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab aashaa ki har kiran bujhee tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
आशा का दीप जब बुझने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब सबने मुँह फेर लिया तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
नैनों से जो नीर बहे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अंधेरी रात के सन्नाटे में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
आँखों के आँसू जब सूखे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
जिसके दिल पर बीत रही सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

दर्द की रात में जब कोई अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए सपनों की किरचें सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Dard ki raat mein jab koee antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Toote hue sapanon ki kirachen sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म के मारों की बस्ती में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
तन्हाई के अँधियारे में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ग़म की तपती दुपहरी में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
मन के कोने में सिमटी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

जीवन की इस रणभूमि में करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी के इस पुतले में जब जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Jeevan ki is ranabhoomi mein karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Maatee ke is putale mein jab jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
आँखों में जो नमी है वो यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द का यह गहरा सागर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
तन्हाई के अँधियारे में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
दिल का आईना जब टूटा को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

दुःख में सुमिरन सब कोई जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जो गिरतों को उठाना जानता है जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Duhkh mein sumiran sab koee jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
दिल का आईना जब टूटा हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब कोई सहारा न बचा तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
दिल का आईना जब टूटा को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अकेलेपन की इस राह पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
भीतर-भीतर घुटता जाए जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
सांस-सांस में याद तुम्हारी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म के मारों की बस्ती में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

सच्ची लगन से जो जन जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जीवन का असली आनंद वही जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Sachchee lagan se jo jan jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jeevan ka asalee aanand vahee jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
टूटी नाव भँवर में फँसी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
About Jayaprakash Narayan (जयप्रकाश नारायण) — The Maestro of Human Emotion
Jayaprakash Narayan was an illustrious figure in Loknayak & Architect of Total Revolution (1902–1979), renowned for Prison Diary, Towards Total Revolution.
Poetic Innovation & Distinct Voice
Jayaprakash Narayan pioneered unique metaphors and an intimate conversational style, permanently redefining South Asian lyrical expression.
Historical Era & Global Acclaim
Celebrated across the 1902–1979, their verses have transcended borders, honored globally in multiple international translations and scholarly anthologies.
Cosmic Depth & Emotional Resonance
Weaving existential inquiry, intimate vulnerability, and philosophical depth, Jayaprakash Narayan captured the bittersweet beauty of human existence.
Why Jayaprakash Narayan's Poetry Resonates Across Generations
From student dormitories to seasoned scholars, Jayaprakash Narayan effortlessly bridges generational divides. Their couplets on love, heartbreak, and resilience don't wallow in bitterness; rather, they gently embrace emotion as a precious, soulful companion. On digital platforms and in musical concerts, their words continue to touch millions daily.
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Who was Jayaprakash Narayan?
Jayaprakash Narayan was a renowned Loknayak & Architect of Total Revolution (1902–1979) from Sitab Diara, Bihar, India, widely celebrated for LOKNAYAK (LEADER OF THE PEOPLE), LEADER OF SAMPURNA KRANTI (TOTAL REVOLUTION), BHARAT RATNA.
What is the central philosophy and message of Jayaprakash Narayan?
The central philosophy of Jayaprakash Narayan centers around Sampurna Kranti (social, economic, political revolution), citizen democracy, Gandhian socialism, Bhoodan movement, leaving timeless guidance for humanity.
What makes Jayaprakash Narayan's literary works so renowned?
Their poetry explores the full spectrum of human emotions—love, existential yearning, resilience, and philosophical introspection.
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Their masterworks include timeless couplets and verses celebrated globally across literary traditions.
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